बुधवार, 31 अगस्त 2016

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🌹 सन्त और उनकी सेवा :

(गत ब्लॉगसे आगेका)

       रही आज्ञा-पालनकी बात । सो वे प्रायः कोई बात आज्ञाके रूपमें नहीं कहते । वे अपनी नम्रताके कारण जब किसी व्यक्तिको कुछ कार्य करनेके लिये कहते हैं तब प्रायः ऐसा संकेत किया करते हैं कि अमुक परिस्थितिमें शास्त्रोंकी ऐसी आज्ञा है, भगवान्‌की ऐसी आज्ञा है, सन्तोंने ऐसा कहा है और किया है आदि-आदि । पर यह निश्चित है कि उनके कथनानुसार करनेसे लाभ अवश्य होता है; अतएव वे जो कुछ निर्देश करें उसे उन्हींकी आज्ञा समझकर पालन करें तो वे उसका विरोध नहीं करते । यह उनकी हमारे प्रति उदारता है, कृपा है, यह उन्होंने हमारे लिये छुट दे रखी है । शरीरकी पूजासे उनके वचन अधिक महत्त्वके हैं । अतएव वचनोंकी ही प्रधानता देनी चाहिये । एक सन्त थे । उनके पास रहनेवाले श्रद्धालु व्यक्तियोंमेंसे एक व्यक्तिकी एक दिन सन्तने परीक्षा लेनी चाही । वे बोले‒‘मेरी कमरमें दर्द हो रहा है, जरा अपने पैरसे इसे दबा दो ।’ श्रद्धालुने कहा‒‘महाराज ! आपके शरीरपर पैर कैसे रखूँ ?’ सन्तने तुरन्त उत्तर दिया‒‘ठीक है, मेरे शरीरपर तो तुम पैर नहीं रखते, पर मेरी जबानपर तो पैर रख दिया न ?’ यह एक दृष्टान्त है । इससे हमें यह शिक्षा लेनी चाहिये कि सेवामें शरीरकी अपेक्षा वचनोंके पालनको अधिक महत्त्व दें । हाँ, यह सम्भव है कि हम सन्तके वचनका पूरा पालन न कर सकें, किन्तु यदि मनमें वचन-पालनकी नीयत है तथा उसके लिये यथा-सामर्थ्य प्रयत्न भी किया गया है तो फिर चाहे उसका अक्षरशः पालन न भी हो पाया हो तो भी उससे बहुत लाभ होता है ।

      यदि सन्तोंके वचनोंका भाव कहीं पूर्णरूपसे समझमें नहीं आये तो नम्रतापूर्वक उन्हींसे पूछकर समाधान कर लेना चाहिये;पर समझमें आ जानेपर पालन करनेमें किंचिन्मात्र भी कमी नहीं लानी चाहिये ।सन्तके वचन-पालनमें यदि कहीं उनकी सेवाका भी त्याग करना पड़े तो वह भी कर देना चाहिये । सेवा करनेसे जब लाभ होता है तो सेवा-त्यागसे अधिक लाभ होना चाहिये, क्योंकि जो कीमती चीज है, उसका त्याग उस चीजसे भी बड़ा है, फिर यह त्याग यदि सन्तकी आज्ञासे ही किया जाता है, तो वह और भी अधिक महत्त्वकी वस्तु है । सच्चा श्रद्धालु इसमें क्यों चुकेगा । हाँ, एक बात हैजो सेवाके कष्टसे बचकर सेवाका त्याग करते हैं, वे तो सेवाके महत्त्वको जानते ही नहीं । उनको तो सेवा करनेमें कष्टका अनुभव होता है । इसलिये वे उस लाभसे वंचित रहते हैं । सन्त कभी इसीको किंचिन्मात्र भी कष्ट देना नहीं चाहता, इसलिये वह ऐसे व्यक्तियोंसे सेवा क्यों करवायेगा; क्योंकि उनको सेवा करानेकी कोई भूख तो है ही नहीं । जो लोग दूसरोंसे अपनी सेवा करवाना चाहते हैं, उनके अन्तःकरणमें स्वार्थ और अहंकारके कारण यह नहीं सूझ पड़ता कि किसको क्या कष्ट और हानि हो रही है; किन्तु सन्तोंके निःस्वार्थ हृदयमें तो प्रकाश है । वे तो जानते हैं कि कौन व्यक्ति सेवामें सुखका अनुभव करता है और कौन दुःखका ।

      सत्संगके लिये तो सन्त स्वयं अपनी ओरसे चले जाते हैं; क्योंकि प्रेमी जिज्ञासुओंके पास जानेसे भगवत्-वाक्योंका मनन, विचार और अनुशीलन होता है, जो उन्हें अत्यन्त प्यारे हैं । इतना ही नहीं, वे अपना संग करनेवाले व्यक्तिका उपकार भी मानते हैं कि इसके कारण हमारा कुछ समय भगवच्चर्चामें व्यतीत हुआ । काकभुशुण्डिजीने गरुड़जीसे कहा‒‘ महाराज ! मुझपर आपकी बड़ी कृपा हुई, जो मुझे सत्संग दिया ।’

तुम्ह बिग्यानरूप नहिं मोहा । नाथ कीन्ह मो पर अति छोहा ॥
पूँछिहुँ राम कथा अति पावनि । सुक सनकादि संभु मन भावनि ॥
                                                                       (रामचरितमानस)

    (शेष आगेके ब्लॉगमें)

‒ ‘जीवनका कर्तव्य’ पुस्तकसे

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सोमवार, 29 अगस्त 2016

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❄ सन्त और उनकी सेवा :

 (गत ब्लॉगसे आगेका)

       अब प्रश्न होता है कि सन्तोंका सेवन किस प्रकार किया जाय ? इसके उत्तरमें यही कहा जा सकता है कि सन्तोंके सेवनका सर्वोत्तम ढंग है उनके मन, उनकी आज्ञाके अनुसार चलना, उनके सिद्धान्तोंका आदरपूर्वक पालन करना । यह सन्त-सेवनकी ऊँची-से-ऊँची विधि है । इसका कारण यह है कि सन्तोंको अपना सिद्धान्त जितना प्यारा होता है, उतने उनको अपने प्राण भी नहीं होते, जो हमलोगोंको सबसे अधिक प्यारे हैं । यही कारण है कि आवश्यकता पड़नेपर वे अपने प्राण छोड़ सकते हैं, पर सिद्धान्त नहीं । अतएव उनके सिद्धान्तका सांगोपांग पालन करना, उनके मनके अनुसार चलना और यदि मनका पता न लगे तो इशारा-आज्ञा आदिके अनुसार चलना चाहिये, यह उनकी सबसे बड़ी सेवा है‒‘अग्या सम न सुसाहिब सेवा ।’ अतः शरीरसे सेवा करनेके साथ ही श्रद्धा-प्रेमपूर्वक मनसे भी सेवा की जाय तो कहना ही क्या है । उनका सिद्धान्त जाननेके लिये उनका संग करके उनसे भगवत्सम्बन्धी बात पूछनी चाहिये; इससे हम अधिक लाभ उठा सकते हैं । सन्तोंसे पुत्र, स्त्री, धन, मान, बड़ाई आदिसे सम्बन्ध रखनेवाले सांसारिक पदार्थ चाहना अमूल्य हीरेको पत्थरसे फोड़ना है; यह सन्तोंके संगका सदुपयोग नहीं है । यों सन्तोंके कहने आदिसे पुत्र आदिकी प्राप्ति भी हो सकती है, किन्तु यह तो उनकी कीमत न समझना है ।

       सन्तोंको प्रायः हम समझते नहीं । हमलोग तो उसकी बाहरी क्रियाओंकी अर्थात्‌ अधिक खाने, नंगा रहने, मिट्टीको सोना बना देने आदि चमत्कारिक बातोंकी विशेषता देखना चाहते हैं; किन्तु इन बातोंसे सन्तपनेका कुछ भी सम्बन्ध नहीं है ।सन्तोंका यह लक्षण कहीं भी नहीं लिखा है ।गीतामें स्थान-स्थानपर भक्त आदिके लक्षण लिखे हैं, पर उसमें एक स्थानपर भी नहीं लिखा है कि ‘वे बेटा दे देते हैं, वचनसिद्ध होते हैं’ आदि ।

       तो फिर सन्तोंकी पहचान कैसे हो ? सन्तोंकी पहचानका सीधा-सा उपाय यही है कि जिस व्यक्तिके संगसे हमारा साधन बढ़े, हममें दैवी सम्पत्ति आये, हमारे आचरणमें न्याय आने लगे, भगवत्तत्त्वका ज्ञान होने, सत्‌-शास्त्र, भगवान्‌, महात्मा, परलोक और धर्ममें श्रद्धा बढ़े और भगवान्‌की स्मृति अधिक रहने लगे, हमारे लिये वही सन्त है ।सन्तोंसे ऐसा ही लाभ लेना चाहिये और उनसे इस प्रकारका आध्यात्मिक लाभ लेना ही सच्चा लाभ है ।

       भगवान्‌से लाभ उठानेकी पाँच बातें हैं‒नाम-जप, ध्यान, सेवा, आज्ञा-पालन और संग । पर सन्तोंसे लाभ लेनेमें संग, आज्ञा और सेवा‒ये तीन ही साधन उपयुक्त हैं ।सन्त-महात्मा पुरुष अपने नामका जप और अपने स्वरूपका ध्यान कभी नहीं बताते और जो अपने नाम और रूपका प्रचार करते हैं, वे कदापि सन्त नहीं । सच्चा सन्त तो भगवान्‌के ही नाम-जप और ध्यान करनेका उपदेश देता है । हाँ, वह सेवा, आज्ञा-पालन और संग‒इन तीनके लिये प्रायः मना नहीं करता । सेवामें कुछ संकोच रखता है और जहाँतक सम्भव होता है, नहीं करवाता है । सेवाके दो भेद हैं‒(१) पूजा, आरती करना आदि, (२) वस्त्र देना, भोजन देना, अनुकूल वस्तुओंको प्रस्तुत करना इत्यादि । भगवान्‌की तो ये दोनों ही सेवाएँ उचित हैं, परन्तु सन्त पुरुष पहले प्रकारकी सेवा नहीं चाहते और यदि कोई ऐसी सेवाके लिये आग्रह करता है तो वे अपने स्थानपर भगवान्‌की ही वैसी सेवा करवाते हैं; क्योंकि वे जानते हैं कि ‘मेरा शरीर हाड़-मांसका है, इसकी सेवासे क्या लाभ !’ दूसरे प्रकारकी सेवा वे आश्रम और वर्णके अनुसार स्वीकार करते हैं । इस प्रकार सेवा भी वह सन्तपनेकी दृष्टिसे नहीं लेता, आश्रम और वर्णकी ही दृष्टिसे लेता है, अतएव इन अन्न, वस्त्र आदि वस्तुओंकी पूर्ति करना अनुचित नहीं । इस प्रकारकी सेवा केवल सन्त ही नहीं, जो भी हो ले सकता है । यदि कोई सन्त नहीं है, पर उसे भूख-प्यास लगी है तो वह कोई भी क्यों न हो, जिस व्यक्तिके पास ये भोजनादि वस्तुएँ हों, उससे शरीरनिर्वार्थ ले सकता है ।

    (शेष आगेके ब्लॉगमें)

‒ ‘जीवनका कर्तव्य’ पुस्तक से

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रविवार, 28 अगस्त 2016

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❄ सन्त और उनकी सेवा :

(गत ब्लॉग से आगेका)

        वास्तवमें भगवान्‌ भगवान्‌ ही हैं । सन्त सन्त ही है । सन्त भगवान्‌के बराबर नहीं, भगवान्‌ उससे बड़े हैं । सन्तके ज्ञान, सामर्थ्य, शक्ति आदि सीमित हैं और भगवान्‌का सब कुछ अनन्त और असीम है । माना, सन्त भगवान्‌को प्राप्त हो गया और दूसरेको भी उनकी प्राप्ति करा सकता है, पर वह भगवान्‌ नहीं बन जाता ।न्यायसे भी यह ठीक लगता है । जैसे जब हमें कोई सन्त मिलता है तो हम कहते हैं‒ ‘महाराजजी ! भगवान्‌के दर्शन करा दो ।’ इससे प्रत्यक्ष है कि सन्तके मिलनेसे हमारी आत्यन्तिक तृप्ति नहीं हुई; उनसे बड़ी जो एक वस्तु‒भगवान्‌ है, उनको पानेकी इच्छा बनी रही । इससे स्वाभाविक ही भगवान्‌का बड़ा होना प्रकट होता है औरसन्त सदा भगवान्‌को बड़ा मानते आये हैं ।

       सन्त भगवान्‌से बढ़कर हैं गोस्वामी तुलसीदासजी कहते हैं‒

राम सिंधु घन सज्जन धीरा । चंदन तरु हरि संत समीरा ॥

मोरें मन प्रभु अस बिस्वासा । राम तें अधिक राम कर दासा ॥

      श्रीभगवान्‌ने भी दुर्वासासे कहा है‒

अहं भक्तपराधीनो ह्यस्वतन्त्र इव द्विज ।

साधुभिर्ग्रस्तहृदयो भक्तैर्भक्तजनप्रियः ॥

      सन्तोंने तो भगवान्‌को बड़ा बतलाया और भगवान्‌ सन्तोंको बड़ा बतलाते हैं । परन्तु सन्तोंको भगवान्‌ और सन्त दोनों ही बड़ा बतलाते हैं । भगवान्‌ने कहीं भीअपनेको सन्तसे बड़ा बतलाया हो‒ऐसा देखनेमें नहीं आया । इस दृष्टिसे बड़े हुए सन्त ही और हम यदि अपने लाभके लिये विचार करते हैं तो भी सन्त ही बड़े हैं; क्योंकि परमात्माके सच्चिदानन्दरूपमें जीवमात्रके हृदयमें रहते हुए भी सन्त-कृपा और सत्संगके बिना भगवान्‌के उस परम आनन्दमय स्वरूपके अनुभवसे वंचित रहकर जीव दुःखी ही रहते हैं । भगवत्स्वरूपका अनुभव तो भगवद्भक्तिसे ही होता है और वह मिलती है सन्त-कृपा और सत्संगसे‒

भगति तात अनुपम सुख मूला । मिलइ जो होहिं संत अनुकूला ॥

भगति स्वतंत्र सकल गुन खानी । बिनु सतसंग न पावहिं प्रानी ॥

      अतएव हमारे लिये तो सन्त ही बड़े हुए । भगवत्कृपासे प्राप्त हुए मानवदेहका फल मनुष्यके कर्म एवं साधनके अनुसार स्वर्ग, नरक अथवा मोक्ष‒सभी हो सकता है । किन्तु सन्तोंकी कृपासे प्राप्त हुए सत्संगका फल केवल परम पद ही होता है । भगवान्‌ तो दुष्टोंका उद्धार करते हैं उनका विनाश करके, पर सन्त दुष्टोंका उद्धार करते हैं उनकी वृत्तियोंका सुधार करके । भगवान्‌ अपने बनाये हुए कानूनमें बँधे हुए हैं । परन्तु सन्तोंमें दया आ जाती है । इस प्रकार भी सन्त भगवान्‌से बड़े हैं । भगवान्‌ सब जगह मिल सकते हैं, पर सन्त कहीं-कहीं ही हैं । अतएव वे भगवान्‌से दुर्लभ भी हैं‒

हरि दुरलभ नहिं जगत में,   हरिजन दुरलभ होय ।

हरि हेर्‌याँ सब जग मिलै, हरिजन कहिं एक होय ॥

      हमारा उद्धार करनेमें तो सन्त ही बड़े हुए, अतएव हमें उन्हींको बड़ा मानना चाहिये ।

      तात्त्विक दृष्टिसे देखें तो सन्त और भगवान्‌ दोनों एक ही हैं; क्योंकि सन्त भगवान्‌से पृथक् अपनी आसक्ति, ममता, रुचि आदि नहीं रखते । अतः वे भगवत्स्वरूप ही हैं‒

भक्ति भक्त भगवंत गुरु चतुर नाम, बपु एक ।

इन के पद बंदन किएँ नासत बिघ्न अनेक ॥

    (शेष आगेके ब्लॉगमें)

‒ ‘जीवनका कर्तव्य’ पुस्तकसे

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शनिवार, 27 अगस्त 2016

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❄ सन्त और उनकी सेवा :

      ‘तस्मिस्तज्जने भेदाभावात्’ (नारदभक्तिसूत्र ४१) ।

सन्त भगवान्‌से अपना अलग अस्तित्व नहीं मानते,इसलिये उनमें स्वार्थकी गन्ध भी नहीं रहती । भगवान्‌से अलग उनकी कोई इच्छा नहीं, वे स्वाभाविक ही भगवान्‌की इच्छामें अपनी इच्छा, उनकी रुचिमें अपनी रुचि मिलाये रहते हैं । अतः उनके हरेक विधानमें परम सन्तुष्ट रहते हैं ।

      सन्त भगवान्‌पर ही निर्भर रहते हैं ।‘जाही बिधि राखै राम, ताही बिधि रहिये’‒को वे अपने जीवनमें अक्षरशः चरितार्थ कर लेते हैं और इस प्रकार भगवान्‌के विधानानुसार रहनेमे वे बड़े प्रसन्न होते हैं । हमलोग भी भगवान्‌के विधानानुसार ही रहते हैं । (क्योंकि भगवान्‌की इच्छाके विरुद्ध एक पत्ता भी नहीं हिलता ।) पर उसमें हमारी प्रसन्नता नहीं होती, हमें बाध्य होकर रहना पड़ता है । यदि हममें मन-इन्द्रियाँके प्रतिकूल भगवद्‌विधानको बदलनेकी शक्ति-सामर्थ्य होती तो हम उसे अपने अनुकूल बना लेते । परन्तु क्या करें, हमारा वश नहीं चलता, तो भी शक्ति-सामर्थ्य न रहनेपर भी उससे बचनेका असफल प्रयत्न तो निरन्तर करते ही रहते हैं । पर सन्तमें ऐसी बात नहीं है, सन्तके मनमें भगवान्‌के विधानानुसार बरतनेमें कुछ भी विचार नहीं होता; प्रत्युत भगवान्‌के विधानके अनुसार प्राप्त परिस्थिति उसके लिये अनुकूल-से-अनुकूल प्रतीत होती है तथा उसके हृदयमें सदा-सर्वदा भगवान्‌के विराजमान रहनेके कारण उसपर प्रतिकूलताका कोई असर नहीं होता ।

      भगवान्‌ स्वयं कहते हैं‒

समोऽहं सर्वभूतेषु   न  मे  द्वेष्योऽस्ति  न  प्रियः ।

ये भजन्ति तु मां भक्त्या मयि ते तेषु चाप्यहम् ॥
                                                   (गीता ९/२९)

      ‘अर्जुन ! मैं सब भूतोंमें समभावसे व्यापक हूँ, न कोई मेरा प्रिय है, न अप्रिय है; परन्तु जो मुझको प्रेमसे भजते हैं, वे मुझमें हैं और मैं भी उनमें प्रत्यक्ष प्रकट हूँ ।’विचार कर देखें तो यह बात ठीक समझमें आ जाती है । जैसे एक अच्छा मकान है, उसमें किसीका कब्जा-दखल नहीं है, अतएव अच्छे पुरुषको उसमें स्वाभाविक ही प्रसन्नता होगी । इस प्रकार सन्तके अहंता-ममतासे रहित निर्मल अन्तःकरणमें भगवान्‌ प्रकटरूपसे रहकर बड़े प्रसन्न होते हैं; क्योंकि वहाँ उनके रहनेमें कोई किसी प्रकारका प्रतिबन्ध नहीं लगता, विघ्न नहीं डालता । भगवान्‌ ऐसे घरमें बड़े निःसंकोचभावसे रहते हैं । श्रीरामचरितमानसमें गोस्वामी तुलसीदासजी कहा है‒

जाहि न चाहिये कबहुँ कछु तुम्ह सन सहज सनेहु ।

बसहु  निरंतर  तासु  मन   सो   राउर निज  गेहु ॥

      इस प्रकार सन्तके हृदयमें भगवान्‌का वास होनेसे, वह जो कार्य करता है, वह भी भगवान्‌ ही करते हैं, वह जो भी सोचता है, वह भगवान्‌ ही सोचते हैं; इत्यादि कथन सर्वथा सत्य है ।

      सन्त और भगवान्‌के विषयमें तीन प्रकारकी बातें मिलती हैं‒ (१) दोनोंमें कुछ अन्तर नहीं ।

संत-भगवंत    अंतर   निरंतर     नहीं

किमपि मति मलिन कह दास तुलसी ॥

                                         (विनयपत्रिका)

     सन्त ही भगवान्‌ हैं और भगवान्‌ ही सन्त हैं अर्थात्‌ सन्तोंका भगवान्‌के अतिरिक्त कोई पृथक अस्तित्व ही नहीं रहता । केवल भगवान्‌ ही रह जाते हैं । किसने कहा भी है ‒

ढूँढ़ा  सब   जहाँमें  पाया   पता   तेरा  नहीं ।

जब पता तेरा लगा तो अब पता मेरा नहीं ॥

     (शेष आगेके ब्लॉगमें)

‒ ‘जीवनका कर्तव्य’ पुस्तकसे

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गुरुवार, 25 अगस्त 2016

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❄ सेवा (परहित) :

          संसारसे मिली हुई वस्तु केवल संसारकी सेवा करनेके लिये है और किसी कामकी नहीं ।

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        कोई वस्तु हमें अच्छी लगती है तो वह भोगनेके लिये नहीं है, प्रत्युत सेवा करनेके लिये है ।

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मनुष्यको वह काम करना चाहिये, जिससे उसका भी हित हो और दुनियाका भी हित हो, अभी भी हित हो और परिणाममें भी हित हो ।

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शरीरकी सेवा करोगे तो संसारके साथ सम्बन्ध जुड़ जायगा और (भगवान्‌के लिये) संसारकी सेवा करोगे तो भगवान्‌के साथ सम्बन्ध जुड़ जायगा ।

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         जिसके हृदयमें सबके हितका भाव रहता है, वह भगवान्‌के हृदयमें स्थान पाता है ।

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      परमार्थ नहीं बिगड़ा है, प्रत्युत व्यवहार बिगड़ा है; अतः व्यवहारको ठीक करना है । व्यवहार ठीक होगा‒स्वार्थ और अभिमानका त्याग करके दूसरोंकी सेवा करनेसे ।

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         दूसरोंके हितका भाव रखनेवाला जहाँ भी रहेगा, वहीं भगवान्‌को प्राप्त कर लेगा ।

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       भगवान्‌के सम्मुख होनेके लिये संसारसे विमुख होना है और संसारसे विमुख होनेके लिये निष्कामभावसे दूसरोंकी सेवा करनी है ।

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        सेवाके लिये वस्तुकी कामना करना गलती है । जो वस्तु मिली हुई है, उसीसे सेवा करनेका अधिकार है ।

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         संसारमें दूसरोंके लिये जैसा करोगे, परिणाममें वैसा ही अपने लिये हो जायगा । इसलिये दूसरोंके लिये सदा अच्छा ही करो ।

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         जो अपने स्वार्थ और अभिमानका त्याग करके केवल दूसरोंके हितमें लगा है, उसका जीना ही वास्तवमें जीना है ।

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        जो सेवा लेना चाहते हैं, उनके लिये तो वर्तमान समय बहुत खराब है, पर जो सेवा करना चाहते हैं, उनके लिये वर्तमान समय बहुत बढ़िया है ।

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           हमारी किसी भी क्रियासे किसीको किंचिन्मात्र भी दुःख न हो‒यह भाव ‘सेवा’ है ।

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निस्वार्थभावसे दूसरोंकी सेवा करनेसे व्यवहार भी बढ़िया होता है और ममता भी टूट जाती है ।

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         घरवालोंकी सेवा करनेसे मोह होता ही नहीं । मोह होता है कुछ-न-कुछ लेनेकी इच्छासे ।

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        भगवान्‌को प्राप्त करके मनुष्य संसारका जितना उपकार कर सकता है, उतना किसी दान-पुण्यसे नहीं कर सकता ।

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       जो हमसे द्वेष रखता है, उसकी सेवा करनेसे अधिक लाभ होता है; क्योंकि वहाँ सेवाका सुखभोग नहीं होता ।

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          कभी सेवाका मौका मिल जाय तो आनन्द मनाना चाहिये कि भाग्य खुल गया !

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        सम्पूर्ण प्राणियोंके हितसे अलग अपना हित माननेसे अहम् बना रहता है, जो साधकके लिये आगे चलकर बाधक होता है । अतः साधकको प्रत्येक क्रिया संसारके हितके लिये ही करनी चाहिये ।

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नारायण ! नारायण !! नारायण !!!

‒ ‘अमृत-बिन्दु’ पुस्तकसे

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बुधवार, 24 अगस्त 2016

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❄सेवा (परहित) :

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          दूसरोंका अहित करनेसे अपना अहित और दूसरोंका हित करनेसे अपना हित होता है‒यह नियम है ।

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      संसारका सम्बन्ध ‘ऋणानुबन्ध’ है । इस ऋणानुबन्धसे मुक्त होनेका उपाय है‒सबकी सेवा करना और किसीसे कुछ न चाहना ।

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साधक परमात्माके सगुण या निर्गुण किसी भी रूपकी प्राप्ति चाहता हो, उसे सम्पूर्ण प्राणियोंके हितमें रत होना अत्यन्त आवश्यक है ।

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साधकको संसारकी सेवाके लिये ही संसारमें रहना है, अपने सुखके लिये नहीं ।

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सच्चे हृदयसे भगवान्‌की सेवामें लगे हुए साधकके द्वारा प्राणिमात्रकी सेवा होती है; क्योंकि सबके मूल भगवान्‌ ही हैं ।

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साधकको अपने ऊपर आये हुए बड़े-से-बड़े दुःखको भी सह लेना चाहिये और दूसरेपर आये छोटे-से-छोटे दुःखको भी सहन नहीं करना चाहिये ।

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दूसरोंको सुख पहुँचानेकी इच्छासे अपनी सुखेच्छा मिटती है ।

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किसीको किंचिन्मात्र भी दुःख न हो‒यह भाव महान्‌ भजन है ।

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जैसे मनुष्य आफिस जाता है तो वहाँ केवल आफिसका ही काम करता है, ऐसे ही इस संसारमें आकर केवल संसारके लिये ही काम करना है, अपने लिये नहीं । फिर सुगमतापूर्वक संसारसे सम्बन्ध-विच्छेद और नित्यप्राप्त परमात्माका अनुभव हो जायगा ।

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समय, समझ, सामग्री और सामर्थ्य‒इन चारोंको अपने लिये मानना इनका दुरुपयोग है और दूसरोंके हितमें लगाना इनका सदुपयोग है ।

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संयोगजन्य सुखके मिलनेसे जो प्रसन्नता होती है, वही प्रसन्नता अगर दूसरोंको सुख पहुँचानेमें होने लग जाय तो फिर कल्याणमें सन्देह नहीं है ।

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हमें जो सुख-सुविधा मिली है, वह संसारकी सेवा करनेके लिये ही मिली है ।

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मनुष्यशरीर अपने सुख-भोगके लिये नहीं मिला है, प्रत्युत सेवा करनेके लिये, दूसरोंको सुख देनेके लिये मिला है ।

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मनुष्यको भगवान्‌ने इतना बड़ा अधिकार दिया है कि वह जीव-जन्तुओंकी, मनुष्योंकी, ऋषि-मुनियोंकी, सन्त-महात्माओंकी, देवताओंकी, पितरोंकी, भूत-प्रेतोंकी, सबकी सेवा कर सकता है । और तो क्या, वह साक्षात् भगवान्‌की भी सेवा कर सकता है !

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(शेष आगेके ब्लॉगमें)

‒ ‘अमृत-बिन्दु’ पुस्तकसे

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मंगलवार, 23 अगस्त 2016

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❄ विनाशीका आकर्षण कैसे मिटे ?

(गत ब्लॉगसे आगेका)

       इतना तो ख्याल करो आप ! आज जन्मे तब, जितना जीना था, उस समय जितनी उमर थी, अभी उतनी उमर बाकी है क्या ? तो उमर घट रही है न ! जीना मरनेमें जा रहा है न, संयोग मिट रहा है न ! पहले शरीर नहीं था, फिर शरीर नहीं रहेगा । वर्तमान अवस्थामें शरीर है, इस समय भी इससे प्रतिक्षण वियोग हो रहा है । यह बात तो समझमें आती है न, आकर्षण मत छूटे भले ही, पर इस बातको समझो आप, कि प्रतिक्षण शरीरके साथ वियोग हो रहा है । यह विवेक जितना दृढ़ होगा, उतना ही इसके छूटनेमें सहायता मिलेगी । जो सदा साथमें नहीं रहता, उसके साथ क्या मोह करें, ये हमारे साथ रह नहीं सकते, इसमें कोई सन्देह है क्या ? तो आप छूटता नहीं, इसकी चिन्ता मत करो, पर इस बातपर जोर दो कि वास्तवमें इनके साथ हम नहीं हैं और हमारे साथ ये नहीं हैं । जड़ कट गयी इस सम्बन्धकी, इतनी बात होते ही । इनका सम्बन्ध जो आज दृढ़ दीखता है और आज आप कहते हो कि यह छूटता नहीं है । इसकी जड़ कट गयी आज ।इसपर दृढ़ रहो कि ये हमारे साथ हरदम रहनेवाले नहीं हैं । तो इनकी ममता छोड़नेमें क्या जोर आता है ?

      श्रोता‒इसपर दृढ़ कैसे रहें ?

      स्वामीजी‒इसका चिन्तन करके, इसपर विचार करके इसपर दृढ़ रहो कि बात यही सच्ची है । इनके साथ हम हरदम नहीं रहते । १. पहले नहीं थे, २. पीछे नहीं रहेंगे और ३. वर्तमान अवस्थामें भी नहीं रह रहें हैं, यह तीन बात है । इसमें सन्देह नहीं है, तो इस बातका आदर करो, इस बातको महत्त्व दो । जैसे आजकल अगर १० रुपये भी मिल जायँ तो उसका आदर होता है, १०० मिल जायँ तो उनका आदर होता है, पर यह बात लाखों और करोड़ों रुपये देनेपर भी नहीं मिल सकती । क्या रुपयोंके बलपर यह बात मिल सकती है ? हाँ, कोई पण्डित बता देगा, पढ़ा देगा; परन्तु ठीक तरहसे यह बात रुपयोंके बलपर नहीं मिलती । कितने ही रुपये मिल जायँ तो भी रुपयोंसे सन्तोष नहीं होता, शान्ति नहीं मिलती और इस बातको ठीक तरहसे समझनेसे शान्ति मिलती है । अगर कुछ नहीं मिलता तो इतनी जल्दी इतने आदमी यहाँ जंगलमें क्यों आते हैं ? इससे सिद्ध होता है कि कुछ-न-कुछ मिलता है । यह बहुत विचित्र ढंगकी बात है । इस बातका आदर कम करते हैं, इस बातको महत्त्व नहीं देते हो, यहाँ गलती होती है ।

      श्रोता‒यह गलती कैसे मिटे ?

     स्वामीजी‒आजसे ही इस बातको महत्त्व दो कि यह बात वास्तविक है और वर्तमानमें लाभ दीखता है । क्या लाभ दीखता है कि पहले कोई चीज खो जाती थी तो कितनी चिन्ता होती थी ? और आज वैसी चीज खो जाय तो कितनी चिन्ता होती है ? इसमें नाप करोगे तो मेरी समझमें आपको फर्क मालूम देगा । फर्क पड़ा है तो इतना छूटा है न ! तो छूटेगा नहीं यह कैसे कहते हो ! पहले पकड़में जितनी दृढ़ता थी, उतनी दृढ़ता है क्या आज ? तो छूट रही है न ! सर्वथा नहीं छूटा, यह बात भी ठीक है ।इसमें सन्तोष मत करो; परन्तु छूटता नहीं है, यह कैसे मानते हो ? आपसे छूटता नहीं है, यह बात मत मानो और सर्वथा छूट गया, यह बात भी मत मानो, क्योंकि सर्वथा छूटा नहीं है; परन्तु छूट तो रहा है ।

   (शेष आगेके ब्लॉगमें)

‒ ‘भगवत्प्राप्ति सहज है’ पुस्तकसे

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❄ विनाशीका आकर्षण कैसे मिटे ?

(गत ब्लॉगसे आगेका)

       जैसे ‘मैं-पन’ है, यह तो बदलता रहता है, मैं खाता हूँ, मैं सोता हूँ । मैं जाता हूँ; परन्तु मेरी सत्ता (होनापन) तो एक ही है । सुषुप्ति-अवस्थामें ‘मैं-पन’ तो अज्ञानमें लीन हो जाता है; परन्तु आप ‘स्वयम्’ तो रहते हैं । ‘मैं-पन’ के भावका-अभावका‒दोनोंका ज्ञान आपको खुदको होता है । अभी ‘मैं-पन’ का भाव है, सुषुप्ति-अवस्थामें ‘मैं-पन’ का अभाव हो जाता है, तो ‘मैं-पन’ का अभाव होनेपर भी मेरी सत्ता रहती है । तो ‘मैं-पन’ से अलग हमारी स्वतन्त्र सत्ता है, ‘मैं-पन’ तो प्रकट और अप्रकट होता है, पर हमारी सत्ता अप्रकट नहीं होती, प्रकट ही रहती है । हमारी सत्ताके साथ जब ‘मैं-पन’ भी नहीं है तो शरीरका साथ कहाँ है ? और जब शरीर भी साथ नहीं है तो स्त्री, पुरुष, कुटुम्बी साथ कहाँ है ? तो मैं खुद (स्वयं) तो इनसे अलायदा हूँ, ये सब उत्पत्ति-विनाशशील हैं । इनको मैं जानता हूँ, ये सब मेरे जाननेमें आते हैं । ये सब उत्पत्ति-विनाशशील हैं इसका मेरेको ज्ञान है ।

      तीसरी बात, ‘मैं’ कल था, वही आज हूँ और रात्रिमें भी मैं था, तो ‘मैं’ नित्य-निरन्तर रहता हूँ । ये निरन्तर नहीं रहते, मेरे सामने बनते-बिगड़ते हैं, मिटते हैं । इनको मैं महत्त्व देकर इनका आश्रय लेता हूँ, यह गलती करता हूँ । मैं जानता हूँ कि ये उत्पत्ति-विनाशशील हैं, ये मेरा आधार कैसे हो सकते हैं ? ये मेरा आश्रय कैसे हो सकते हैं ? ये मेरेको क्या सहारा दे सकते हैं ? जो कि मैं इनसे अलायदा हूँ । ये सब मेरे जाननेमें आते हैं, सुषुप्तिमें कुछ भी ज्ञान नहीं था, यह भी जाननेमें आता है और जाग्रत्‌, स्वप्नमें जो ज्ञान होता है, यह भी मेरे जाननेमें आता है । मैं (स्वयं) इन सबको जाननेवाला हूँ; मैं जाननेवाला, जाननेमें आनेवाली वस्तुओंसे अलग हूँ ।इसमें कोई सन्देह है क्या ? सन्देह नहीं है न ? तो ‘मैं’ इनसे अलग हूँ इसपर आप स्थिर हो जाओ । दिनमें, रातमें, सुबह-शाम जब आपको समय मिले तब कहो कि मैं वास्तवमें इनके साथ नहीं हूँ और ये मेरे साथ नहीं है । मैं इनके साथ सुषुप्तिमें भी नहीं रह सकता तो मरनेके बाद कैसे रहूँगा ? और ये मेरे साथ सुषुप्तिमें भी नहीं रह सकते तो सदा मेरे साथ कैसे रहेंगे ? अतः इनका हमारा सम्बन्ध नित्य रहनेवाला नहीं है । इसका ज्ञान तो प्रत्यक्ष होना चाहिये न ?

      संसारका आकर्षण न छूटे तो कोई परवाह नहीं, परन्तु यह ज्ञान तो हैं न; कि इनके साथ मेरा नित्य-सम्बन्ध नहीं है ? इस ज्ञानमें तो सन्देह नहीं है न ? यह बात आप धारण कर लो । आकर्षण‒छूटे-न-छूटे इसकी परवाह मत करो, पर मेरे साथ इसका सम्बन्ध नहीं है । पहले नहीं था और फिर नहीं रहेगा । यह बात तो हमारे अनुभवकी है । इस जन्ममें भी जिस कुटुम्बके साथ, जिस घरके साथ, जिन रुपये-पैसोंके साथ, वस्तुओंके साथ आज हमारा सम्बन्ध है, यह सम्बन्ध पहले था क्या ? और अगाड़ी भी रहेगा क्या ? तो पहले हमारे साथ सम्बन्ध नहीं था, अगाड़ी इनका सम्बन्ध हमारे साथ नहीं रहेगा और जो अभी है, वही भी वियुक्त हो रहा है । यह बात मुझे अच्छी लगती है, इस वास्ते मैं बार-बार कहता हूँ ।

    (शेष आगेके ब्लॉगमें)

‒ ‘भगवत्प्राप्ति सहज है’ पुस्तकसे

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सोमवार, 22 अगस्त 2016

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❄ विनाशीका आकर्षण कैसे मिटे ?

(गत ब्लॉगसे आगेका)

       यह बात विशेष ध्यान देनेकी है कि गाढ़ नींदमें ‘मैं’ हूँ‒ऐसा ज्ञान नहीं होता है । मैं अभी सुषुप्तिमें हूँ, मुझे होश नहीं है यह ज्ञान होनेकी प्रक्रियामें छः सन्निकर्ष (सम्बन्ध) है, वह सन्निकर्षसे ज्ञान होता है जैसे‒ ‘घटोऽयम्’ ज्ञान हुआ तो घटके साथ हमारा सम्बन्ध हुआ नेत्रोंके द्वारा तथा नेत्रोंके साथ सम्बन्ध हुआ हमारे मनका और मनका सम्बन्ध स्वयं आत्माके साथ हुआ तब हमें ‘घटोऽयम्’ ज्ञान हुआ‒यह है सन्निकर्ष, तो हमें घटाकार ज्ञान मनके सम्बन्धसे हुआ । नेत्रोंका सम्बन्ध घटके साथ हुआ, मनका सम्बन्ध नेत्रोंके साथ हुआ और ‘स्वयम्’ आत्माका सम्बन्ध मनके साथ हुआ तो मनके संयोगसे आत्मामें ज्ञान होता है । अगर मनका सम्बन्ध न हो तो आत्मामें ज्ञान नहीं होता । इस वास्ते ज्ञान गुणक आत्मा है न्यायकी दृष्टिसे । ज्ञान इसमें गुण है । आठ गुण हैं इसके, वे प्रकट होते हैं । आत्मा गुणोंवाला है न्यायशास्त्रके अनुसार । वेदान्त और सांख्य कहते हैं कि इसमें गुण नहीं है, यह निर्गुण है, असंग है, ऐसी असंगता बताते हैं । तो अच्छे पढ़े-लिखोंसे मैंने पूछा है, मेरी बातें हुई हैं, मैंने कोई परीक्षा नहीं की है । उनसे बात समझमें आयी है कि बिना मनके संयोगके ज्ञान नहीं होता । अच्छे पढ़े-लिखे सब शास्त्रोंके जानकार कहते हैं कि बिना मनके संयोगके सुषुप्तिमें ज्ञान नहीं होता तो हम कैसे समझें कि आत्मा ज्ञानस्वरूप है ? इस विषयमें मेरी जो धारणा है वह बताता हूँ । सुषुप्ति-अवस्थामें ‘मैं हूँ’‒ऐसा ज्ञान नहीं होता; परन्तु सुषुप्तिमें मेरेको कुछ भी ज्ञान नहीं था । जगनेके बाद ऐसा अनुभव होता है कि मेरेको कुछ भी पता नहीं था । यह ज्ञान तो उस समयमें हुआ है न ?

       प्रश्न‒महाराजजी ! यह ज्ञान तो जगनेके बाद हुआ है न ?

      उत्तर‒जगनेके बाद तो स्मृति होती है । स्मृतिका लक्षण न्यायमें आता है‘अनुभवजन्यं ज्ञानं स्मृतिः’ अनुभवजन्य हो और ज्ञान हो, उसका नाम स्मृति है तो मेरेको कुछ भी पता नहीं था, यह भूतकालकी बात कहते हो । यह वर्तमानकी बात नहीं है । थोड़ा ध्यान दें आप ! मेरेको कुछ भी ज्ञान नहीं, यह वर्तमानकी बात तो नहीं है न ? यह तो भूतकालकी बात है और वर्तमान अभी जाग्रत्‌-अवस्थामें है । तो मुझे कुछ भी ज्ञान नहीं था, यह सुषुप्तिका ज्ञान है । भूतकालकी स्मृति होती है तो भूतकालमें ऐसा ज्ञान था यह बात माननी पड़ेगी, नहीं तो मुझे कुछ भी पता नहीं था, यह कैसे कहते हो ? और इसमें कुछ सन्देह भी नहीं है । तो मुझे कुछ भी पता नहीं था और मैं सुखपूर्वक सोया था यह ज्ञान सुषुप्तिमें है । और कुछ नहीं था, सब ज्ञानके अभावका ज्ञान तो है ही । यह एक बात हुई ।

      दूसरी बात ख्याल करनेकी यह है कि मैं पहले जगता था, बीचमें नींद आ गयी । अब मैं जगा हूँ तो हमारा स्वरूप (होनापन) पहले जाग्रत्‌में बीचमें सुषुप्ति (गाढ़ नींद) में और अब जगनेके बाद एक ही रहता है । अथवा जगता था तब तो मैं था और अब जगता हूँ तब मैं हूँ, तथा बीचमें नींदमें ‘मैं’ नहीं था‒ऐसा होता है क्या कभी ? नहीं होता, तो अपने ज्ञानका भाव भी है ।सुषुप्ति-अवस्थामें और जगनेके बाद अभी ‘मैं’ वही हूँ, तो मेरा होनापन तीनों अवस्थाओंमें एक ही रहा । यह जो ज्ञान है सुषुप्तिका (सब ज्ञानके अभावका ज्ञान और सुखपूर्वक सोया था‒यह ज्ञान) इसमें मन, बुद्धि नहीं है । तो मन, बुद्धिके संयोगके बिना, अपनी सत्ताका ज्ञान कैसे होता है ? तो स्वयंका ज्ञान स्वयंको है, यह मानना पड़ेगा । उस समयमें दूसरी सामग्रीका अभाव है, इन्द्रियाँ, मन, बुद्धि, अहम्‒ये सब नहीं दीखते, पर अपनी सत्ताका बोध तो है । इस सत्ताके बोधपर गहरा विचार करो ।

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‒ ‘भगवत्प्राप्ति सहज है’ पुस्तकसे

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रविवार, 21 अगस्त 2016

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❄ विनाशीका आकर्षण कैसे मिटे ?

      प्रश्न‒महाराजजी ! सुनते हैं, समझते हैं, जानते हैं फिर भी उत्पत्ति-विनाशशील पदार्थों, व्यक्तियोंमें आकर्षण हो जाता है । यह आकर्षण कैसे मिटे ?

      उत्तर‒देखिये, आपको यह पता तो लगा है । नहीं तो आज मनुष्योंको यह बात जँचती ही नहीं है कि ये वस्तुएँ, पदार्थ, व्यक्ति उत्पत्ति-विनाशशील हैं और मैं ‘स्वयम्’ उत्पत्ति-विनाशरहित हूँ । इतने अलगावका पता लगना कम बात नहीं है । लोग तो एक ही मानते हैं । उनको इस बातका पता नहीं है कि हम रहनेवाले हैं और ये उत्पन्न नष्ट होनेवाले हैं । उनका तो ‘कामोपभोगपरमा एतावदिति निश्चिताः’ (गीता १६/११) । कामना करना और भोग भोगना यही निश्चय होता है । आपने इतना देखा तो है कि भाई ! ये उत्पत्ति-विनाशशील हैं । ये हमारे साथ नहीं रह सकते, हम इनके साथ नहीं रह सकते, ऐसा जो खयाल हो गया, यह काम कम नहीं हुआ है । यह भी आप साधारण मनुष्योंमें देखो तो आपको पता लगे । पढ़े-लिखे लोगोंके साथ बैठो तो पता लगे आपको । आप अपनी अवस्थापर विचार करो ।

      जैसे, पहले जब मैं आनन्द-आश्रममें आया था, उस समय सुबह सत्संगकी बाते होती थीं । उस समय भी आप आते थे । उस समय आपकी क्या धारणा थी और आज आपकी क्या धारणा है ?

        श्रोता‒महाराजजी ! अन्तर तो बहुत हुआ है ।

स्वामीजी‒बहुत हुआ है न ! तो दो बातें हैं इसमें, पहली बात इतना अन्तर हुआ है तो आपको लाभ हो रहा है और लाभ जरूर होगा; परन्तु अब विचार पक्का कर लो कि हमें यही काम करना है । दूसरी बात यह है कि इतने लाभामें सन्तोष नहीं करना है; क्योंकि लाभ हुआ है हमारे; परन्तु जैसा लाभ होना चाहिये था, वैसा नहीं हुआ । तो हमारा उत्पत्ति-विनाशशील पदार्थोंमें आकर्षण होता है और हम स्वयं उत्पत्ति-विनाशशील नहीं है । शरीर, मन, बुद्धि, इन्द्रियाँ आदि जितनी प्राकृतिक सामग्री हैं, वे परिवर्तनशील हैं; परन्तु हम स्वयं उत्पत्ति-विनाशशील नहीं है । यह बात आती है न समझमें ! इस विषयको गहराईसे समझो, बहुत लाभकी बात है !

      हमारा जो होनापन है न, ‘मैं हूँ’ । इस होनापनकी तरफ आप ध्यान दें । शास्त्रकी तथा सन्तोंकी दृष्टिके अनुसार पहले भी मैं था और अगाड़ी भी मैं रहूँगा; क्योंकि पहले जन्ममें किये हुए कर्मोंका फल-भोग अभी हो रहा है और इस जन्ममें जितने कर्म किये जाते हैं इन कर्मोंका फल-भोग अगाड़ी जन्ममें होगा । तो पीछेका जन्म, अगाड़ीका जन्म और यह जन्म‒ये तीनों जन्म हमारे विचारसे सामने दीखते हैं और हम तीनों जन्मोंमें वही रहते हैं । तो वास्तवमें ‘मैं नित्य हूँ और ये जन्म अनित्य हैं’ इतनी बात तो समझमें आ ही जानी चाहिये । अब अपना जो होनापन है ‘मैं हूँ’, इसकी तरफ खयाल करना है कि ‘मैं’ क्या हूँ ?, तो ‘मैं हूँ’ यह जो सत्ता है‒मेरा होनापन, यह मेरा स्वरूप है । अभी इसका स्पष्ट अनुभव न हो तो भी आप समझ लो कि मेरा जो होनापन है, वह जाग्रतमें भी है, स्वप्नमें भी है और सुषुप्तिमें भी है । तीन अवस्थाएँ होती हैं‒जाग्रत्‌-अवस्था, स्वप्न-अवस्था और सुषुप्ति-अवस्था । ये अवस्थाएँ बदलती रहती हैं और ‘मैं’ तीनों अवस्थाओंमें एक रहता हूँ, मेरेमें परिवर्तन नहीं होता ।औ

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शुक्रवार, 19 अगस्त 2016

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🌹 संत अमृत वाणी :

( गत ब्लाग से आगे )

🌹 अनित्य सुखकी रुचि मिटानेकी आवश्यकता :

श्रोता‒अखण्ड साधन कैसे हो ?

स्वामीजी‒अखण्ड साधन होगा सांसारिक सुखकी आसक्ति छोड़नेसे । सांसारिक वस्तुओंके संग्रहकी और उनसे सुख लेनेकी रुचिका अगर आप नाश कर दें तो निहाल हो ही जाओगे, इसमें किंचिन्मात्र भी सन्देह नहीं है । मैं रुपयोंका त्याग करनेकी बात नहीं कहता हूँ, साधु बननेकी बात नहीं कहता हूँ । मैं आपसे हाथ जोड़कर विशेषतासे प्रार्थना करता हूँ कि संग्रहकी और भोगकी जो रुचि है, उस रुचिका आप किसी तरहसे नाश कर दें । अगर उस रुचिका नाश हो जाय तो बहुत बड़ा लाभ होगा । रुचिसे आपका और दुनियाका पतन होगा, इसके सिवाय कुछ नहीं मिलेगा । संग्रह और भोगकी रुचि बड़ा भारी पतन करनेवाली चीज है, इसमें कोई सन्देह नहीं है । नाशवान्‌की तरफ रुचि महान्‌ अनर्थका हेतु है । विष खा लेनेसे इतनी हानि नहीं है, जितनी हानि इससे है‒

‘हा हन्त हन्त विषभक्षणतोऽप्यसाधु’ ।

अष्टावक्रगीतामें लिखा है‒

मुक्तिमिच्छसि चेत्तात विषयान्विषवत्त्यज । (१/२)

‘यदि मुक्तिकी इच्छा रखते हो तो विषयोंका विषके समान त्याग कर दो ।’

एक ही बात है कि संसारकी रुचि नष्ट होनी चाहिये । उस रुचिकी जगह भगवान्‌की रुचि हो जाय, तत्त्वज्ञानकी रुचि हो जाय, मुक्तिकी रुचि हो जाय, भगवत्प्रेमकी रुचि हो जाय, भगवद्दर्शनकी रुचि हो जाय तो निहाल हो जाओगे, इसमें किंचिन्मात्र भी सन्देह नहीं है । जीनेकी रुचिसे आप जी नहीं सकते । जीनेकी रुचि रखते हुए भी मरना पड़ेगा । अगर जीनेकी रुचिका त्याग कर दो तो कोई हानि नहीं होगी, प्रत्युत बड़ा भारी लाभ होगा । रुचिको कम कर दिया जाय तो भी बहुत लाभ होता है । रुचिके वशमें न हों तो भी बड़ा भारी लाभ होता है‒

‘तयोर्न वशमागच्छेत्’ (गीता ३/३४) ।

अगर इसको नष्ट कर दो, तब तो कहना ही क्या है !

श्रोता‒रुचि नष्ट नहीं होती है महाराज !

स्वामीजी‒रुचि नष्ट नहीं होती है‒यह आपके वर्तमानकी दशा है । रुचि नष्ट न होती हो‒ऐसी बात है ही नहीं । यह रहनेकी चीज नहीं है । बालकपनमें खिलौनेमें जो रुचि थी, वह आज है क्या ? कंकड-पत्थरोंमें, काँचके लाल-पीले टुकड़ोंमें जो रुचि थी, वह रुचि आज है क्या ? रुचि मिटती नहीं‒यह बात नहीं है,रुचि तो टिकती ही नहीं, ठहरती ही नहीं । आप नयी-नयी रुचि पैदा कर लेते हो और कहते हो कि मिटती नहीं ! रुचि टिक सकती नहीं । नाशवान्‌की रुचि नाशवान् ही होती है । परमात्माकी रुचि हो तो वह मिटेगी नहीं, प्रत्युत परिणाममें परमात्माकी प्राप्ति करा देगी । गीता कहती है‒

जिज्ञासुरपि योगस्य शब्दब्रह्मातिवर्तते। (६/४४)

ऐसी जिज्ञासा न हो तो कोई बात नहीं । संसारकी रुचि हट जाय तो योगकी जिज्ञासा भी हो जायगी । रुचि हटती नहीं‒यह बिलकुल गलत बात है । रुचि मिटती नहीं‒यह तो आपकी दशा है, जिसको लेकर आप बोल रहे हो ।

भोग और संग्रहकी रुचि महान्‌ अनर्थकारक है । सन्तोंके संगको मुक्तिका दरवाजा और भोगोंकी रुचिवाले पुरुषोंके संगको नरकोंका दरवाजा बताया गया है‒

‘महत्सेवां द्वारमाहुर्विक्तेस्तमोद्वारं योषितां सङ्गिसङ्गम्’
(श्रीमद्भागवत ५/५/२) ।

भोगोंका संग इतना नुकसानदायक नहीं है, जितना भोगोंकी रुचिवालोंका संग नुकसानदायक है । कोढ़ीके संगसे कोढ़ हो जाय, इस तरहकी बात है । अतः भोगोंकी रुचि रखनेमें आपका और दुनियाका बड़ा भारी नुकसान है और इसका त्याग करनेमें बड़ा भारी हित है । इसलिये कृपा करके दुनियाका हित करो । हित न कर सको तो कम-से-कम अहित तो मत करो ।

     (शेष आगेके ब्लॉगमें)

‒ ‘नित्ययोगकी प्राप्ति’ पुस्तकसे

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गुरुवार, 18 अगस्त 2016

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🌹सुखासक्तिसे छूटनेका उपाय :

( गत ब्लाग से आगे )

बहुत वर्षोंतक मेरेमें यह जाननेकी लालसा रही कि गडबड़ी कहाँ है ? बाधा किस जगह लग रही है ? न चाहते हुए भी मनमें मान-बड़ाईकी, आदर-सत्कारकी, पदार्थोंकी इच्छा हो जाती है, तो यह कहाँ टिकी हुई है ? यह छूटती क्यों नहीं ? वर्षोंके बाद इसकी जड़ मिली, वह है‒सुखकी लोलुपता । हमें यह बात वर्षोंके बाद मिली, आपको सीधी बता दी । आपको सुगमतासे मिल गयी, इसलिये आप इसका आदर नहीं करते । यदि कठिनतासे मिलती तो आप आदर करते । आप पहाड़ोंमें भटकते, बद्रीनारायण जाते, खूब तलाश करते और इस तरह भटकते-भटकते कोई सन्त मिल जाता तथा वह यह बात कहता तो आप इसका आदर करते । अब रुपये कमाते हो, कुटुम्बके साथ घरोंमें मौजसे बैठे हो और सत्संगकी बातें मिल जाती हैं तो आप उनका महत्त्व नहीं मानते । उलटे ऐसा मानते हो कि स्वामीजी तो यों ही कहते हैं, ये दुकानपर बैठें तो पता लगे ! इस तरह आप अपनी ही बातको प्रबल करते हो । सिद्ध क्या हुआ ? कि हमारी बात सच्ची है, इनकी (स्वामीजीकी) बात कच्ची है । आपने विजय तो कर ली, पर फायदा क्या हुआ ? आप जीत गये, हम हार गये, पर जीतमें आपका ही नुकसान ही हुआ ।

एक धनी आदमीने कहा कि स्वामीजी रुपयोंके तत्त्वको जानते नहीं तो मैंने कहा कि देखो, मैंने रुपये रखे भी हैं और उनका त्याग भी किया है, इसलिये दोनोंको जानता हूँ । परन्तु आपने रुपये रखे हैं, उनका त्याग नहीं किया है, इसलिये आप एक ही बातको जानते हो, दोनोंको नहीं जानते । कोई तत्त्व नहीं है रुपयोंमें । आप लोभसे दबे हुए हो, आपने रुपयोंका महत्त्व स्वीकार कर लिया है, फिर कहते हो कि हम जानते हैं । धूल जानते हो आप ! जानते हो ही नहीं ।

परमात्माको जाननेके लिये परमात्माके साथ अभिन्न होना पड़ता है और संसारको जाननेके लिये संसारसे अलग होना पड़ता है । परमात्मासे अलग रहकर परमात्माको नहीं जान सकते और संसारसे मिले रहकर संसारको नहीं जान सकते‒यह सिद्धान्त है । ऐसा सिद्धान्त क्यों है ? कि वास्तवमें आप परमात्माके साथ अभिन्न हो और संसारसे अलग हो । परन्तु आपने अपनेको परमात्मासे अलग और संसारसे अभिन्न मान लिया, अब कैसे जानोगे ? जो बीड़ी, सिगरेट आदि पीता है, वह बीड़ी आदिको जान नहीं सकता । जो इनको छोड़ देता है, उसको इनका ठीक-ठाक ज्ञान हो जाता है । एक बार मैंने कहा कि चाय छोड़ दो ।बहुतोंने चाय छोड़ दी । पासमें ही एक वकील बैठे थे, वे कुछ भी बोले नहीं । तीन-चार दिन बादमें वे मेरे पास आये और बोले कि चाय तो मैंने भी उसी दिन छोड़ दी थी, पर सभामें मेरी बोलनेकी हिम्मत नहीं हुई ।चाय छोड़नेके बाद यह बात मेरी समझमें आयी कि जिस प्यालेसे गोमांसभक्षी चाय पीता है, छूतकी महान्‌ बीमारीवाला चाय पीता है, उसी प्यालेसे हम चाय पीते हैं ! इससे सिद्ध हुआ कि संसारको छोड़े बिना उसके तत्वको नहीं जान सकते ।

सत्‌की प्रप्तिकी लालसा करो तो असत्‌ छूट जायगा और असत्‌का त्याग कर तो सत्‌की प्राप्ति हो जायगी । दोनोंमेंसे कोई एक करो तो दोनों हो जायँगे । असत्‌का संग करते हुए, आसक्ति रखते हुए असत्‌को नहीं जान सकते और सत्‌से दूर रहकर बड़ी-बड़ी पण्डिताईकी बातें बघार लो, षट्‌शास्त्री पण्डित बन जाओ, तो भी सत्‌को नहीं जान सकते ।

संसारकी आसक्ति दूर करनेका सुगम उपाय है‒दूसरोंको सुख देना । माता, पिता, स्त्री, पुत्र, भाई, भौजाई आदि सबको सुख दो, पर उनसे सुख मत लो तो सुगमतासे आसक्ति छूट जायगी ।

नारायण ! नारायण !! नारायण !!!

‒ ‘स्वाधीन कैसे बनें ?’ पुस्तकसे

( शेष आगे के ब्लाग में )

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बुधवार, 17 अगस्त 2016

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🌹 सुखासक्तिसे छूटनेका उपाय :

( गत ब्लाग से आगे )

एक राजपूत था और एक बनिया था । दोनों आपसमें भिड़ गये तो राजपूतको गिराकर बनिया ऊपर चढ़ बैठा । राजपूतने उससे पूछा‒अरे ! तू कौन है ? उसने कहा‒मैं बनिया हूँ । सुनते ही राजपूतने जोशमें आकर कहा कि अरे ! बनिया मेरेको दबा दे ! यह कैसे हो सकता है ! और चट बनियेको नीचे दबा दिया । यह तो एक दृष्टान्त है ।तात्पर्य यह है कि आप तो निरन्तर रहनेवाले हो और कामना निरन्तर रहनेवाली है ही नहीं । जैसे राजपूतने सोचा कि मैं तो क्षत्रिय हूँ, मेरेको बनिया नहीं दबा सकता, ऐसे ही आप भी राजपूत हो, भगवान्‌के पूत हो; आप विचार करो कि असत्‌की कामना मेरेको कैसे दबा सकती है ? कामना भी असत्‌की और कामना खुद भी असत्‌, वह सत्‌को दबा दे‒यह हो ही नहीं सकता । बस, इतनी ही बात है । लम्बी-चौड़ी बात है ही नहीं । अब इसमें क्या कठिनता है, आप बताओ ? एकदम सीधी बात है । आप थोड़ी हिम्मत रखो कि मैं तो हरदम रहनेवाला हूँ । बालकपनसे लेकर अभीतक मैं वही हूँ । मैं पहले भी था, अब भी हूँ और बादमें भी रहूँगा, नहीं तो किये हुए कर्मोंका फल आगे कौन भोगेगा ? मैं तो रहनेवाला हूँ और ये शरीर आदि असत्‌ वस्तुएँ रहनेवाली हैं ही नहीं । इनके परवश मैं कैसे हो सकता हूँ ? नहीं हो सकता । आप हिम्मत मत हारो ।

हिम्मत मत छाड़ो नरां, मुख सूं कहतां राम ।

हरिया हिम्मत सूं कियां, ध्रुव का अटल धाम ॥

ये बातें बहुत सुगम हैं । आप पूरा विचार नहीं करते‒यह बाधा है । न तो स्वयं सोचते हो और न कहनेपर स्वीकार करते हो । अब क्या करें, बताओ ? आप सत्‌ हो और ये बेचारे असत्‌ है, आगन्तुक हैं । आप मुफ्तमें ही इनसे दब गये । अपने महत्त्वकी तरफ आप ध्यान नहीं देते । आप कौन है‒इस तरफ आप ध्यान नहीं देते । आप परमात्माके अंश हो । आपमें असत्‌ कैसे टिक सकता है ? यह आपके बलसे ही बलवान् हुआ है । इसमें खुदका बल नहीं है । यह तो है ही असत्‌ ! आप सत्‌ हो और आपने ही इसको महत्त्व दिया है ।

जैसे किसीका पुत्र मर गया, तो बड़ा शोक होता है कि मेरा लड़का चला गया ! लड़का तो एक बार मरा और शोक रोजाना करते हो, तो बताओ कि शोक प्रबल है या लड़केका मरना प्रबल है ? लड़का तो एक बार ही मर गया, खत्म हुआ काम, पर शोकको आप जीवित रखते हो । शोकमें ताकत कहाँ है रहनेकी ? शोक तो लड़केके मरनेसे पैदा हुआ है बेचारा ! उस शोकको आप रख सकोगे नहीं । कुछ वर्षोंके बाद आप भूल जाओगे । शोक आपसे-आप नष्ट हो जायगा । आप बार-बार याद करके उसको जीवित रखते हो, फिर भी उसको जीवित रख सकोगे नहीं । दस-पन्द्रह वर्षके बाद वह यादतक नहीं आएगा । इसलियेउत्पन्न और नष्ट होनेवाली वस्तुको आप महत्त्व मत दो, उसकी परवाह मत करो । हमारी बात तो इतनी ही है कि आप असत्‌को महत्त्व क्यों देते हो ? अपने विवेकको महत्त्व क्यों नहीं देते ?

(शेष आगेके ब्लॉगमें)

‒ ‘स्वाधीन कैसे बनें ?’ पुस्तकसे

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सोमवार, 15 अगस्त 2016

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🌹 सुखासक्तिसे छूटनेका उपाय :

( गत ब्लाग से आगे )

आप कामनाकी उत्पत्ति और विनाशको जाननेवाले हो । जो उत्पत्ति और विनाशको जाननेवाला होता है, वह अविनाशी होता है, बड़ा होता है । जो उत्पन्न और नष्ट होता है, वह छोटा होता है, पर जो उसकी उत्पत्ति और विनाशको जाननेवाला होता है, वह बड़ा होता है ।

श्रोता‒सुखकी आसक्ति हमारेपर एकदम अधिकार जमा लेती है । उस समय हमें अपने बलका पता ही नहीं लगता । हम निर्बल हो जाते हैं, पराजित हो जाते हैं ।

स्वामीजी‒जिस समय कामना पैदा होती है, आसक्ति पैदा होती है, उस समय उसका बड़ा असर पड़ता है‒यह बात ठीक है; परन्तु इस बातपर विश्वास रखो कि सत्‌-वस्तु तो निष्कामता ही है । अतः निष्कामभावको सकामभाव दबा ही नहीं सकता । सकामभाव उत्पन्न और नष्ट होता है, पर निष्कामभाव सकामभावके उत्पन्न होनेसे पहले भी रहता है, सकामभावके नष्ट होनेके बाद भी रहता है और सकामभावके समय भी ज्यों-का-त्यों रहता है । वास्तवमें निष्कामभाव ही नित्य है । इसलिये कामना पैदा होनेपर आप उससे हार स्वीकार मत करो । बड़ी-से-बड़ी कामना हो जाय, कामनामें आप बह जाओ, कामनाके वशीभूत हो जाओ तो भी आप कृपा करके इतना खयाल रखो कि यह कामना टिकनेवाली नहीं है और निष्कामता मिटनेवाली नहीं है । कामना तो उत्पन्न और नष्ट होती है, पर आप हरदम रहते हो । अतः कामना आपमें तो नहीं हुई, फिर वह आपको कैसे ढक सकती है, आपको कैसे पराजित कर सकती है ? आप जिस समय अपनेको पराजित मानते हो, उस समय भी यह बात जाग्रत्‌ रखो कि कामना आगन्तुक है, यह रहनेवाली नहीं है । भगवान्‌ने साफ कहा है कि आप इनके आने-जानेका खयाल रखो । फिर सुगमतासे इनपर विजय प्राप्त कर लोगे । आप कामनामें कितने ही बह जाओ, पर‘आगमापायिनोऽनित्याः’ को याद रखो ।मैंने कई बार कहा है कि अरे भाई ! यह मन्त्र है ! जैसे बिच्छू डंक मार दे तो उसका मन्त्रद्वारा झाड़ा करनेसे जहर उतर जाता है, ऐसे ही आप ‘आगमापायिनोऽनित्याः’का जप शुरू कर दें तो कामना आदि आगन्तुक दोषोंका जहर उतर जायगा, उनकी जड़ कट जायगी । इतनी शक्ति है भगवान्‌के कहे हुए इन शब्दोंमें ! यह क्रियात्मक साधन है और बड़ा सुगम है, आप करके देखो ।

भागवतके ये पद मेरेको बहुत प्रिय लगते हैं‒‘जुषमाणश्च तान् कामान् दुःखोदर्कांश्च गर्हयन्’ (११/२०/२८) ।अगर भोगोंका त्याग न कर सके तो उनको दुःखरूप समझकर, उनकी निन्दा करते हुए भोगें । भोगोंको भोगते हुए भी उनको अच्छा न समझें, उनको नापसन्द करें, तो उनसे छुटकारा मिल जायगा । उनके परवश होनेपर भी आप उनसे दबो मत । केवल इतना याद रखो कि हम रहनेवाले हैं और ये जानेवाले हैं । आप करके देखो । यह साधन कठिन है क्या ? अभी इसका विचार कर लो, मनन कर लो तो फिर इसको भूलोगे नहीं । असत्‌में रहनेकी ताकत नहीं है । असत्‌की सत्ता नहीं होती और सत्‌का अभाव नहीं होता‒‘नासतो विद्यते भावो नाभावो विद्यते सतः’ (गीता २/१६) । आपकी सत्ता है और आप असत्‌से दब जाते हैं, तो यह दबना इतना दोषी नहीं है, जितना दोषी असत्‌का महत्त्व मानना है कि यह तो बड़ा प्रबल है । यह मान्यता ही गजब करती है ।

(शेष आगेके ब्लॉगमें)

‒ ‘स्वाधीन कैसे बनें ?’ पुस्तकसे

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रविवार, 14 अगस्त 2016

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❄ सुखासक्तिसे छूटनेका उपाय :

मूल बाधा‒संयोगजन्य सुखकी आसक्ति । संयोगजन्य सुखकी जो भीतरमें एक लालसा है, इच्छा है, वासना है, लोभ है, यह खास बीमारी है । संयोगजन्य सुख तो ठहरता नहीं है, अगर उसकी लालसा त्याग दें तो बड़ा सीधा काम है ।

विषयोंकी इच्छा है, भोगोंकी इच्छा है, संग्रहकी इच्छा है, मानकी इच्छा है, बड़ाईकी इच्छा है, आरामकी इच्छा है‒यह हमारे सामने उत्पन होती है और नष्ट होती है । यह इच्छा कभी पूरी हो जाती है, कभी अधूरी रह जाती है; कभी आंशिक पूरी होती है, कभी नष्ट हो जाती है । परन्तु हम ज्यों-के-त्यों रहते हैं, हमारे स्वरूपमें कोई फरक नहीं पड़ता । अगर अपने स्वरूपमें स्थित हो जायँ तो इच्छाएँ मिट जायँगी और अगर इच्छाओंको मिटा दें तो अपने स्वरूपमें स्थिति हो जायगी । दोनोंमेंसे जो चाहो, सो कर लो । सत्‌की जिज्ञासासे भी, असत्‌की निवृत्तिसे भी सत्‌की प्राप्ति होती है ।

जिस सुखकी उत्पत्ति होती है और नाश होता है, ऐसे सुखकी लालसा मिटानी है‒इतना काम करना है । संयोगजन्य सुख जो खुद तो हरदम रहता नहीं और नित्य-निरन्तर रहनेवाले परमात्मतत्त्वके सुखसे वंचित कर देता है, कितने अनर्थकी बात है ! ऐसे संयोगजन्य सुखका भी त्याग नहीं कर सकते तो हम क्या त्याग कर सकते हैं !

सुखकी कामना उत्पन्न और नष्ट होती है, पर आप उत्पन्न और नष्ट नहीं होते हो । कामना आपमें होती है, आप कामनामें नहीं होते हो । आप व्यापक हो, कामना व्याप्य है अर्थात्‌ आप सब देशमें हो, कामना एक देशमें हैं; आप सब कालमें हो, कामना एक कालमें हैं; और कामना हो या न हो, आपमें कोई फरक नहीं पड़ता, आप ज्यों-के-त्यों रहते हैं । कामनाको केवल आपने ही पकड़ रखा है, कामनामें आपको पकड़नेकी कोई ताकत नहीं है ।सत्संगके समय कामना नहीं रहती, इसलिये अनुभव होता है कि तत्त्व ज्यों-का-त्यों है । कामना होनेपर यह अनुभूति वैसी नहीं रहती । इसलिये प्रश्न होता है कि संत्संग सुनते समय जैसा भाव रहता है, वैसा और समयमें नहीं रहता । वास्तवमें तो वह तत्त्व नित्य-निरन्तर वैसे-का-वैसा ही रहता है । सत्संग सुनो चाहे मत सुनो, चाहे कुसंग करो, सत्‌-तत्त्व तो ज्यों-का-त्यों ही रहता है, उसका कभी नाश नहीं होता । परन्तु आपकी दृष्टि असत्‌की तरफ चली जाती है तो वह असत्‌ आपपर हावी हो जाता है और ऐसा दीखने लगता है कि मानो सत्‌ नहीं रहा; जो कभी हो और कभी न हो, वह सत्‌ कैसे हो सकता है ? सत्‌ तो हरदम ज्यों-का-त्यों रहता है । असत्‌की लालसामें सत्‌को ढकनेकी शक्ति नहीं है; क्योंकि सत्‌ व्यापक है और असत्‌ व्याप्य है । तुच्छ चीज महान्‌को ढक दे, आवृत कर दे‒ऐसा नहीं है ।
‘आवृतं ज्ञानमेतेन.....’(गीता ३/३९),
‘इस कामनासे वह ज्ञान आवृत है’‒ऐसा कहनेका तात्पर्य है कि ज्ञान आवृत नहीं होता, आपकी दृष्टि आवृत होती है । जैसे, बादल आनेपर सूर्य नहीं दीखता तो हम कहते हैं कि सूर्य ढक गया । परन्तु वास्तवमें सूर्य नहीं ढकता, हमारी आँख ढक जाती है । सूर्य तो भूमण्डलसे भी बड़ा है, वह थोड़ेसे बादलके टुकड़ेसे कैसे ढक सकता है ? ऐसे ही कामना आती है तो हम मान लेते हैं कि हम कामनाके वशीभूत हो गये, कामनाने हमें हरा दिया । वास्तवमें यह बात नहीं है । आपको कामना कैसे ढक सकती है ? कामना तुच्छ है और आप महान्‌ हैं‒

‘नित्यः सर्वगतः स्थाणुरचलोऽयं सनातनः’ (गीता २/२४) ।

(शेष आगेके ब्लॉगमें)

‒ ‘स्वाधीन कैसे बनें ?’ पुस्तकसे

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गुरुवार, 11 अगस्त 2016

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🌹परमात्मप्राप्तिमें मुख्य बाधा‒सुखासक्ति :

(गत ब्लॉगसे आगेका)

भगवान्‌के रहते हुए हम दुःख क्यों पा रहे हैं ? भगवान्‌में तीन बातें हैं‒वे सर्वज्ञ हैं, दयालु हैं और सर्वसमर्थ हैं । ये तीन बातें याद कर लें और इसका मनन करें । सर्वज्ञ होनेसे वे हमारे दुःखको जानते हैं । दयालु होनेसे वे हमारा दुःख नहीं देख सकते, दुःख देख कर पिघल जाते हैं । सर्वसमर्थ होनेसे वे हमारे दुःखको मिटा सकते हैं । इन तीनों बातोंमेंसे एक भी बात कम हो तो मुश्किल होती है, जैसे‒दयालु हैं, पर हमारे दुःखको जानते नहीं और दयालु हैं तथा हमारे दुःखको भी जानते हैं, पर दुःख दूर करनेकी सामर्थ्य नहीं ! परन्तु तीनों बातोंके मौजूद रहते हुए हम दुःखी होते हैं, यह बड़े आश्चर्यकी बात है !

एक कायस्थ सज्जन थे । उन्होंने मेरेसे कहा कि क्या करे, मेरी लड़की बड़ी हो गयी, पर सम्बन्ध हुआ नहीं । मैंने कहा कि अभी एक तुम चिन्ता करते हो, ज्यादा करोगे तो हम दोनों चिन्ता करने लग जायँगे, दोनों रोने लग जायँगे, इससे ज्यादा क्या करेंगे ? ज्यादा दया आ जायगी तो हम भी रोने लग जायँगे और हम क्या कर सकते हैं ? हमारे पास पैसा नहीं, हमारे पास सामर्थ्य नहीं ! ऐसे ही भगवान्‌को दया आ जाय और सामर्थ्य न हो तो वे रोने लग जायँगे और क्या करेंगे ? परन्तु वे सर्वसमर्थ हैं, सर्वज्ञ हैं और दयालु हैं, दयासे द्रवित हो जाते हैं । इन तीन बातोंके रहते हुए हम दुःखी क्यों हैं ? इसमें कारण यह है कि हम इनको मानते ही नहीं, फिर भगवान्‌ क्या करें, बताओ ?

श्रोता‒अपनी ही कमी है महाराजजी !

स्वामीजी‒अपनी कमी तो अपनेको ही दूर करनी पड़ेगी, चाहे आज कर लो, चाहे दिनोंके बाद कर लो, चाहे महीनोंके बाद कर लो, चाहे वर्षोंके बाद कर लो, चाहे जन्मोंके बाद कर लो, यह आपकी मरजी है ! जब आप दूर करना चाहो, कर लो । चाहे अभी दूर कर लो, चाहे अनन्त जन्मोंके बाद ।

संसारको तो अपना मान लिया और भगवान्‌को अपना नहीं माना‒यह बाधा हुई है मूलमें । अतः भगवान्‌को अपना मान लो‒‘मेरे तो गिरधर गोपाल दूसरो न कोई’। आप भगवान्‌को तो अपना मान लेते हो, पर ‘दूसरों न कोई’ इसको नहीं मानते । इसको माने बिना अनन्यता नहीं होती ।अनन्य चित्तवाले मनुष्यके लिये भगवान्‌ सुलभ हैं‒‘अनन्यचेताः सततं......तस्याहं सुलभः पार्थ’ (गीता ८/१४) । शर्त यही है कि अन्य किसीको अपना न माने ।

एक बानि करुनानिधान की ।

सो प्रिय जाकें गति न आन की ॥

(मानस ३/१०/४)

भगवान्‌के सिवाय दूसरा कोई सहारा न हो, प्यारा न हो, गति न हो, तो वह भगवान्‌को प्यारा लगता है । अतः अनन्य भावसे भगवान्‌को अपना मान लो । यह हमारे हाथकी बात है, हमारेपर निर्भर है ।बातें सुनना, शास्त्र पढ़ना आदि इसमें सहायक है, पर करना अपनेको ही पड़ता है ।

नारायण ! नारायण !! नारायण !!!

‒ ‘स्वाधीन कैसे बनें ?’ पुस्तकसे

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मंगलवार, 9 अगस्त 2016

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🌹परमात्मप्राप्तिमें मुख्य बाधा‒सुखासक्ति :

(गत ब्लॉगसे आगेका)

     इसमें बाधा यह है कि हम जिन पदार्थोंको नाशवान् मानते हैं, उनको अपना मान लेते हैं । यह गलती है । इस गलतीको मिटानेमें जोर पड़ता है । परमात्मतत्त्वकी प्राप्ति तो सुगम है, पर संसारका त्याग करनेमें जोर पड़ता है । जिनको हम नाशवान् जानते हैं, उनका ही संग्रह करते हैं । उनसे ही सुख लेते हैं‒यह जो हमारी चाल है न, यह चाल खतरनाक है । यह चाल बदलनी चाहिये । चालमें भी केवल भीतरका भाव बदलना है कि औरोंको सुख कैसे हो ? यह भले ही घरसे शुरू कर दो कि माता, पिता, स्त्री, पुत्र, परिवारको सुख कैसे हो ? पर साथ-साथ उनसे सुख लेनेकी आशा छोड़ दो । जिससे सुख मिलनेकी आशा नहीं है, उसको सुख नहीं पहुँचाते और जिसको सुख पहुँचाते हैं उससे सुख लेनेकी आशा रहती है‒यह है खास बन्धन । इसलिये सुखकी आशा न रखकर दूसरोंको सुख देना है, दूसरोंको आराम देना है, दूसरोंकी बात रखनी है । अपनी बात रखोगे तो बड़ी भारी आफत हो जायगी । मेरी बात रहे‒इसीमें बन्धन है ।

     हम जो नाशवान् पदार्थोंसे राजी होते हैं; जानते हैं कि ये रहेंगे नहीं, टिकेंगे नहीं, फिर भी उसमें रस लेते हैं, यहींसे बन्धन होता है।

     श्रोता‒महाराजजी ! हमारी तो आदत ही ऐसी पड़ गयी सुख लेनेकी !

     स्वामीजी‒भैया ! आदत छोड़नेके लिये ही तो हम यहाँ इकठ्ठे हुए हैं । यहाँ कौन-से पैसे मिलते हैं ! आदत सुधारनेके समान कोई उन्नति है ही नहीं । अपने स्वभावको शुद्ध बना लेनेके समान आपका कोई पुरुषार्थ नहीं है । इसके समान कोई लाभ नहीं है । आपका पुरुषार्थ, उद्योग, प्रयत्न इसीमें होना चाहिये कि स्वभाव सुधरे ।स्वभाव ही सुधरता है और क्या सुधरता है बताओ ? जो सन्त-महात्मा होते हैं, उनका भी स्वभाव ही सुधरता है । शरीरमें फरक नहीं पड़ता, स्वभावमें फरक पड़ता है । इसलिये अपनी आदत है, अपना स्वभाव है, अपनी प्रकृति है, इसको हमें शुद्ध करना है । इसमें जो-जो अशुद्धि आये, उसको निकालना है । यह एक ही खास काम करना है ।

यह याद कर लो कि अपना स्वभाव सुधारनेमें हम स्वतन्त्र हैं, पराधीन नहीं हैं । इसको दूसरा कोई कर देगा‒यह बात नहीं है । यह तो आप ही करोगे, तब होगा । जब कभी करोगे तो आपको ही करना पड़ेगा । आपने प्रश्न किया था कि यह गुरु-कृपासे होगा या सन्त-कृपासे होगा, तो इस विषयमें आपको एक मार्मिक बात बताता हूँ । अगर गुरु-कृपासे होगा तो गुरुको आप मानोगे, तब होगा । अगर सन्त-कृपासे होगा तो सन्तको आप मानोगे, तब होगा । अन्तमें बात आपके ऊपर ही आयेगी । आप मानोगे तब होगा । ईश्वरकी कृपा तो सदासे है, पर आप मानोगे, तब वह काम करेगी । इसलिये गीतामें कहा गया है कि अपने-आपसे अपना उद्धार करे‒‘उद्धरेदात्मनात्मानम्’ (६/५) । आपके माने बिना गुरु क्या करेगा ? हम गुरु मानेंगे, सन्त-महात्मा मानेंगे, तभी वे कृपा करेंगे ।

 (शेष आगेके ब्लॉगमें)

‒ ‘स्वाधीन कैसे बनें ?’ पुस्तकसे

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रविवार, 7 अगस्त 2016

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❄ परमात्मप्राप्तिमें मुख्य बाधा‒सुखासक्ति :

श्रोता‒सुखकी आसक्ति कैसे छूटे ?

स्वामीजी‒मैंने पहले ही यह बात बतायी कि हम अपना भाव बदल दें कि दूसरेको सुख कैसे हो ? उसका हित कैसे हो ? उसका कल्याण कैसे हो ? उसकी सद्‌गति कैसे हो ? उसका सुधार कैसे हो ? उसकी उन्नति कैसे हो ?

श्रोता‒भाव कैसे बदलेगा महाराजजी ! गुरु-कृपासे या सत्संगसे ?

स्वामीजी‒यह स्वयंसे बदलेगा । दूसरी बात हमने सोच रखी है वह है‒सत्संग । सत्संगमें आपसमें ऐसे विचार होते रहें तो इससे बड़ा भारी लाभ होता है । जैसे, एक कमा करके धनी बनता है और एक धनीकी गोद चला जाता है । गोद जानेवालेको क्या जोर आता है ? आज कँगला, कल लखपति ! कमाया हुआ धन मिलता है । ऐसे ही सत्संगके द्वारा कमाया हुआ धन मिलता है । जिन लोगोंने साधन किया है और अपने साधनसे ऊँचे बढ़े हैं, उनको इसमें कितने वर्ष लगे हैं ! परन्तु वे अपनी बात हमें बता दें तो हमारेको कमाया हुआ धन मिल गया न ?

श्रोता‒महाराजजी ! सत्संग हमेशा मिलता नहीं है ।

स्वामीजी‒तो जब मिलता हो, तब पकड़ो । सत्संगके विषयमें हमने एक बहुत मार्मिक बात पढ़ी है कि सत्संग एक बार ही होता है, दो बार होता ही नहीं । दो बार सुनना होता है, चर्चा होती है, चिन्तन होता है, क्रिया होती है । सत्-क्रिया, सत्-चिन्तन, सत्-श्रवण, सत्-कथन ! ये बार-बार होते हैं, पर सत्‌का संग एक बार ही होता है । एक बार हो जायगा तो वह सदाके लिये हो जायगा और उस एक बारके लिये ही बार-बार करना है ।

अपने सत्-स्वरूपका एक बार बोध हो गया तो हो ही गया । आँख खुल गयी तो फिर खुल ही गयी । क्या नींदसे जगनेके लिये अभ्यास करना पड़ता है ? अभ्याससे भी कल्याण होता है, पर देरीसे होता है । परन्तु ज्ञान (बोध) होनेसे, मान लेनेसे अथवा त्याग करनेसे तत्काल कल्याण होता है । बोधका, मान्यता और त्यागका कभी टुकड़ा नहीं होता । ये एक ही साथ होते है पड़ाकसे !

जैसे विवाह होनेपर स्त्रीको अपनी माननेके लिये आपको अभ्यास नहीं करना पड़ता, उद्योग नहीं करना पड़ता । केवल दृढ़तासे मान लेते हो कि मेरी स्त्री है । ऐसे ही गुरु बनाते हो तो उसमें भी मान्यता होती है । इसी तरह ‘भगवान्‌ हमारे हैं’ ऐसी दृढ़ मान्यता हो जाय । जैसे स्त्रीको जँच जाता है कि मेरा पति है और पतिको जँच जाता है कि मेरी स्त्री है, इससे भी बढ़कर जँचना चाहिये कि भगवान्‌ मेरे हैं । पति-पत्नीका भाव तो अपना बनाया हुआ है, पर हम परमात्माके हैं‒यह अपना बनाया हुआ नहीं है, प्रत्युत स्वतःसिद्ध है । केवल इस तरफ ध्यान देना है कि ओहो ! हम तो परमात्माके हैं ! जैसे अर्जुनने कहा‒ ‘नष्टो मोहः स्मृतिर्लब्धा’ (गीता १८/७३), मोह नष्ट हो गया और याद आ गयी ! याद आ गयी‒यह नया ज्ञान नहीं है, नया सम्बन्ध नहीं है । भगवान्‌के सम्बन्धकी याद आ गयी तो यह पति-पत्नीके सम्बन्धकी अपेक्षा दृढ़ है; क्योंकि पति-पत्नीका सम्बन्ध तो मान्यता होकर आरम्भ हुआ है, पहले सम्बन्ध था नहीं । जिस समय विवाह होता है उस समय वह सम्बन्ध आरम्भ होता है । परन्तु भगवान्‌के साथ हमारा सम्बन्ध आरम्भ नहीं होता । यह तो सदासे ही है । केवल इस सम्बन्धको मान लेना है बस । इसमें देरीका काम नहीं है । जिस दिन इसको मान लिया, उस दिन सत्संग हो गया, सत्‌का संग हो गया !

(शेष आगेके ब्लॉगमें)

‒ ‘स्वाधीन कैसे बनें ?’ पुस्तकसे

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शुक्रवार, 5 अगस्त 2016

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❄ परमात्मप्राप्तिमें मुख्य बाधा‒सुखासक्ति :

आपका पक्का विचार हो जाय तो परमात्मतत्त्वकी प्राप्ति कठिन नहीं है, संसारका हृदयसे त्याग करना कठिन है । यह जो सुखासक्ति है‒संयोगजन्य सुख है, आरामका सुख है, मानका सुख है, संग्रहका सुख है, मेरी बात रह जाय‒यह अभिमानका सुख है, यही खास बाधा है । इसीका त्याग कठिन मालूम देता है । इसका त्याग करनेके बाद परमात्मतत्त्वकी प्राप्ति सीधी ही है; क्योंकि परमात्मतत्त्व सबको प्राप्त है और उसमें बड़ा भारी आनन्द है । इस संयोगजन्य सुखका त्याग सुगमतासे कैसे हो ? सुगमतासे इसका त्याग तब होता है, जब भीतरका भावबदला जाय कि दूसरेको सुख कैसे हो ? दूसरेका सम्मान कैसे हो ? दूसरेकी प्रशंसा कैसे हो ? दूसरेका हित कैसे हो ?

श्रोता‒भीतरका भाव कैसे बदले महाराजजी ?

स्वामीजी‒यह तो खुदके बदलनेसे बदलेगा भाई ! भाव बदलना अपने हाथकी बात है । भाव ऐसे बदलो कि हमें सुख नहीं लेना है । भोजन करो, पर भोजनका सुख मत लो; कपड़ा पहनो, पर कपड़ेका सुख मत लो । नींद लो, पर नींदका सुख मत लो । कपड़ा ओढ़ो, पर ओढ़नेका सुख मत लो । संसारको देखो, पर देखनेका सुख मत लो । बात अच्छी-अच्छी सुनो, पर सुननेका सुख मत लो । अच्छा विचार करो, पर अच्छे विचारका सुख मत लो ।

श्रोता‒इनसे हमें सुख मालूम देता है !

स्वामीजी‒मालूम देता है, तभी तो भोगना नहीं है । सुख मालूम देना दोषी नहीं है, उससे राजी होना दोषी है । कोई आदमी अगर अनुकूल हो जाय तो हम राजी हो जाते हैं कि यह आदमी बड़ा अच्छा है । अतः राजी होना और उस आदमीको अच्छा मानना‒ये दो दोष आते हैं । कोई आदमी हमारा तिरस्कार करता है तो हमें दुःख होता है और हम उस आदमीको खराब मान लेते हैं । अतः दुःखीहोना और उस आदमीको खराब मानना‒ये दो दोष आते हैं । सुख लेना और दुःखी होना‒ये दोनों मुख्य बाधाएँ हैं । जो सुख देता है, उस आदमीको अच्छा मानते हैं तो अच्छा मानना दोष नहीं है, पर सुखके कारण अच्छा मानते हैं‒यह दोष है । सुख लेना इतना दोषी नहीं है, जितना सुखसे राजी होना दोषी है ।

सुख-दुःखका ज्ञान होना दोषी नहीं है, सुखी-दुःखी होना दोषी है । भगवान्‌ने क्या सुन्दर कहा है‒ ‘दुखेष्वनुद्विग्नमनाः सुखेषु विगतस्पृहः’ (गीता २/५६) । दुःखका ज्ञान हो, पर मनमें उद्वेग न हो और सुखका ज्ञान हो, पर भीतरमें स्पृहा न हो तो बुद्धि स्थिर हो जायगी । देखो, यह ऐसी गहरी बात है कि जल्दी पता नहीं लगता है । हमें तो बहुत वर्षोंतक पता नहीं लगा, आपलोगोंकी आप जाने । हमारी ऐसी खोज रहती थी कि बाधा क्या है और क्यों है ? सुनते हैं, समझते हैं, पढ़ते हैं, विचार करते हैं, फिर भी जैसी स्थिति होनी चाहिये, वैसी नहीं हो रही है, तो बाधा क्या है ? यह बाधा यहाँ लगती है कि अनुकूलतामें हम राजी होते हैं और प्रतिकूलतामें हम नाराज होते हैं । राजी-नाराज होना, सुखी-दुःखी होना भोग है । जितने भी सम्बन्धजन्य भोग हैं, वे सब-के-सब दुःखोंके कारण है‒‘ये हि संस्पर्शजा भोग दुःखयोनय एव ते’ (गीता ५/२२) । सुखके भोगीको भयंकर दुःख पाना पड़ेगा । कोई टाल नहीं सकता उसको । सुख अपनी मरजीसे भोगेंगे और दुःख परवश होकर, पराधीन होकर भोगेंगे ।

  (शेष आगेके ब्लॉगमें)

‒ ‘स्वाधीन कैसे बनें ?’ पुस्तकसे

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बुधवार, 3 अगस्त 2016

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❄ भोगासक्ति कैसे छूटें ?

(गत ब्लॉगसे आगेका)

परमात्माकी प्राप्तिको लोग कठिन मानते हैं; परन्तु वास्तवमें परमात्माकी प्राप्ति कठिन नहीं है, प्रत्युत भोगासक्तिका त्याग कठिन है ।भगवान्‌ने कहा है‒

भोगेश्वर्यप्रसक्तानांतयापहृतचेतसाम् ।

व्यवसायात्मिका बुद्धिः समाधौ न विधीयते ॥

(गीता २/४४)

जिनकी भोग और संग्रहमें आसक्ति है, वे परमात्माको प्राप्त करनेका निश्चय भी नहीं कर सकते, परमात्माको प्राप्त करना तो दूर रहा !हमें परमात्मतत्त्वको ही प्राप्त करना है, अपना कल्याण ही करना है‒यह बात उनमें दृढ़ नहीं रहती । अतः जबतक भीतरमें भोगोंका आकर्षण, महत्त्व बना हुआ है, तबतक बातें भले ही सीख जायँ, पर परमात्मप्राप्तिका निश्चय नहीं कर सकते । जब निश्चय ही पक्का नहीं रहेगा, तो फिर परमात्मप्राप्ति होगी ही कैसे ?

अगर आप जड़, असत्, क्षणभंगुर पदार्थोंसे ऊँचे उठ जाओ तो परमात्मतत्त्वकी प्राप्ति कठिन नहीं है । जो स्वतःसिद्ध है, उसको प्राप्त करनेमें क्या कठिनता है ? कठिनता यही है कि जो नहीं है, उसमें आकर्षण हो गया । ‘है’ की प्राप्ति कठिन नहीं है, ‘नहीं’ का त्याग करना कठिन है । जब ‘नहीं’ का भी त्याग नहीं कर सकते, तो फिर और क्या त्याग करोगे ? आश्चर्यकी बात है कि आप जाने हुए असत्‌का त्याग नहीं कर सकते ! जिनको जानते हो कि ये असत् हैं, नाशवान् हैं, सदा साथ रहनेवाले नहीं हैं, आने-जानेवाले हैं, उनका भी त्याग नहीं करते‒यह बहुत बड़ी गलती है ।

असत्‌का आकर्षण कैसे छूटे ? इसके लिये कर्मयोगका पालन करें ।गीतामें भगवान्‌ने कर्मयोगकी बात विशेषतासे कही है और उसकी महिमा गायी है‒‘कर्मयोगो विशिष्यते’ (५/२) ।कर्मयोगकी बात गीतामें जितनी स्पष्ट मिलती है, उतनी अन्य ग्रन्थोंमें नहीं मिलती । कर्मयोगका तात्पर्य है‒दूसरोंको सुख देना और बदलेमें कुछ भी न चाहना । माँ-बापको सुख देना है । स्त्री, पुत्र, भाई-भतीजेको भी सुख देना है । पड़ोसियोंको भी सुख देना है । सबको सुख देना है । इसको काममें लाओ तो असत्‌का आकर्षण छूट जायगा ।

किसी तरहसे दूसरोंको सुख मिल जाय, आराम मिल जाय‒ऐसा जो भाव है, यह बहुत दामी चीज है, मामूली नहीं है ।अगर आप चाहते हो कि विषय सामने आनेपर हम विचलित न हों, तो इस सिद्धान्तको पकड़ लो कि दूसरोंको सुख कैसे हो ? दूसरोंको आराम कैसे हो ?वस्तु मेरे पास हरदम नहीं रहेगी, अतः दूसरेके काम आ जाय तो अच्छा है‒ऐसा भाव होनेसे सबके हितमें रति हो जायगी । जब दूसरोंके हितमें आपकी रति, प्रीति हो जायगी, तब भोगपदार्थ सामने आनेपर भी उनका त्याग करना सुगम हो जायगा । परन्तु ‘मेरेको सुख कैसे हो ? मेरेको सम्मान कैसे मिले ? मेरी बड़ाई कैसे हो ? मेरी बात कैसे रहे ? मेरेको आराम कैसे मिले ?’‒यह भाव रहेगा तो त्रिकालमें भी कल्याण नहीं होगा, क्योंकि ऐसा भाव रखना पशुता है, मनुष्यता नहीं है ।

दूसरेके हितका भाव होनेसे आपकी सुख भोगनेकी इच्छाका नाश हो जायगा ।

नारायण ! नारायण !! नारायण !!!

‒ ‘तात्त्विक प्रवचन’ पुस्तकसे

( शेष आगे के ब्लाग में )

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मंगलवार, 2 अगस्त 2016

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❄ भोगासक्ति कैसे छूटें ?

श्रोता‒जब भोग पदार्थ सामने आते हैं, तब न जाने क्यों हम विचलित हो जाते हैं; अतः उस समयमें हम क्या करें ?

स्वामीजी‒जिसने लाठी चलाना पहले ही सीख लिया है, वह शत्रुके सामने आनेपर उससे मुकाबला कर सकता है । परन्तु शत्रु पहले ही सामने आ जाय और लाठी चलाना सीखा नहीं, वहाँ तो लाठी खानी ही पड़ेगी ! सत्संगकी बातोंको तो आप जानते हैं, पर जब भोग सामने आते हैं, तब उन बातोंको भूल जाते हैं, वे बातें काम नहीं आतीं ।

तब लगि सब ही मित्र है, जब लगि पर्‌यो न काम ।

हेम अगन शुद्ध होत है,           पीतलहोवे स्याम ॥

जबतक काम नहीं पड़ता, तबतक सब ही मित्र हैं । काम पड़नेसे ही पता चलता है कि कौन मित्र है और कौन मित्र नहीं है । सोना भी पीला दीखता है और पीतल भी पीला दीखता है, परन्तु आगमें रखनेपर सोना तो चमकता है और पीतल काला हो जाता है ।

एक सीखी हुई बात होती है और एक जानी हुई बात होती है । जानी हुई बात वास्तविक होती है, जो कभी इधर-उधर नहीं होती । सीखी हुई बात बुद्धितक ही रहती है, स्वयंतक नहीं पहुँचती । परन्तु जानी हुई बात स्वयंतक पहुँचती है । जबतक कोई बात स्वयंतक नहीं पहुँचती, तबतक वह व्यवहारमें जैसी आनी चाहिये, वैसी नहीं आती । जिसका उद्देश्य परमात्माकी प्राप्ति है, उसको सीखी हुई बातोंमें सन्तोष नहीं होता । सन्तोष न होनेसे उसके द्वारा खोज होती है कि वास्तवमें क्या बात है ? खोज करते-करते उसको तत्त्वका अनुभव हो जाता है ।

एक सत्संग होता है और एक कथा-वार्ता, पुस्तकोंका विवेचन आदि होता है ।कथा, व्याख्या आदिकी बातें तो बहुत जगह मिलती हैं, पर अनुभवी, भगवत्प्राप्त महापुरुषोंका सत्संग कम जगह मिलता है । अनुभवी महापुरुष पहले (सत्य, त्रेता, द्वापरमें) भी कम थे, आज तो और भी कम हैं ! आज तो विद्यार्थी भी ठीक तरहसे शास्त्रका अध्ययन नहीं करते । कोरी परीक्षा देकर पास हो जाते हैं । पूछो तो बता नहीं सकते । जो पढ़ा है, वह भी नहीं बता सकते फिर वास्तविक ज्ञान तो बहुत दूर रहा ! हमारी प्रार्थना है कि आप वास्तविक तत्त्वको समझें , कोरी पढ़ाई न करें ।

जब भोग सामने आते हैं, तब सुनी-सुनायी बातें रद्दी हो जाती हैं । एक कहानी है । एक पण्डित थे । वे रोज रात्रिमें कथा किया करते थे । उन्होंने एक बिल्लीको पालकर सिखा रखा था । वे बिल्लीको बैठाकर उसके सिर थोड़ी मिट्टी रखकर दीपक रख देते और उस दीपकके प्रकाशमें कथा बाँचते । कोई कहता कि हमारा मन ठीक नहीं है तो वे कहते‒ ‘अरे ! यह बिल्ली ही ठीक है, एकदम चुपचाप बैठी रहती है, तुम्हारी क्या बात है ?’ एक आदमीने विचार किया कि देखें, बिल्ली कैसे चुपचाप बैठती है । वह दूसरे दिन अपने साथ एक चूहा ले गया । जब पण्डितजीकी कथा चल रही थी, उस समय उसने चूहेको बिल्लीके सामने छोड़ दिया । चूहेपर दृष्टि पड़ते ही बिल्ली उसपर झपट पड़ी और दीपक गिर गया ! यही दशा आदमियोंकी होती है । बातें सुनते समय तो चुपचाप बैठे रहते हैं, पर जब भोग-पदार्थ सामने आ जायँ तो फिर वशकी बात नहीं रहती । कारण कि भीतरमें रुपयों आदिका आकर्षण है, इसलिये रुपये सामने आनेपर मुश्किल हो जाती है । भोगोंका यह आकर्षण पहले नहीं था‒यह बात नहीं है । आकर्षण तो पहलेसे ही था, पर वह दबा हुआ था । ताँबेके कड़ेके ऊपर सोनेकी पालिश कर दी जाय तो वह कड़ा सोनेकी तरह दीखता है । इसी तरह सीखी हुई बातें पालिशकी तरह होती हैं । परन्तु जानी हुई, अनुभव की हुई बात ठोस होती है । जिसके भीतरमें स्वयंका अनुभव होता है, उसके सामने चाहे कुछ भी आ जाय, वह विचलित नहीं होता । वह हर परिस्थितिमें ज्यों-का-त्यों रहता है ।

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‒ ‘तात्त्विक प्रवचन’ पुस्तकसे

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सोमवार, 1 अगस्त 2016

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🌹सांसारिक सुख दुःखों के कारण हैं :

(गत ब्लॉगसे आगेका)

सांसारिक पदार्थोंके पासमें होनेसे जिसे अभिमान होता है, वह हिंसा करता है । ऐसे ही जिसे गुणोंका अभिमान है, वह भी हिंसा करता है । गुण तो आने-जानेवाले हैं, उनको लेकर अभिमान करता, तो जिनके पास वे गुण नहीं हैं, उनके मनमें जलन पैदा होती है; क्योंकि वे किसीसे कम तो हैं नहीं । सब-के-सब परमात्माके अंश हैं; अतः स्वरूपसे समान हैं । आने-जानेवाले पदार्थोंसे अपनेको सुखी मानना भूल है । जो अपनेको बड़ा और दूसरेको नीचा समझकर दूसरोंका तिरस्कार करता है, वह भी हिंसा करता है । अपनेमें दूसरोंकी अपेक्षा विशेषताका अनुभव करना भी भोग है, और उससे दूसरोंकी हिंसा होती है । मान-बड़ाईका सुख भोगनेवाला भी हिंसा करता है; क्योंकि वह अपनेको मान-बड़ाईके योग्य समझकर अभिमान करता है । वह सोचता है कि कहीं दूसरेकी बड़ाई हो जायगी तो मेरी बड़ाईमें धब्बा लगेगा । ऐसे ही काम-धन्धा न करनेवाला मनुष्य आलस्यका सुख लेता है तो दूसरे कहते हैं कि हम तो मेहनत करते हैं और यह आरामसे बैठा माल खाता है तो यह भी हिंसा है । तो सांसारिक सुखोंको भोगनेवाला व्यक्ति खुद तो दुःख पाता ही है, दूसरोंको भी दुःखी करता है ।

सभी भोग दुःखोंके कारण है ।सांसारिक सुख पहले भी नहीं थे और बादमें भी नहीं रहेंगे । स्वयं अविनाशी होते हुए भी ऐसे नाशवान् सुखोंके वशमें होना अपनी हत्या करना ही है । सुखका भोगी व्यक्ति कभी पापों और दुःखोंसे बच ही नहीं सकता । इसलिये जो अपना कल्याण चाहता है, उसके लिये आवश्यक है कि वह किसी वस्तु, परिस्थिति, व्यक्ति आदिके कारण प्रसन्नता या सुखका अनुभव न करे । इनसे प्रसन्न होनेवाला व्यक्ति मुक्त नहीं होता । कर्मयोगमें यही खास बात है । कर्मयोगी सभी कर्तव्य-कर्म करता है, पर संयोगजन्य सुखका भोग नहीं करता । किसी बातसे वह प्रसन्नता नहीं खरीदता ।

त्यागसे सुख होता है । जो पुरुष विरक्त, त्यागी होता है, उसे देखकर दूसरोंको सुख होता है । अतः जो संयोगजन्य सुखोंका भोगी नहीं है, ऐसे त्यागी पुरुष दूसरोंको सुख पहुँचाता है और संसारका बड़ा भारी उपकार करता है । त्यागी महापुरुष संसारका जितनाउपकार करता है, उतना उपकार कोई कर सकता ही नहीं । उसे देखनेसे, उसकी बातें सुननेसे भी दूसरोंको सुख मिलता है । ऐसा महापुरुष यदि एकान्तमें बैठा हो, तो भी संसारके दुःखोंका नाश करता है । उसका भाव संसारको सुख पहुँचानेवाला होता है‒

सर्वे भवन्तु सुखिनः सर्वे सन्तुनिरामयाः ।

सर्वे भद्राणि पश्यन्तु मा कश्चिद् दुःखभाग्भवेत् ॥

अपने प्रति वैर रखनेवालोंको भी वह सुख पहुँचाता है । जिसके हृदयमें अभिमान और स्वार्थ नहीं है, जिसका भाव दूसरोंको सुख पहुँचानेका है, उसकी भगवान्‌की उस शक्तिके साथ एकता हो जाती है, जो संसारमात्रका पालन कर रही है । इसलिये भगवान्‌का किया हुआ उपकार उसीका है । और उसका किया हुआ उपकार भगवान्‌का है । इसलिये जो सुखकी इच्छा और सुखका भोग करता है, वह अपना और संसारका नुकसान करता है । और जो सांसारिक सुखोंका त्यागी तथा भगवान्‌का अनुरागी है, वह संसारमात्रका उपकार करता है ।

नारायण ! नारायण !! नारायण !!!

‒ ‘तात्त्विक प्रवचन’ पुस्तकसे

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