सोमवार, 3 अक्तूबर 2016

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🌟 सत्संगकी महिमा :

(गत ब्लॉगसे आगेका)

एक सज्जन मिले । वे कहते थे कि तीर्थोंका माहात्मय बहुत है । गंगाजी अच्छी हैं, यमुनाजी अच्छी हैं, प्रयागराज बड़ा अच्छा है‒ऐसा लोग कहते तो हैं, परन्तु किराया तो देते नहीं । किराया दें तो वहाँ जायें । सत्संगमें बढ़िया-बढ़िया बात सुनते हैं और परमात्माके धाम जानेके किराया भी मिलता है । सत्संगमें ज्ञान मिलता है, प्रेम मिलता है, भगवान्‌की भक्ति मिलती है । भगवान्‌ शबरीसे कहते हैं‒‘प्रथम भगति संतन्ह कर संगा ।’ दण्डक वन था, उसमें वृक्ष आदि सब सूखे हुए थे । उसमें शबरी रहती थी । यहाँ शबरीको सत्संग मिल गया, यह भगवान्‌की कृपा है । मतंग ऋषि थे, बड़े वृद्ध सन्त, कृपाकी मूर्ति । उन्होंने शबरीको आश्वासन दिया था कि बेटा, तू चिन्ता मत कर, यहाँ रह जा । ऋषि-मुनियोंने इसका बड़ा विरोध किया, पर सन्तकी कृपा बड़ी विचित्र होती है ।

         धनी आदमी राजी हो जाय तो धन दे दे, अपनी कुछ चीज दे दे, परन्तु सन्त कृपा करें तो भगवान्‌को दे दें । उनके पास भगवान्‌रूपी धन होता है । वे सामान्य धनके धनी नहीं होते हैं, असली धनके धनी होते है, मालामाल होते हैं और वह माल ऐसा विलक्षण है कि ‘दानेन वर्धते नित्यम्’, ज्यों-ज्यों देते हैं, त्यों-त्यों बढ़ता है । ऐसा अपूर्व धन है । अतः खुला खर्च करते हैं । खुला भंडार पड़ा हुआ है, अपार, असीम, अनन्त है; जिसक कोई अन्त ही नहीं है । भगवान्‌का ऐसा अनन्त अपार खजाना है । फिर भी मनुष्य मुफ्तमें दुःख पा रहे हैं । इसलिये सज्जनो, बड़े आश्चर्यकी बात है !

पानीमें   मीन   पियासी, मोहि    देखत  आवै   हाँसी ।
जल बिच मीन, मीन बिच जल है, निश दिन रहत पियासी ॥

भगवान्‌में सब संसार है और सबके भीतर भगवान्‌ हैं । उन भगवान्‌से विमुख होते हैं तो सन्त-महात्मा जीवको परमात्माके सम्मुख कर देते हैं । ‘सनमुख होइ जीव मोहि जबहीं ।’ अरे भाई ! परमात्मा तो सम्मुख है ही, हमारा प्यारा माता-पिता, भाई-बन्धु, कुटुम्बी, सम्बन्धी‒वह सब तरहसे अपना है । वे प्रभु हमारे हैं । सन्त ऐसी बात बता दें और हम वह बात सुनकर पकड़ लें तो बड़ा भारी लाभ होता है । स्वयं हम पकड़ें और किसी सन्त-महात्माके कहनेसे हृदयसे पकड़ें तो उसमें बड़ा अन्तर होता है ।

सन्त-महात्मा जो कहते हैं, उनके वचनोंका आदर करो । जमानत भी ली जाती है तो इज्जतदार आदमीकी । हर एककी जमानत नहीं होती है । ऐसे हीभगवान्‌के दरबारमें सन्त-महात्माओंकी और भक्तोंकी बड़ी इज्जत है, तभी तो गोस्वामीजीने कह दिया‒

सत्य बचन आधीनता   पर तिय मातु समान ।
इतने पै हरि ना मिले तो तुलसीदास जमान ॥

तुलसीदासजीकी जमानत है । सन्त लोग जमानत दे देते हैं और वह भगवान्‌के यहाँ चलती है । सन्तोंके यहाँ परमात्माका बड़ा खजाना रहता है । मुफ्तमें धन मिलता है, मुफ्तमें कमाया हुआ, तैयार किया हुआ, सत्संगसे यह सब मिल सकता है ।

प्रश्न‒कुछ लोगोंको सत्संग करना सुहाता ही नहीं । इसका क्या कारण है ?

उत्तर‒पापीका यह स्वाभाव है कि उसे सत्संग सुहाता नहीं ।

पापवंत कर      सहज सुभाऊ ।
भजनु मोर तेहि भाव न काऊ ॥

 (मानस ५/४३/२)

    (शेष आगेके ब्लॉगमें)

‒ ‘जीवनोपयोगी प्रवचन’ पुस्तकसे

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🌟 सत्संगकी महिमा :

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         सत्संगमें व्यापार एक ही चलता है, भगवान्‌की बात । उसीको कहना, सुनना, समझना, विचार करना, चिन्तन करना ।भगवान्‌ जिसपर कृपा करते हैं, उसको सत्संग देते हैं । सत्संग दिया तो समझो भगवान्‌के खोजनेकी बढ़िया चीज मिल गयी । जो भगवान्‌के प्यारे होते हैं, वे भगवान्‌के भीतर रहते हैं । यह हृदयका धन है । माता-पिता जिस बालकपर ज्यादा स्नेह रखते हैं, उसको अपनी पूँजी बता देते हैं कि बेटा, देखो यह धन है । ऐसे ही भगवान्‌ जब बहुत कृपा करते हैं तो अपने खजानेकी चीज (पूँजी) सन्त-महात्माओंकोदेते हैं‒लो बेटा, यह धन हमारे पास है ।

         सत्संग मिल जाय तो समझना चाहिये कि हमारा उद्धार करनेकी भगवान्‌के मनमें विशेषतासे आ गयी; नहीं तो सत्संग क्यों दिया ? हम तो ऐसे ही जन्मते-मरते रहते, यह अडंगा क्यों लगाया ? यह तो कल्याण करनेके लिये लगाया है । जिसे सत्संग मिल गया तो उसे यह समझना चाहिये कि भगवान्‌ने उसे निमन्त्रण दे दिया कि आ जाओ । ठाकुरजी बुलाते हैं, अपने तो प्रेमसे सत्संग करो, भजन-स्मरण करो, जप करो । सत्संग करनेमें सब स्वतन्त्र हैं । सत्‌ परमात्मा सब जगह मौजूद है । वह परमात्मा मेरा है और मैं उसका हूँ‒ऐसा मानकर सत्संग करे तो वह निहाल हो जाय ।

        सत्संग कल्पद्रुम है । सत्संग अनन्त जन्मोंके पापोंको नष्ट-भ्रष्ट कर देता है । जहाँ सत्‌की तरफ गया कि असत्‌ नष्ट हुआ । असत्‌ तो बेचारा नष्ट ही होता है । जीवित रहता ही नहीं । इसने पकड़ लिया असत्‌को । अगर यह सत्‌की तरफ जायगा तो असत्‌ तो खत्म होगा ही । सत्संग अज्ञानरूपी अन्धकारको दूर कर देता है । महान्‌ परमानन्द-पदवीको दे देता है । यह परमानन्द-पदवी दान करता है । कितनी विलक्षण बात है ! सत्संग क्या नहीं करता ? सत्संग सब कुछ करता है । ‘प्रसूते सद्‌बुद्धिम् ।’ सत्संग श्रेष्ठ बुद्धि पैदा करता है । बुद्धि शुद्ध हो जाती है ।
गोस्वामीजी महाराज लिखते हैं‒

मज्जन फल    पखिय ततकाला ।
काक होहिं पिक बकउ मराला ॥

(मानस १/२/१)

       साधु-समाजरूपी प्रयागमें डुबकी लगानेसे तत्काल फल मिलता है । कौआ कोयल बन जाता है, बगुला हंस बन जाता है अर्थात्‌ सत्संग करनेसे रंग नहीं बदलता, ढंग बदला जाता है । जो वाणी कौआकी तरह है, वह कोयलकी तरह हो जाती है । जो बगुला होता है, वह हंसकी तरह नीर-क्षीर विवेक करने लगता है । सत्संगसे आचरण और विवेक तत्काल बदल जाते हैं । सत्संग मिल जाय तो ये बदल जाते हैं अगर नहीं बदले तो, या तो सत्संग नहीं मिला या सत्संगमें आप नहीं गये । दोनोंके मिलनेसे ही काम बनता है । पारस लोहेको सोना बना दे, अगर मिले तब तो, पर बीचमें पत्ता रख दिया जाय तो फिर कुछ नहीं बननेका ।

         भगवान्‌के प्रति व सन्त-महात्माओंके प्रति निष्काम-भावसे प्रेम करो । भगवान्‌ मीठे लगें, प्यारे लगें, अच्छे लगें । क्यों लगें ? क्योंकि वे मेरे हैं । बच्चेको माँ अच्छी लगती है । क्यों अच्छी लगती है ? क्योंकि मेरी माँ है । ऐसे ही भगवान्‌के साथ अपनापन रहे, तो यह सत्संग होता है ।भगवान्‌ हमारे हैं, हम भगवान्‌के हैं । कैसी बढ़िया बात है ।

    (शेष आगेके ब्लॉगमें)

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🌟 सत्संगकी महिमा :

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        मनमें ईर्ष्या, राग, द्वेष आदि दोष भरे हुए हैं । बहुत-से भाई-बहन इस बातको जानते ही नहीं है और जो जानते हैं वे विशेष खयाल नहीं करते । कई खयाल करके छोड़ना भी चाहते हैं, लेकिन इसमें सुख लेते रहते हैं । इस कारण राग, द्वेष, ईर्ष्या आदि छूटते नहीं, क्योंकि असत्‌का संग रहता है ।

         सत्‌का संग (सत्संग) मिल जाय तो आदमी निहाल हो जाय । जहाँ सत्‌का संग हुआ, वह निहाल हुआ । कारण क्या है ? परमात्मा सत्‌ हैं । बीचमें जितना-जितना असत्‌का सम्बन्ध मान रखा है, वही बाधा है ।

         जैसे कल्पवृक्षके नीचे जानेसे सब काम सिद्ध होते हैं, वैसे ही सत्संग करनेसे सब काम सिद्ध होते हैं । अर्थ, धर्म, काम, मोक्ष‒चारों पुरुषार्थ सिद्ध होते हैं । तो क्या सत्संगसे धन मिल जाता है ? कहते हैं कि सत्संगसे बड़ा विलक्षण धन मिलता है । रुपया मिलनेसे तृष्णा जागृत होती है और सत्संग करनेसे तृष्णा मिट जाती है । रुपयोंकी जरूरत ही नहीं रहती ।

गंगा पापं शशी तापं   दैन्यं कल्पतरुर्हरेत् ।
पापं तापं तथा दैन्यं सद्यः साधुसमागमः ॥

         गंगाजीमें स्नान करनेसे पाप दूर हो जाते हैं; पूर्णिमाके दिन चन्द्रमा पूरा उदय होता है, उस दिन तपत (गरमी) शान्त हो जाती है; कल्पवृक्षके नीचे बैठनेसे दरिद्रता दूर हो जाती है । पर सत्संगसे तीनों बातें हो जाती हैं‒पाप नष्ट होते हैं, भीतरी ताप मिट जाता है और संसारकी दरिद्रता दूर हो जाती है ।

चाह गई चिन्ता मिटी,       मनुआ बेपरवाह ।
जिनको कछू न चाहिए, सो साहन पतिशाह ॥

सत्संगसे हृदयकी चाहना भी मिट जाती है । यह बात एकदम सच्ची है, सत्संग करनेवाले भाई-बहन तो इस बातको जानते हैं । बिलकुल ठीक बात है,सत्संगसे हृदयकी जलन दूर हो जाती है ।

        मनुष्य चाहता है कि ऐसे हो जाय, वैसे हो जाय तो ऐसी बात आती है कि‒

मना मनोरथ छोड़ दे    तेरा किया न होय ।
पानी में घी निपजे तो सूखी खाय न कोय ॥

*** ***

यद्भावि न तद्भावि   भावि चेन्न तदन्यथा ।
इति चिन्ताविषघ्नोऽयमगदः किं न पीयते ॥

         जो नहीं होना है, वह नहीं होगा और जो होनेवाला है वह टल नहीं सकता, होकर रहेगा फिर ऐसा क्यों आग्रह कि यह होना चाहिये, यह नहीं होना चाहिये । बस हाँ-में-हाँ मिला दें । सत्संग भी एक कला है । सत्संगमें कला मिलती है, दुःखोंसे पार होनेकी । जैसे समुद्रमें डूबनेवालेको तैरनेकी कला हाथ लग जाय, ऐसे सत्संगमें युक्ति मिल जाय तो निहाल हो जाय ।

सत्संगमें उत्तम विचार मिलते हैं ।ज्ञानमार्गमें तो यहाँतक बताया है‒

धन किस लिए है चाहता, तू आप मालामाल है ।
सिक्के सभी जिससे बनें,   तू वह महा टकसाल है ॥

         उस धनके आगे तू इस धनको क्यों चाहता है ? धन-ही-धन है । परमात्मा-ही-परमात्मा है; लबालब भरा हुआ है । उस धनसे धन्य हो जाय । परमात्माका, सत्‌का दर्शन‒यह सत्संग करा देता है ।

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