शुक्रवार, 16 दिसंबर 2016

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🌹सत्संगसे लाभ कैसे लें ?

( गत ब्लॉग से आगे )

सत्संगके समय ‘हम बदलनेवाले नहीं है’‒इसमें अपनी स्थिति करनी चाहिये । सत्संगके समय सत्संगका रस नहीं लेना है । सत्संगका सुख नहीं लेना है । सत्संगका तत्त्व समझना है, उसको धारण करना है, उसमें तल्लीन हो जाना है । उस तत्त्वके साथ आपका सम्बन्ध होना चाहिये । स्वयंका सम्बन्ध होनेसे जब अनुकूल साधन नहीं होगा, अनुकूल संग नहीं मिलेगा, अनुकूल पुस्तक नहीं मिलेगी, तो उस समय आपको अच्छा नहीं लगेगा, बुरा लगेगा । फिर आप भजन-चिन्तनमें आप-से-आप लग जाओगे । हमारा सम्बन्ध तो भगवान्‌के साथ है । तात्कालिक सुखकी अपेक्षा भगवान्‌के सम्बन्धको भीतरमें ज्यादा महत्त्व देना चाहिये । जैसे, मनुष्योंका रुपयोंमें एक आकर्षण है । रुपये कमानेमें चाहे सुख होवे, चाहे दुःख होवे, पर रुपयोंका आकर्षण वैसे ही रहता है । घाटा लगे तो भी आकर्षण रहता है और मुनाफा हो तो भी आकर्षण रहता है । इस प्रकार जिस जगह रुपयोंका महत्त्व बैठा हुआ है, उस जगह भगवान्‌का महत्त्व बैठाना चाहिये । भीतरमें रुपयोंका महत्त्व होनेसे जैसे रुपयोंकी बातें अच्छी लगती हैं, ऐसे ही भगवान्‌का महत्त्व होनेसे भगवत्सम्बन्धी बातें अच्छी लगेंगी ।

सत्संगी आदमीको पहले कम-से-कम यह सोच लेना चाहिये कि हमारा कौन है और हमारा कौन नहीं है । ध्यान देना, बड़ी मार्मिक बात है । जो हमारे साथ निरन्तर रहता है और हम जिसके साथ निरन्तर रहते हैं, वह हमारा है । हम जिसके साथ निरन्तर नहीं रह सकते और जो हमारे साथ निरन्तर नहीं रहता, वह हमारा नहीं है । अब जो हमारा है, उसको हम पहचानते क्यों नहीं ? जो हमारा नहीं है, सदा उसकी तरफ आकर्षण क्यों होता है ? कारण यह है कि जो हमारा है, सदा हमारे साथ रहता है, उसको अपना मानना छोड़ दिया और जो हमारा नहीं है, कभी हमें मिलता है कभी नहीं मिलता, उसको अपना मानना शुरू कर दिया । यहाँ गलती हुई है । धन, सम्पत्ति, वैभव, पुत्र, परिवार, मान, बड़ाई आदि कभी होते हैं और कभी नहीं होते, घटते-बढ़ते हैं, सदा साथमें नहीं रहते, पर उनको अपना मान लिया । जो अपना है, उससे विमुख हो गये, उसकी उपेक्षा कर दी ! मीराबाईने कहा कि ‘मेरे तो गिरधर गोपाल दूसरों न कोई ।’ हमने ‘दूसरों न कोई’‒इस बातको नहीं पकड़ा, इसीलिये‘मेरे तो गिरधर गोपाल’‒इसका अनुभव नहीं हुआ । वे भगवान्‌ सबके हैं । वे प्राणिमात्रके हृदयमें रहते हैं‒
‘ईश्वरः सर्वभूतानां हृद्देशेऽर्जुन तिष्ठति ’ (गीता १८/६१) ।
 उनकी तरफ हमें देखना चाहिये । मैं बहुत बार कहा करता हूँ कि भगवान्‌ सब देशमें, सब कालमें, सब वस्तुओंमें, सब व्यक्तियोंमें, सम्पूर्ण वृत्तियोंमें, सम्पूर्ण घटनाओंमें, सम्पूर्ण परिस्थितियोंमें, सम्पूर्ण अवस्थाओंमें रहते हैं । ऐसा कहनेका तात्पर्य क्या है ? वे सब जगह हैं तो यहाँ भी हैं, सब समयमें हैं तो अभी भी हैं, सबमें हैं तो हमारेमें भी हैं, सबके हैं तो हमारे भी हैं । इसलिये किसीको भी उनकी प्राप्तिसे निराश होनेकी जरूरत नहीं है । जो किसी देशमें हो, किसी देशमें न हो; किसी कालमें हो, किसी कालमें न हो; उसके साथ हमें सम्बन्ध नहीं जोड़ना है । उसका काम कर देना है, उसकी सेवा कर देनी है । उसके साथ सम्बन्ध जोड़ोगे तो दुःख पाओगे; क्योंकि वह सदा तो रहेगा नहीं ।

सत्संगके द्वारा जो सुख मिलता है, उसको मत लो । जिससे वह सुख मिलता है, उस भगवान्‌को पकड़ो । वह सुख भगवान्‌के यहाँसे आता है । वे भगवान्‌ हमारे हैं । ये शरीर-संसार हमारे नहीं हैं ।अगर शूरवीरतासे आप इस बातको स्वीकार कर लो, तो बहुत ही लाभकी बात है ।

    (शेष आगेके ब्लॉगमें)

‒ ‘भगवत्प्राप्तिकी सुगमता’ पुस्तकसे

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गुरुवार, 15 दिसंबर 2016

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🌹सत्संगसे लाभ कैसे लें ?

श्रोता‒सत्संगमें जैसी स्थिति रहती है, वैसी हर समय नहीं रहती, और हर समय सत्संग मिलता नहीं ?

स्वामीजी‒सत्संग न मिले तो पारमार्थिक पुस्तकें पढ़ो ।

श्रोता‒पुस्तकें पढ़नेको भी सदा समय नहीं मिलता ।

स्वामीजी‒-देखो, सब समय तो कोई बात रहती नहीं । संसारका सम्बन्ध भी सदा नहीं रहता । सत्संगमें जैसी स्थिति, जैसी वृत्तियाँ रहती हैं, वैसी हर समय नहीं रहतीं‒ऐसी बात नहीं है । स्थूल दृष्टिसे तो वैसा दीखता है, पर सूक्ष्म दृष्टिसे देखा जाय तो भीतर सत्संगके जो संस्कार रहते हैं, वे स्थायी रहते हैं । उनके स्थायी रहनेसे ही आपकी सत्संगमें रुचि रहती है । वे संस्कार जितने अधिक स्थायी होंगे, उतनी ही रुचि अधिक होगी और जितनी रुचि अधिक होंगी, उतना ही साधन बढ़ेगा ।अतः तात्कालिक चीज (सत्संग) मिले तो उससे अपनी रुचिको बढ़ाना चाहिये । भीतर सत्संगका महत्त्व अंकित रहना चाहिये कि यह बहुत लाभदायक है, इसकी बड़ी भारी आवश्यकता है । ऐसा होनेसे कहीं भी सत्संग हो तो आपकी रुचि होगी कि हम सत्संग करें ।

दूसरी बात, अभी जो सत्संग सुननेसे रुचि होती है, वह बुद्धिमें, मनमें, अन्तःकरण होती है । वह रुचि वास्तवमें आपके खुदकी होनी चाहिये । खुदकी रुचि होगी तो वह मिटेगी नहीं; क्योंकि खुद मिटता नहीं । अन्तःकरण तो प्रकृतिका कार्य होनेसे बदलता रहता है । तत्त्वज्ञान होनेके बाद भी सिद्ध पुरुषोंमें सात्त्विक, राजस् , तामस वृत्तियाँ आती हैं (गीता १४/२२) । सिद्ध पुरुषोंमें और हमलोगोंमें फरक क्या रहता है ? उन वृत्तियोंके आनेपर सिद्ध पुरुष तो स्वाभाविक तटस्थ रहते हैं, पर हम उन वृत्तियाँके साथ मिल जाते हैं । सत्संगके समय जैसी वृत्तियाँ रहती हैं, और समयमें वैसी वृत्तियाँ नहीं रहतीं‒इसका कारण है अन्तःकरणकी अनित्यता, अन्तःकरणका एक रूप न रहना । बदलनेवाली चीजको जाननेवाले आप नहीं बदलते हो । रुचि और अरुचि‒दोनोंका जिसको अनुभव होता है, उसके साथ रुचि-अरुचि दोनोंका सम्बन्ध नहीं है ।

सात्त्विक, राजस् , तामस वृत्तियाँके साथ मिल जाना अस्वाभाविक है, और इनके साथ न मिलना स्वाभाविक है ।स्वाभाविकताको जबतक नहीं पकड़ते, तबतक यह दशा रहती है । स्वयं (स्वरूप) अच्छे-मन्दे दोनोंको जाननेवाला है, दोनोंका प्रकाशक है, दोनोंका आश्रय है । उसके आश्रित ही अच्छी-मन्दी दोनों क्रियाएँ होती हैं । हमारी स्थिति उस स्वरूपमें होनी चाहिये‒
‘समदुःखसुखः स्वस्थः’ (गीता १४/२४) ।
वह सम्पूर्ण वृत्तियाँका, संयोग-वियोगका आधार है, उनका निर्लिप्त प्रकाशक है । जैसे, दि़पक जल रहा है । अब आपलोग आयें तो दीपक वैसा ही है, आपलोग थोड़े आयें तो दीपक वैसा ही है । और कोई भी नहीं आये तो दीपक वैसा ही है । ऐसे ही आपका स्वरूप वृत्तियाँ आदिको प्रकाशित करनेवाला है, उनके साथ चिपकनेवाला नहीं है । अगर स्वरूप चिपकनेवाला होता तो एकके साथ ही रहता, दूसरेके साथ नहीं जाता । अगर आप सत्त्वगुणमें चिपक जाते तो रजोगुण-तमोगुणमें कौन जाता ? रजोगुणमें चिपक जाते तो सत्त्वगुण-तमोगुणमें कौन जाता ?तमोगुणमें चिपक जाते तो सत्त्वगुण-रजोगुणमें कौन जाता ? आपका चिपकानेका स्वभाव नहीं है । जाग्रत्‌, स्वप्न, और सुषुप्ति‒ये तीनों अवस्थाएँ आपके सामने आती हैं, पर आप किसी भी अवस्थाके साथ हरदम नहीं रहते । अवस्थाएँ बदलती हैं, आप नहीं बदलते । आप आने-जानेवाली वृत्तियाँके साथ, अवस्थाओंके साथ मिल जाते हो, इसीसे गलती होती है । इसमें आप तटस्थ रहो‒‘देखो निरपख होय तमाशा ।’ कभी नफा हुआ, कभी नुकसान हुआ, किसीका जन्मना हुआ, किसीका मरना हुआ, किसीका संयोग हुआ, किसीका वियोग हुआ‒यह तो होता ही रहता है, पर हम इसके साथ नहीं हैं और यह हमारे साथ नहीं है । ये बदलनेवाले हैं, हम बदलनेवाले नहीं हैं ।

   (शेष आगेके ब्लॉगमें)

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बुधवार, 14 दिसंबर 2016

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🌹सत्संगकी महिमा :

(गत ब्लॉगसे आगेका)

प्रश्न‒सत्संगसे मुफ्तमें लाभ मिलता है सो कैसे ?

उत्तर‒सत्संगसे जो लाभ होता है वह साधनसे नहीं होता । साधन करके जो परमात्माको प्राप्त करता है, वह कमाकर धनी बनता है और सत्संगसे वह गोद चला जाता है, कमाया हुआ मिल जाता है । सन्तोंका कमाया हुआ धन मिलता है । गोद जानेवालेको क्या जोर आवे ? आज कंगाल और कल लखपति । वह तो जा बैठा गोदमें । कमाये हुए धनका मालिक हो जाता है ।सत्संगके द्वारा ऐसी चीजें मिलती हैं, जो वर्षोंतक साधन करनेसे भी नहीं मिलतीं ।अतः सत्संग मिल जाय तो अवश्य करना चाहिये । मुफ्तमें कल्याण होता है, मुफ्तमें ।

प्रश्न‒नाम-जपसे अधिक सत्संगकी महिमा कही‒इसका क्या कारण है ?

उत्तर‒सत्संग करनेवाला नाम जपे बिना रह नहीं सकता । नाम-जप स्वाभाविक ही होगा ।

प्रश्न‒सत्संग न मिले तो क्या करें ?

उत्तर‒भगवान्‌से प्रार्थना करें हे नाथ ! हे नाथ ! करके पुकारो । भगवान्‌ सर्वसमर्थ हैं । इसके अलावा सत्‌-शास्त्रोंका अध्ययन करें ।

प्रश्न‒मनुष्यका सुधार करनेमें सबसे बढ़िया उपाय क्या है ? आप अपने अनुभवके आधारपर बतावें ?

उत्तर‒मेरेको जितना लाभ सत्संगसे हुआ है, उतना किसी साधनसे नहीं हुआ । अच्छे संगमें रहनेसे बड़ा भारी लाभ होता है, जिसकी कोई सीमा नहीं । सत्संग मत छ़ोडो, जिस सत्संगसे अपने हृदयकि गाँठ खुलती है, आत्मसाक्षात्कार होता है, प्रकाश मिलता है, ऐसा सत्संग छोड़ो मत । सब कुछ मिल जाता है पर ‘सन्त समागम दुर्लभ भाई ।’

प्रश्न‒सत्संगसे प्रकाश कैसे मिलता है ?

उत्तर‒सत्संगतिका अर्थ होता है प्रकाश । जैसे हम कहीं जाते हैं और रात्रिका समय हो तो मोटरका प्रकाश सामने ही रहता है । ऐसा नहीं होता कि प्रकाश पीछे रह जाय और मोटर आगे निकल जाय । प्रकाश आगे ही रहेगा और वह प्रकाश चलनेके लिए रास्ता बताता है । ऐसे ही सत्संगतिसे मनुष्यको प्रकाश मिलता है कि हम कैसे चलें ? सत्संगकी बातें केवल याद कर लें, पुस्तकोंमें पढ़ लें, लोगोंसे कह दें और हम उसके अनुसार चलें नहीं तो प्रकाशको तेज करनेमात्रसे रास्ता नहीं कटता । लाइट कम भी है, परन्तु जहाँतक रास्ता दीखता है, वहाँतक हम चलते जायें तो उससे आगे दीखने ही लगेगा‒यह नियम है । परन्तु एक जगह खड़े-खड़े कितनी ही तेज लाइट कर लें, गन्तव्य स्थान नहीं दीखेगा । ऐसे ही सत्संगतिके द्वारा हमें जो प्रकाश मिल जाय उसके अनुसार चलें । तभी वह प्रकाश सार्थक होता है । जीवन न भी बनावें तो भी यह प्रकाश निरर्थक नहीं जाता; क्योंकि जो सत्य चीज है, वह प्रकट हो ही जाती है ।सत्यकी विजय होती है, झूठकी विजय नहीं होती । परन्तु यदि सत्यका आदर करें तो बहुत जल्दी और विशेष लाभ ले सकते हैं ।तो सत्संगकी बातें अपने आचरणमें लाना चाहिये ।

नारायण ! नारायण !! नारायण !!!

‒ ‘जीवनोपयोगी प्रवचन’ पुस्तकसे

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मंगलवार, 13 दिसंबर 2016

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🌹सत्संगकी महिमा :

(गत ब्लॉगसे आगेका)

तुलसी पूरब पाप ते,  हरि चर्चा न सुहाय ।

जैसे ज्वर के जोर ते, भूख बिदा ह्वै जाय ॥

मनुष्यको बुखार आ जाता है तो भूख नहीं लगती, अन्न अच्छा नहीं लगता । अन्न अच्छा नहीं लगता तो इसका अर्थ है उसको रोग है । जब पित्तका जोर होता है तो मिश्री भी कड़वी लगती है । मिश्री कड़वी नहीं है, उसकी जीभ कड़वी है । इसी तरह जिसे भगवान्‌की चर्चा सुहाती नहीं तो इसका कारण है कि उसे कोई बड़ा रोग हो गया । कथामें रुचि नहीं होती तो स्पष्ट है कि अन्तकरण बहुत मैला है, मामूली मैला नहीं, ज्यादा मात्रामें मैला है ।

प्रश्न‒ज्यादा मैला होनेपर क्या उसको सत्संग दूर नहीं कर सकता ?

उत्तर‒सत्संग सब मैलोंको दूर कर सकता है; पर मनुष्य पासमें ही नहीं आता । बुखारका जोर होनेसे अन्न अच्छा नहीं लगता और मिश्री कड़वी लगती है । कैसे करें ? मिश्री कड़वी लगे तो भी खाते रहो । मिश्रीमें खुदमें ताकत है कि वह पित्तको शान्त कर देगी और मीठी लगने लगेगी ।ऐसे ही भजनेमं रुचि नहीं हो तो भी भजन करते रहो । भजन करते-करते ज्यों-ज्यों पाप नष्ट होते हैं, त्यों-त्यों उसमें मिठास आने लगता है । सत्संगमें ऐसे लोग आये हैं जो रुचि नहीं रखते थे । पर किसीके कहनेसे आये तो फिर विशेषतासे आने लग गये ।

प्रश्न‒सत्संग प्रतिदिन क्यों किया जाय ?

उत्तर‒सत्संगकी महिमा क्या कहें ?सत्संग तो रोजाना करनेका है, नित्यप्रति करनेका है । यह त्यागनेका है ही नहीं ।सत्संगसे सांसारिक बाधाएँ मिट जाती हैं । कोई बीमार होता है, कोई लड़ाई करता है, किसीको कोई बाधा लग जाती है‒ये सब तरह-तरहके साँप हैं जो काटते हैं । उनसे जहर चढ़ जाता है तो वह घबरा जाता है । वह अगर सत्संगमें जाकर सत्संगरूपी बूटी सूँघ ले तो स्वस्थ हो जाय, प्रसन्न हो जाय । चित्तकी चिन्ता दूर हो जाय । फिर जाकर संसारका काम करे । काम करते-करते उसमें उलझ जाते हैं तो जहर चढ़ जाता है । वह जहर सत्संगमें जानेसे ठीक हो जाता है । इस तरह करते हुए हमारे जो शत्रु हैं‒काम, क्रोध, राग, द्वेष आदि वे सब-के-सब मर जाते हैं । जैसे अन्न, जल आवश्यक है, साँस लेना आवश्यक है, उसी तरह सत्संग भी प्रतिदिन करना जरूरी है । वह तो रोजाना खुराक है । सत्संगसे बहुत शान्ति मिलती है । बहुत-सी मानसिक बीमारियाँ दूर होती हैं । सत्संग सूर्यकी तरह होता है जो अन्तःकरणके अन्धकारको दूर कर देता है । उससे पाप दूर हो जाते हैं, बिना पूछे शंकाएँ दूर हो जाती हैं । तरह-तरहकी जो हृदयमें उलझनें हैं, वे सुलझ जाती हैं । सत्संग जहाँ हो जाय, मिल जाय तो समझना चाहिये कि भगवान्‌ने विशेष कृपा की । भगवान्‌ शंकरने दो ही बात माँगी‒‘पद सरोज अनपायनी भगति’ और ‘सदा सत्संग ।’

    (शेष आगेके ब्लॉगमें)

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