गुरुवार, 26 जनवरी 2017

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🌹 बन्धन कैसे छूटे ?

       लोगोंने यह मान रखा है कि बन्धन नित्य है, उससे छूटनेपर मुक्ति होगी । मूलमें यह भूल हुई है । वास्तवमें बन्धन है ही नहीं । अगर बन्धन होता तो मुक्ति किसीकी भी नहीं होती; क्योंकि सत्‌ वस्तुका अभाव नहीं होता‒
‘नाभावो विद्यते सतः’ (गीता २/१६) ।
 बन्धन सत्‌ होता तो फिर उसका अभाव होता ही नहीं । अतः बन्धन है नहीं, केवल दीखता है । दीखता तो दर्पणमें मुख भी है, पर वहाँ मुख होता है क्या ? दर्पणमें मुख दीखता है तो उसको सामनेसे पकड़ लो, नहीं तो दर्पणके पीछेसे पकड़ लो ! है ही नहीं तो उसको पकड़ें क्या ! ऐसे ही इन सांसारिक पदार्थोंमें अपनापन दीखता है । यह शरीर, कुटुम्बी, धन-सम्पत्ति, वैभव आदि मेरा है‒ऐसा दीखता है । परन्तु आजसे सौ वर्ष पहले ये आपके थे क्या ? और सौ वर्षके बाद ये आपके रहेंगे क्या ? यह मेरापन पहले भी नहीं था और पीछे भी नहीं रहेगा तथा बीचमें भी दिन-प्रतिदिन मिट रहा है, तो यह सच्चा कैसे हुआ ? दर्पणमें पहले मुख नहीं था, पीछे भी नहीं रहेगा और इस समय भी दीखता है, पर है नहीं । जो प्रतिक्षण ‘नहीं’ में जा रहा है, वह ‘है’ कैसे हुआ ? जो नहीं है, उसको ‘है’ मान लिया । ‘नहीं’ को ‘है’ मानना छोड़ो तो मुक्ति स्वतःसिद्ध है । मेरापन पहले नहीं था तो मुक्ति थी, बादमें नहीं रहेगा तो मुक्ति रहेगी और बीचमें प्रतिक्षण छूट रहा है तो मुक्ति ही है । अतः बन्धन कृत्रिम है, केवल माना हुआ है और मुक्ति स्वतःसिद्ध है ।अब इसमें देरी क्या लगे ? बताओ ।

       अगर आपने मान लिया कि बन्धन छूटेगा नहीं, तो अब वह छूटेगा ही नहीं ! क्योंकि आप परमात्माके अंश हैं । आप बन्धनको पक्का मान लोगे तो वह कैसे छूटेगा ? बन्धन तो अभी है और मुक्ति आगे होगी‒इस तरह आपने बन्धनको नजदीक और मुक्तिको दूर मान लिया, तो अब बन्धन जल्दी कैसे छूट जायगा ? वास्तवमें तो बन्धन पहले भी नहीं था, पीछे भी नहीं रहेगा और अब भी नहीं है; तथा मुक्ति पहले भी थी, पीछे भी रहेगी और अब भी है ।

       देखो, हरेक व्यक्तिका माँमें बड़ा स्नेह होता है । वह स्नेह आज वैसा है क्या ? नहीं है । यह संसारके स्नेहका नमूना है ।आप व्यापार करते हो तो पहले सब माल न देखकर उसका नमूना देखते हो । उस नमूनेसे सब मालका पता लग जाता है । स्त्री मेरी है, पुत्र मेरा है, धन मेरा है, घर मेरा है‒ये सब अब प्रिय लगते हैं तो बालकपनमें माँ कम प्रिय लगती थी क्या ? माँके बिना रह नहीं सकते थे, रोने लगते थे, और माँकी गोदीमें जानेपर राजी हो जाते थे कि माँ मिल गयी ! पर माँके साथ आज वैसा स्नेह है क्या ? ऐसे कई भाग्यशाली है, जिनकी माँ अभी है; परन्तु माँके प्रति पहले जो खिंचाव था, वह खिंचाव अब नहीं है ।इस नमूनेसे संसारभरकी परीक्षा हो जाती है कि अभी संसारमें जो खिंचाव है, यह भी रहनेवाला नहीं है ।

     श्रोता‒महाराजजी ! हमारा स्नेह पहले माता-पितामें, फिर स्त्रीमें, फिर पुत्रमें, फिर पौत्रमें‒इस प्रकार इधर-इधर हो रहा है !

        स्वामीजी‒ तो नया स्नेह मत करो ना! पुराना स्नेह तो छूट रहा है, मुक्ति तो हो रही है ।

        श्रोता‒हम तो नहीं करना चाहते ।

      स्वामीजी‒आप नहीं करना चाहते तो आपसे जबरदस्ती कौन करता है ! कि नया स्नेह लगाओ बताओ ? पुराना स्नेह तो धीरे-धीरे छूट जायगा, आप नया स्नेह मत करो ।

    ( शेष आगे के ब्लॉग में )

‒ ‘भगवत्प्राप्तिकी सुगमता’ पुस्तकसे

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🌹 सत्‌-असत्‌ का विवेक :

( गत ब्लॉग से आगे का )

(१६)

       भूतकाल और भविष्यकालकी घटना जितनी दूर दीखती है, उतनी ही दूर वर्तमान भी है । जैसे भूत और भविष्यसे हमारा सम्बन्ध नहीं है, तो फिर भूत भविष्य और वर्तमानमें क्या फर्क हुआ ? ये तीनों कालके अन्तर्गत हैं, जबकि हमारा स्वरूप कालसे अतीत है । कालका तो खण्ड होता है, पर स्वरूप (सत्ता) अखण्ड है । शरीरको अपना स्वरूप माननेसे ही भूत, भविष्य और वर्तमानमें फर्क दीखता है । वास्तवमें भूत, भविष्य और वर्तमान विद्यमान है ही नहीं‒‘नासतो विद्यते भावः’ ।

(१७)

        संसारमें भाव और अभाव‒दोनों दीखते हुए भी ‘अभाव’ मुख्य रहता है । परमात्मामें भाव और अभाव‒दोनों दीखते हुए भी ‘भाव’ मुख्य रहता है । संसारमें ‘अभाव’ के अन्तर्गत भाव-अभाव हैं और परमात्मामें ‘भाव’ के अन्तर्गत भाव-अभाव हैं । दूसरे शब्दोंमें, संसारमें ‘नित्यवियोग’ के अन्तर्गत संयोग-वियोग हैं और परमात्मामें ‘नित्ययोग’ के अन्तर्गत योग-वियोग (मिलन -विरह) है । अतः संसारमें अभाव ही रहा और परमात्मामें भाव ही रहा ।

(१८)

        असत्‌का भाव नहीं है और सत्‌का अभाव नहीं है; अतः सत्‌ स्वतः विद्यमान है । जो स्वतः विद्यमान है, वही परमात्मा हैं ।जो पहले नहीं था, पीछे नहीं रहेगा और अभी नहींमें जा रहा है, उसे सत्ता देना, महत्ता देना और उससे सम्बन्ध जोड़ना ही खास बाधा है । अतः उसे सत्ता न दे, महत्ता न दे और उसीसे सम्बन्ध न जोड़े अर्थात्‌ उसे अपना न माने । जिसका कभी अभाव नहीं होता, उसको ही सत्ता दे, उसको ही महत्ता दे और उसीको अपना माने । जो नहीं है, उसका महत्त्व कैसा ? महत्त्व तो उसीका है, जो है और वही अपना है ।

      जो नहीं है, उससे तटस्थ, बेपरवाह, निर्लेप, निरपेक्ष, उदासीन, विमुख होना है; उससे चिपकाना नहीं है । वास्तवमें हम असत्‌ (वस्तु, व्यक्ति और क्रिया) से निर्लेप हैं; क्योंकि हम उसके भाव-अभावको, उत्पत्ति-विनाशको, संयोग-वियोगको और आदि-अन्तको जानते हैं । इस प्रकार अपनेको निर्लेप अनुभव करके चुप हो जायँ अर्थात्‌ चुप होकर स्थित रहें तो स्वतःसिद्ध सत्ता (सत्‌-तत्त्व) का स्पष्ट अनुभव हो जायगा । वास्तवमें सत्‌-तत्त्व स्वतःसिद्ध है, केवल असत्‌से विमुख होना है । अगर हम असत्‌को अस्वीकार कर दें तो वह रहेगा ही नहीं; क्योंकि वह है ही नहीं, उसमें रहनेकी ताकत ही नहीं है‒‘नासतो विद्यते भावः’ ।

        श्रीमद्भागवतमें आया है‒
‘अतत्त्यजन्तो मृगयन्ति सन्तः’ (१०/१४/२८)
 ‘सन्तलोग संसारका त्याग करते हुए परमात्मतत्त्वकी खोज करते हैं ।’खोजनेसे वह चीज मिलती है, जो पहले ही मौजूद हो । उसको खोजनेका उपाय है‒जो मौजूद नहीं है, उसको छोड़ते जाना । छोड़नेका तात्पर्य है‒उसकी सत्ता और महत्ता न मानना तथा उससे अपना सम्बन्ध न मानना, उसको अस्वीकार करना ।

नारायण ! नारायण !! नारायण !!!

‒ ‘अमरताकी ओर’ पुस्तकसे

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🌹सत्‌-असत्‌ का विवेक :

( गत ब्लॉग से आगे )

(१४)

       साधक भूत और भविष्यकी जिन वस्तुओं, व्यक्तियों और क्रियाओंको महत्त्व देता है, उनका चिन्तन बिना किये और बिना चाहे स्वतः होता रहता है । उस स्वतः होनेवाले चिन्तनको मिटानेके लिये साधक परमात्माका चिन्तन करता है । परन्तु यह सिद्धान्त है कि होनेवाले चिन्तनको किये गये चिन्तनसे नहीं मिटाया जा सकता । चिन्तन करनेसे करनेके नये संस्कार पड़ते हैं, जिससे वह नष्ट नहीं होता, प्रत्युत और पुष्ट होता है । स्वतः होनेवाला चिन्तन स्वतः होनेवाले चिन्तनसे अथवा चुप होनेसे ही मिट सकता है । तात्पर्य है कि सत्‌-तत्त्वका अनुभव होनेपर, निष्काम होनेपर, बोध होनेपर, प्रेम होनेपर संसारका स्वतः होनेवाला चिन्तन मिट जाता है । चुप होनेका तात्पर्य है कि साधक स्वतः होनेवाले चिन्तनकी उपेक्षा कर दे, उससे उदासीन हो जाय अर्थात्‌ उसको न ठीक समझे, न बेठीक समझे और न अपनेमें समझे तथा अपनी तरफसे कोई नया चिन्तन भी न करे । वह न चिन्तन करनेसे मतलब रखे, न चिन्तन नहीं करनेसे मतलब रखे । वह न तो किये जानेवालेका कर्ता बने और न होनेवालेका भोक्ता बने । ऐसा करनेसे साधक धीरे-धीरे अचिन्त्य हो जायगा । परन्तु अचिन्त्य होनेका, सुख लेनेका भी आग्रह नहीं रखना है । ऐसा होनेपर साधक चिन्तन करने और चिन्तन होने‒दोनोंसे रहित हो जायगा‒
‘नैव तस्य कृतेनार्थो नाकृतेनेह कश्चन’ (गीता ३/१८);
 क्योंकि करनेमें कर्मेन्द्रियोंका और होनेमें अन्तःकरणका सम्बन्ध होनेसे करना और होना‒दोनों ही अनित्य हैं । करने और होनेसे रहित होनेपर ‘है’ (सत्‌-तत्त्व) में अपनी स्वाभाविक स्थितिका अनुभव हो जायगा ।

(१५)

       असत्‌का भाव विद्यमान नहीं है अर्थात्‌ असत्‌का भाव निरन्तर अभावमें बदल रहा है । परन्तु ‘असत्‌का भाव विद्यमान नहीं है’‒इस बातका ज्ञान अभावमें नहीं बदलता ।इस ज्ञानमें हमारी स्थिति स्वतःसिद्ध है । देह तो निरन्तर अभावमें बदल रहा है; अतः देह नहीं है, प्रत्युत देही (स्वरूप) ही है । देहीकी सत्ता देश, काल, वस्तु, व्यक्ति, अवस्था, घटना, परिस्थिति आदिसे सर्वथा अतीत है ।

       असत्‌का भाव निरन्तर अभावमें जा रहा है; अतः असत्‌ नहीं है, प्रत्युत सत्‌ ही है । असत्‌की केवल मान्यता है । असत्‌की यह मान्यता ही सत्‌की स्वीकृति नहीं होने देती । गलत मान्यता सही मान्यता करनेसे मिट जाती है । वास्तवमें न सही मान्यता है, न गलत मान्यता है, केवल सत्तामात्र है ।

       जैसे हाथ, पैर, नासिका आदि शरीरके अंग हैं, ऐसे असत्‌ सत्‌का अंग भी नहीं है । जो बहनेवाला और विकारी होता है, वह अंग नहीं होता*; जैसे‒कफ, मूत्र आदि बहनेवाले और फोड़ा आदि विकारी होनेसे शरीरके अंग नहीं होते । ऐसे ही असत्‌ बहनेवाला और विकारी होनेके कारण सत्‌का अंग नहीं है ।

   ( शेष आगे के ब्लॉग में )

‒ ‘अमरताकी ओर’ पुस्तकसे
                                                _________________________________

 *अद्रवं मूर्तिमत् स्वाङ्गं प्राणिस्थमविकारजम् ।

    अतत्स्थं तत्र  दृष्टं  च       तेन चेत्तत्तथायुतम् ॥

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🌹सत्‌-असत्‌ का विवेक :

( गत ब्लॉग से आगे )

विचार करें, वस्तु पासमें रहते हुए भी हम रहते हैं और वस्तु पासमें न रहते हुए भी हम वही रहते हैं । व्यक्ति साथ में रहते हुए भी हम रहते हैं और व्यक्ति साथ में न रहते हुए भी हम वही रहते हैं । क्रिया करते समय भी हम रहते हैं और क्रिया न करते समय भी हम वही रहते हैं । इन दोनों अवस्थाओं का अनुभव सब को है । इससे सिद्ध होता है कि हमारा अस्तित्व (होनापन) वस्तु, व्यक्ति और क्रियाके अधीन नहीं है । हमें वस्तु, व्यक्ति और क्रिया की अपेक्षा, आवश्यकता भी नहीं है, प्रत्युत उनको ही हमारी आवश्यकता है । अतः हम स्वतन्त्र हैं । हम वस्तु की उत्पत्ति को भी देखते हैं और विनाश को भी देखते हैं, व्यक्ति के संयोग को भी देखते हैं और वियोग को भी देखते हैं, क्रियाके आरम्भ को भी देखते हैं और अन्त को भी देखते हैं । वस्तु, व्यक्ति और क्रिया‒तीनों के अभाव का तो हमें अनुभव होता है, पर अपने अभाव का अनुभव कभी किसी को नहीं होता । अपने इस अनुभव में नित्य-निरन्तर स्थित रहना साधक का काम है । यह अभ्यास नहीं है, प्रत्युत जागृति है । वस्तु, व्यक्ति और क्रिया का संयोग अनित्य है, पर वियोग नित्य है । नित्यको स्वीकार करनेसे नित्य-तत्त्व की प्राप्ति हो जाती है । तात्पर्य है कि वस्तु, व्यक्ति और क्रिया से सम्बन्ध-विच्छेद होने पर सर्वत्र परिपूर्ण उस परमात्मसत्ता में स्वतः स्थिति हो जाती है, जिसके लिये गीताने कहा है‒

मया ततमिदं सर्वं जगदव्यक्तमूर्तिंना । (गीता ९/४)

         ‘यह सब संसार मेरे अव्यक्त स्वरूप से व्याप्त है ।’

(१२)

असत्‌ की सत्ता विद्यमान नहीं है और सत्‌का अभाव विद्यमान नहीं है‒इसका तात्पर्य है कि जो भी सत्ता दीखती है, वह असत्‌ की न होकर सत्‌-तत्त्व की ही है । इस सत्ता को अस्वीकार कोई कर ही नहीं सकता । कोई परमात्मा की सत्ता मानता है, कोई आत्मा की सत्ता मानता है और कोई जगत्‌ की सत्ता मानता है । अगर कोई कहे कि मैं किसी की भी सत्ता नहीं मानता तो वह अपनी सत्ता तो मानता ही है ! तात्पर्य यह है कि किसी-न-किसी रूपमें सत्‌-तत्त्व (‘है’) की सत्ता को सभी स्वीकार करते हैं, भले ही वे उस का नाम कुछ भी रख दें । सत्ता का निषेध करने से अपना निषेध हो जायगा, जबकि अपने अभाव का अनुभव कभी किसी को नहीं होता ।

(१३)

       जिसका अभाव विद्यमान नहीं है अर्थात्‌ जो प्रत्येक देश, काल, वस्तु, व्यक्ति, क्रिया, अवस्था, परिस्थिति, घटना आदि में विद्यमान है, उस तत्त्व की प्राप्ति कुछ करनेसे नहीं होती । कारण कि जो विद्यमान है, उस की अप्राप्ति होती ही नहीं । हम कुछ करेंगे, तब प्राप्ति होगी‒यह भाव देहाभिमान को पुष्ट करने वाला है । प्रत्येक क्रिया का आरम्भ और समाप्ति होती है; अतः क्रिया करने से उसी की प्राप्ति होगी, जो विद्यमान नहीं है । परन्तु प्रकृति के साथ सम्बन्ध होने के कारण प्रत्येक प्राणी में क्रिया का वेग रहता है, जो उस को क्रिया रहित नहीं होने देता* । क्रिया का वेग शान्त करनेके लिये यह आवश्यक है कि जो नहीं करना चाहिये, उसको न करें और जो करना चाहिये, उसको निर्मम तथा निष्काम होकर करें अर्थात्‌ अपने लिये कुछ न करें, प्रत्युत केवल दूसरेके हित के लिये ही करें† । अपने किये करने से क्रिया का वेग कभी समाप्त नहीं होगा; क्योंकि अपना स्वरूप नित्य है और कर्म अनित्य हैं । अतः दूसरों के हित के लिये कर्म करने से क्रिया का वेग शान्त होकर प्रकृति से सम्बन्ध-विच्छेद हो जायगा और सब देश, काल आदि में विद्यमान सत्‌-तत्त्व प्रकट हो जायगा, उसका अनुभव हो जायगा ।

     ( शेष आगे के ब्लॉग में )

‒ ‘अमरता की ओर’ पुस्तक से
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  * न हि कश्चित्क्षणमपि जातु तिष्ठत्यकर्मकृत् ।

      कार्यते ह्यवशः  कर्म       सर्वः प्रकृतिजैर्गुणैः ॥
                                                 (गीता ३/५)

‘कोई भी मनुष्य किसी भी अवस्थामें क्षणमात्र भी कर्म किये बिना नहीं रह सकता; क्योंकि (प्रकृतिके) परवश हुए सब प्राणियोंसे प्रकृतिजन्य गुण कर्म कराते हैं ।’

    † न कर्मणामनारम्भान्नैष्कर्म्यं   पुरुषोऽश्नुते ।

        न च संन्यसनादेव   सिद्धिं समधिगच्छति ॥
                                                        (गीता ३/४)

       ‘मनुष्य न तो कर्मोंका आरम्भ किये बिना निष्कर्मताको प्राप्त होता है और न कर्मोंके त्यागमात्रसे सिद्धिको ही प्राप्त होता है ।’

आरुरुक्षोर्मुनेर्योगं कर्म कारणमुच्यते । (गीता ६/३)

       ‘जो योग (समता) में आरूढ़ होना चाहता है, ऐसे मननशील योगीके लिये कर्तव्य-कर्म करना कारण है ।’

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🌹सत्‌-असत्‌का विवेक :

( गत ब्लॉग से आगे )

       अपनेमें दोषोंकी स्थापना हमने ही की है । हमने ही उनको सत्ता देकर दृढ़ किया है । अतः दोषों को सत्ता न देकर अपने में और दूसरों में निर्दोषता की स्थापना करना अर्थात्‌ निर्दोषता का अनुभव करना हमारा कर्तव्य है । अपने में और दूसरों में निर्दोषता का अनुभव करना ही तत्त्वज्ञान है, जीवन्मुक्ति है ।

(११)

       हमारी सत्ता किसी वस्तु, व्यक्ति और क्रियाके अधीन नहीं है । प्रत्येक वस्तु की उत्पत्ति और विनाश होता है, प्रत्येक वस्तु की उत्पत्ति और विनाश होता है, प्रत्येक व्यक्ति का जन्म (संयोग) और मरण (वियोग) होता है एवं प्रत्येक क्रिया का आरम्भ और अन्त होता है । परन्तु इन तीनों को जानने वाली हमारी चिन्मय सत्ता का कभी उत्पत्ति-विनाश, जन्म-मरण (संयोग-वियोग) और आरम्भ-अन्त नहीं होता । वह सत्ता नित्य-निरन्तर स्वतः ज्यों-की-त्यों रहती है । उस सत्ता का कभी अभाव नहीं होता‒
‘नाभावो विद्यते सतः’ ।
उस सत्तामें स्वतः-स्वाभाविक स्थिति के अनुभवका नाम ही जीवन्मुक्ति है ।

       मनुष्यको यह वहम रहता है कि अमुक वस्तुकी प्राप्ति होनेपर, अमुक व्यक्ति के मिलने पर तथा अमुक क्रिया को करने पर मैं स्वाधीन (मुक्त) हो जाऊँगा । परन्तु ऐसी कोई वस्तु, व्यक्ति और क्रिया है ही नहीं, जिससे मनुष्य स्वाधीन हो जाय । वस्तु, व्यक्ति और क्रिया तो मनुष्य को पराधीन बनाने वाली हैं । उनसे असंग होनेपर ही मनुष्य स्वाधीन हो सकता है । अतः साधक को चाहिये कि वह वस्तु, व्यक्ति और क्रियाके बिना अपने को अकेला अनुभव करने का स्वभाव बनाये, उस अनुभव को महत्त्व दे, उसमें अधिक-से-अधिक स्थित रहे । यह मनुष्यमात्र का अनुभव है कि सुषुप्ति के समय वस्तु, व्यक्ति और क्रियाके बिना भी हम स्वतः रहते हैं; परन्तु हमारे बिना वस्तु, व्यक्ति और क्रिया नहीं रहती । जब जाग्रत्‌में भी हम इनके बिना रहनेका स्वभाव बना लेंगे, तब हम स्वाधीन अर्थात्‌ मुक्त हो जायँगे । वस्तु, व्यक्ति और क्रिया के सम्बन्ध की मान्यता ही हमें स्वाधीन नहीं होने देती और हमारे न चाहते हुए भी हमें पराधीन बना देती है ।

      हमें विचार करना चाहिये कि ऐसी कौन-सी वस्तु है, जो सदा हमारे पास रहेगी और हम सदा उसके पास रहेंगे ? ऐसा कौन-सा व्यक्ति है, जो सदा हमारे साथ रहेगा और हम सदा उसके साथ रहेंगे ? ऐसी कौन-सी क्रिया है, जिसको हम सदा करते रहेंगे और जो सदा हमसे होती रहेगी ? सदा के लिये हमारे साथ न कोई वस्तु रहेगी, न कोई व्यक्ति रहेगा और न कोई क्रिया रहेगी । एक दिन हमें वस्तु, व्यक्ति और क्रियासे रहित होना ही पड़ेगा । अगर हम वर्तमान में ही उनके वियोग को स्वीकार कर लें, उनसे असंग हो जायँ तो जीवन्मुक्ति स्वतःसिद्ध है ।

    ( शेष आगे के ब्लॉग में )

‒ ‘अमरताकी ओर’ पुस्तकसे

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🌹सत्‌-असत्‌ का विवेक :

( गत ब्लॉग से आगे )

       आश्चर्यकी बात है कि हम कामना उसकी करते हैं, जो नहीं है । भयभीत उससे होते हैं, जिसकी सत्ता ही नहीं है ।सुख नहीं रहता, पर उसकी कामनाको हम पकड़ रखते हैं । दुःख नहीं रहता, पर उसके भयको हम पकड़ रखते हैं । यह कितनी बेसमझीकी बात है ! सुखकी इच्छासे ही दुःखका भय होता है । जीनेकी इच्छासे ही मरनेका भय होता है । यदि इच्छा न रहे तो न दुःख रहेगा, न दुःखका भय रहेगा और न मरनेका भय रहेगा ।इच्छाकी निवृत्ति होते ही जिज्ञासाकी पूर्ति हो जाती है अर्थात्‌ कुछ करना, जानना और पाना शेष नहीं रहता ।

         सुख पापोंका कारण नहीं है, प्रत्युत सुखकी इच्छा पापोंका कारण है* । सुखकी इच्छा ही नरकोंका दरवाजा है† । सुखदायी परिस्थितिको रखनेमें सब परतन्त्र हैं, पर सुखकी इच्छाको छोड़नेमें सब स्वतन्त्र हैं । सुखकी इच्छाको छोड़नेमें अभ्यास नहीं है, प्रत्युत विवेक है, जो वर्तमानकी वस्तु है ।जिसको रखनेमें हम परतन्त्र हैं, उसको हम छोड़ना नहीं चाहते और जिसको छोड़नेमें हम स्वतन्त्र व समर्थ हैं, उसकी इच्छाको रखना चाहते हैं‒ इससे बड़ी भूल और क्या होगा ? यह भूल ही बन्धनका, सब पाप, दुःख, सन्ताप, नरक आदिका कारण है ।

        जो नहीं है, उसको ‘है’ मानकर उसको पानेकी अथवा मिटानेकी इच्छा करना और उससे भयभीत होना असत्‌का संग है ।उसकी उपेक्षा करना है । दशाको न देखकर सत्ताको देखना सत्‌का संग है ।

(१०)

        दोषोंका भाव विद्यमान नहीं है और निर्दोषताका अभाव विद्यमान नहीं है अर्थात्‌ दोषोंकी सत्ता है ही नहीं और निर्दोषता स्वतःसिद्ध है । कोई भी दोष स्थायी नहीं रहता, आता-जाता है और उसके आने-जानेका ज्ञान जिसको होता है, वह (निर्दोष तत्त्व) स्थायी रहता है । तात्पर्य है कि दोषोंका ज्ञान दोषीको नहीं होता, प्रत्युत निर्दोषको होता है और निर्दोषतासे ही होता है । दोषोंके आने-जानेका ज्ञान तो सबको होता है, पर अपने आने-जानेका ज्ञान कभी किसीको नहीं होता; क्योंकि दोष असत्‌ हैं और हमारा निर्दोष स्वरूप सत्‌ है । हमारेमें दोष हैं‒ऐसा मानना ही दोषोंको निमन्त्रण देना है, उनको अपनेमें स्थापन करना है । अगर दोष हमारेमें होते तो फिर जैसे हम निरन्तर रहते हैं, ऐसे ही वे भी निरन्तर रहते और उनका कभी अभाव नहीं होता । दूसरी बात, अगर दोष हमारेमें होते तो हम सर्वांशमें दोषी होते, सबके लिये दोषी होते और सदाके लिये दोषी होते । परन्तु कोई भी मनुष्य सर्वांशमें दोषी नहीं होता, सबके लिये दोषी नहीं होता और सदाके लिये दोषी नहीं होता ।

        दोषोंको सत्ता हमने ही दी है, इसलिये दोषोंका आना-जाना हमें दीखता है । अगर दोषोंकी सत्ता न मानें तो दोष हैं ही नहीं‒
‘नासतो विद्यते भावः’ ।
 जैसे सूर्यमें अमावस्याकी रात नहीं आ सकती, ऐसे ही नित्य स्वरूपमें अनित्य दोष नहीं आ सकते । जैसे परमात्मा निर्दोष हैं‒
‘निर्दोष हि समं ब्रह्म’ (गीता ५/१९),
ऐसे ही उनका अंश जीवात्मा भी निर्दोष है‒
‘अविकार्योऽयमुच्यते’ (गीता २/२५),
‘ईस्वर अंस जीव अबिनासी । चेतन अमल सहज रासी ॥’ (मानस, उत्तर॰ ११७/१) ।
अतः दोषोंको अपनेमें मानना और दूसरोंमें मानना‒दोनों ही गलती है ।

     ( शेष आगे के ब्लॉग में )

‒ ‘अमरताकी ओर’ पुस्तकसे

________________________________


    * काम एष क्रोध   एष         रजोगुणसमुद्भवः ।

        महाशनो महापाप्मा विद्ध्येनमिह वैरिणम् ॥

   † त्रिविधं नरकस्येदं      द्वारं     नाशनमात्मनः ।

        कामः क्रोधस्तथा लोभस्तस्मादेतत्त्रयं त्यजेत् ॥

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🌹सत्‌-असत्‌का विवेक :

( गत ब्लॉग से आगे )

(८)

        जिसका अभाव है, उस असत्‌ (‘नहीं’) के द्वारा अपना महत्त्व मानना मूल दोष है, जिससे सम्पूर्ण दोष उत्पन्न होते हैं । जिसका भाव है, उस सत्‌ (‘है’) के द्वारा अपना मानना मूल गुण है, जिससे सम्पूर्ण गुण उत्पन होते हैं । भूल यही है कि जो मौजूद नहीं है उसकी सत्ता मानते हैं, उसको अपना मानते हैं और जो मौजूद है, उसकी सत्ता नहीं मानते, उसको अपना नहीं मानते । मिला हुआ तो बिछुड़ जायगा, वह अपना कैसे हो सकता है? परन्तु जो मौजूद नहीं है, उस मिले हुएको अपना माननेसे जो मौजूद है, उसको अपना माननेकी शक्ति नहीं रहती । ज्ञानकी दृष्टिसे आत्मा (स्व) अपना है और भक्तिकी दृष्टिसे भगवान्‌ (स्वकीय) अपने हैं ।‘स्व’ में प्रीति होना ज्ञान है और ‘स्वकीय’ में प्रीति होना भक्ति है ।

(९)

         एक सिद्धान्त है कि जो आदि और अन्तमें होता है, वह मध्य (वर्तमान) में भी होता है तथा जो आदि और अन्तमें नहीं होता, वह मध्यमें भी नहीं होता* । जैसे शरीर और संसार पहले भी नहीं थे और बादमें भी नहीं रहेंगे तथा बीचमें भी वे प्रतिक्षण नाशकी ओर जा रहे हैं अर्थात्‌ प्रतिक्षण मर रहे हैं, उनका प्रतिक्षण अभाव हो रहा है । परन्तु शरीरी (शरीरवाला) और परमात्मतत्त्व पहले भी थे, बादमें भी रहेंगे तथा बीचमें भी ज्यों-के-त्यों विद्यमान हैं ।

       जो आदि और अन्तमें नहीं है, उसका ‘नहीं’-पना नित्य-निरन्तर है तथा जो आदि और अन्तमें है, उसका ‘हैं’-पना नित्य-निरन्तर है । जिसका ‘नहीं’-पना नित्य-निरन्तर है, वह ‘असत्‌’ है और जिसका ‘है’-पना नित्य-निरन्तर है, वह ‘सत्‌’ है । असत्‌के साथ हमारा नित्यवियोग है और सत्‌के साथ हमारा नित्ययोग है ।

         सुख-दुःख, हर्ष-शोक, राग-द्वेष, काम-क्रोध आदि आने-जानेवाले, बदलनेवाले हैं, पर सत्ता अर्थात्‌ स्वरूप ज्यों-का-त्यों रहनेवाला है । साधकसे यह बहुत बड़ी भूल होती है कि वह बदलनेवाली दशाको देखता है, पर सत्ताको नहीं देखता; दशाको स्वीकार करता है, पर सत्ताको स्वीकार नहीं करता । दशा पहले भी नहीं थी और पीछे भी नहीं रहेगी; अतः बीचमें दीखनेपर भी है नहीं । परन्तु सत्तामें आदि, अन्त और मध्य है ही नहीं । दशाको लेकर ही सत्ताका आदि, अन्त तथा मध्य कहा जाता है । दशा कभी एकरूप रहती ही नहीं और सत्ता कभी अनेकरूप होती ही नहीं । जो दीखता है, वह भी दशा है और जो देखनेवाली है, वह भी दशा है । जाननेमें आनेवाली भी दशा है और जाननेवाली भी दशा है । सत्तामें न दीखनेवाला है, न देखनेवाला है; न जाननेमें आनेवाला है, न जाननेवाला है; न समझनेवाला है, न समझानेवाला है; न श्रोता है, न वक्ता है । ये दीखनेवाला-देखनेवाला आदि सब दशाके अन्तर्गत हैं । दीखनेवाला-देखनेवाला आदि तो नहीं रहेंगे, पर सत्ता रहेगी; क्योंकि दशा तो मिट जायगी, पर सत्ता रह जायगी ।

   ( शेष आगे के ब्लॉग में )

‒ ‘अमरताकी ओर’ पुस्तकसे
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 *(१) यस्तु यस्यादिरन्तश्च स वै मध्यं च तस्य सन् ।
                                                  (श्रीमद्भा॰ ११/२४/१७)

           ‘जिसके आदि और अन्तमें जो है, वही बीचमें भी है और वही सत्य है ।’

            आद्यन्तयोरस्य यदेव केवलं कालश्च हेतुश्च तदेव मध्ये ॥

(श्रीमद्भा॰ ११/२८/१८)

         ‘इस संसारके आदिमें जो था तथा अन्तमें जो रहेगा, जो इसका मूल कारण और प्रकाशक है, वही परमात्मा बीचमें भी है ।’

    (२) न यत् पुरस्तादुत यन्न पश्चान्मध्ये च तत्र व्यपदेशमात्रम् ।
                                                             (श्रीमद्भा॰ ११/२८/२१)

      ‘जो उत्पत्तिसे पहले नहीं था और प्रलयके बाद भी नहीं रहेगा, ऐसा समझना चाहिये कि बीचमें भी वह है नहीं‒केवल कल्पनामात्र, नाममात्र ही है ।’

          आदावन्ते च यन्नास्ति वर्तमानेऽपि तत्तथा ।

                                               (माण्डूक्यकारिका २/६,४/३१)

          ‘जो आदि और अन्तमें नहीं है, वह वर्तमानमें भी नहीं है ।’

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🌹सत्‌-असत्‌का विवेक :

( गत ब्लॉग से आगे )

(७)

असत्‌का भाव निरन्तर अभावमें बदल रहा है । परन्तु जो असत्‌के अभावको जानता है, उस सत्‌-तत्त्वका भाव कभी अभावमें नहीं बदलता ।

उस सत्‌-तत्त्वमें सबकी स्वतःसिद्ध स्थिति है, इसीलिये अपने अभावका अनुभव कभी किसीको नहीं होता । वह सत्‌-तत्त्व सम्पूर्ण देश, काल, वस्तु, व्यक्ति, अवस्था, घटना, परिस्थिति आदिसे सर्वथा अतीत है । असत्‌को सत्ता और महत्ता देनेके कारण मनुष्य सत्‌-तत्त्वमें स्वतःसिद्ध स्थितिका अनुभव नहीं कर पाता । तात्पर्य है कि असत्‌की सत्तारूपसे मान्यता ही सत्‌की स्वीकृति नहीं होने देती । यहाँ शंका हो सकती है कि जब असत्‌की सत्ता है ही नहीं तो फिर वह दीखता क्यों है ? इसका समाधान यह है कि जिन इन्द्रियाँ, मन, बुद्धि, अहम्‌के द्वारा असत्‌ दीखता है, वे इन्द्रियाँ आदि भी उसी जातिके (असत्) ही हैं । तात्पर्य है कि असत्‌ (शरीर-इन्द्रियाँ-मन-बुद्धि-अहम्) के साथ तादात्मय न करें तो असत्‌ है ही नहीं, प्रत्युत सत्‌-ही-सत्‌ है । इसलिये सत्‌-तत्व (आत्मा) ने आजतक कभी असत्‌को देखा ही नहीं ! जैसे, सूर्यने आजतक कभी अन्धकारको देखा ही नहीं ! यह ज्ञानकी दृष्टिसे कहा गया है । अगर भक्तिकी दृष्टिसे देखें तो असत्‌ संसार प्रकृतिका कार्य है और प्रकृति भगवान्‌की शक्ति है* । भगवान्‌की शक्ति होनेसे प्रकृति और उसका कार्य भगवत्स्वरूप ही है; क्योंकि शक्ति शक्तिमान्‌से अलग नहीं हो सकती । जैसे शरीरके गोरे या काले रंगको शरीरसे अलग करके नहीं देख सकते, जाग्रत्‌-स्वप्न-सुषुप्ति अवस्थाओंको शरीरसे अलग करके नहीं देख सकते, ऐसे ही प्रकृतिको भगवान्‌से अलग करके नहीं देख सकते । जैसे मनुष्य अपनी शक्ति (बल, ताकत, विद्वता, योग्यता, चातुर्य, सामर्थ्य आदि) के बिना तो रह सकता है, पर शक्ति मनुष्यके बिना नहीं रह सकती, ऐसे ही भगवान्‌ तो शक्तिके बिना रह सकते हैं और रहते ही हैं†, पर शक्ति भगवान्‌के बिना नहीं रह सकती । तात्पर्य है कि शक्ति भगवान्‌के अधीन (आश्रित) है, भगवान्‌ शक्तिके अधीन नहीं है । शक्तिमान्‌के बिना शक्तिकी स्वतन्त्र सत्ताका अभाव होता है, पर शक्तिके बिना शक्तिमान्‌का अभाव नहीं होता । अतः भगवान्‌की शक्तिसे होनेसे प्रकृतिकी भी स्वतन्त्र सत्ताका अभाव है अर्थात्‌ एक भगवान्‌के सिवाय कुछ भी नहीं है । इसलिये भगवान्‌ने कहा है‒
‘सदसच्चाहमर्जुन’ (गीता ९/१९), ‘वासुदेवः सर्वम्’ (७/१९) ।
यह गीताका सर्वोपरि सिद्धान्त है, जिसमें सम्पूर्ण मतभेद समाप्त हो जाते हैं और‘वासुदेवः सर्वम्’ में अहम्‌की सूक्ष्म गन्ध भी नहीं है ।

   ( शेष आगे के ब्लॉग में )

‒ ‘अमरताकी ओर’ पुस्तकसे

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* भूमिरापोऽनलो वायुः खं मनो बुद्धिरेव च ।

    अहंकार इतीयं     मे भिन्ना   प्रकृतिरष्टधा ॥
       (गीता ७/४)

‘पृथ्वी, जल, तेज, वायु, आकाश‒ये पंचमहाभूत और मन, बुद्धि तथा अहंकार‒यह आठ प्रकारके भेदोंवाली मेरी अपरा प्रकृति है ।’

मायां तु प्रकृतिं विद्यान्मायिनं तु महेश्वरम् ।
                                                                                       (श्वेताश्वतर॰ ४/१०)

‘माया तो प्रकृतिको समझना चाहिये और मायापति महेश्वरको समझना चाहिये ।’

†विष्टभ्याहमिदं कृत्स्नमेकाशेन स्थितो जगत्‌ ॥ (गीता १०/४२)

          ‘मैं अपने किसी एक अंशसे सम्पूर्ण जगत्‌को व्याप्त करके स्थित हूँ ।’

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🌹सत्‌-असत्‌का विवेक :

( गत ब्लॉग से आगे )

(४)

जैसे हम कहते हैं कि यह मनुष्य है, यह पशु है, यह वृक्ष है, यह मकान है आदि, तो इसमें ‘मनुष्य, पशु, वृक्ष, मकान’ आदि तो पहले नहीं थे, पीछे भी नहीं रहेंगे तथा वर्तमानमें भी प्रतिक्षण अभावमें जा रहे हैं । परन्तु ‘है’ रूपसे जो सत्ता है, वह सदा ज्यों-की-त्यों है । तात्पर्य है कि ‘मनुष्य, पशु, वृक्ष, मकान’ आदि तो संसार (असत्) है और ‘है’ परमात्मतत्त्व (सत्) है । इसलिये ‘मनुष्य, पशु, वृक्ष, मकान’ आदि तो अलग-अलग हुए, पर ‘है’ वही रहा । इसी तरह मैं मनुष्य हूँ, मैं पशु हूँ, मैं देवता हूँ आदिमें शरीर तो अलग-अलग हुए, पर ‘हूँ’ वही रहा ।

संसारकी तो सत्ता नहीं है और परमात्मतत्त्वका अभाव नहीं है । अतः जो निरन्तर बदलता है, उसका भाव कभी नहीं हो सकता और जो कभी नहीं बदलता, उसका अभाव कभी नहीं हो सकता । ‘नहीं’ कभी ‘है’ नहीं हो सकता और ‘है’ कभी ‘नहीं’ नहीं हो सकता । असत्‌ कभी विद्यमान नहीं है और ‘सत्‌’ सदा विद्यमान है । जिसका अभाव है, उसीका त्याग करना है और जिसका भाव है, उसीको प्राप्त करना है‒इसके सिवाय और क्या बात होसकती है ! ‘है’ को स्वीकार करना है और ‘नहीं’ को अस्वीकार करना है‒यही वेदान्त है, वेदोंका खास निष्कर्ष है ।

(५)

असत्‌की नित्यनिवृत्ति है और सत्‌की नित्यप्राप्ति है । नित्य-निवृत्तकी निवृत्ति और नित्यप्राप्तकी प्राप्तिमें क्या कठिनता और क्या सुगमता ? क्या करना और क्या न करना ? क्या पाना और क्या खोना ? क्योंकि वह तो स्वतःसिद्ध है ।

खोया कहे सो बावरा,     पाया कहे सो कूर ।
पाया खोया कुछ नहीं, ज्यों-का-त्यों भरपूर ॥

जब सत्‌के सिवाय कुछ है ही नहीं, तो फिर इसमें क्या अभ्यास करें ? क्या चिन्तन करें ? इसमें न कुछ करना है, न कुछ सोचना है, न कुछ निश्चय करना है । असत्‌को मिटाना भी गलती है और उसको रखनेकी अथवा प्राप्त करनेकी चेष्टा करना भी गलती है । अतः उसको न मिटाना है, न रखना है, प्रत्युत उसकी उपेक्षा करनी है । जो नहीं है, वही मिटता है और जो है, वही मिलता है । अतः असत्‌की निवृत्ति करनी ही नहीं है; क्योंकि असत्‌ नित्य-निवृत्त है और सत्‌ नित्य-निरन्तर प्राप्त है—ऐसा विचार करके चुप हो जायँ, कुछ भी चिन्तन न करें । न संसारका चिन्तन करें; न परमात्माका चिन्तन करें । क्योंकि चिन्तन करनेसे हम संसार (अन्तःकरण) के साथ जुड़ते हैं और परमात्मासे दूर होते हैं । अतः चिन्तन नहीं करना है, प्रत्युत चिन्तन करनेकी शक्ति जिससे प्रकाशित होती है, उसमें अपनी स्थितिका अनुभव करना है, जो कि स्वतःसिद्ध है । जिस ज्ञानके अन्तर्गत वृत्तियाँ दीखती हैं, उस ज्ञानमें अपनी स्थितिका अनुभव करना है, जो कि स्वतःसिद्ध है ।

(६)

यद्यपि भाव परमात्माका ही है, संसारका नहीं, तथापि मनुष्यसे भूल यह होती है कि वह पहले संसार (शरीर) को देखकर फिर उसमें परमात्माको देखता है, पहले आकृतिको देखकर फिर भावको देखता है । ऊपर लगायी हुई पालिश कबतक टिकेगी ? साधकको विचार करना चाहिये कि परमात्मा पहले थे या संसार पहले था ? स्वयं (स्वरूप) पहले था या शरीर पहले था ? विचार करनेपर सिद्ध होता है कि परमात्मा पहले हैं, संसार पीछे है; स्वयं पहले है, शरीर पीछे है; भाव पहले है, आकृति पीछे है । इसलिये साधककी दृष्टि पहले भावरूप परमात्मा या चिन्मय सत्ताकी तरफ जानी चाहिये, संसार या शरीरकी तरफ नहीं । हम संसारमें हैं और परमात्माको प्राप्त करना है‒ऐसा मानना ही गलती है; क्योंकि वास्तवमें हम परमात्मामें ही हैं । संसारकी तो सत्ता ही नहीं है‒
 ‘नासतो विद्यते भावः’ ।
साधककी दृष्टि भावरूप परमात्माकी तरफ ही रहनी चाहिये, अभावरूप संसारकी तरफ नहीं, प्रत्युत संसारसे विमुखता होनी चाहिये ।

    ( शेष आगेके ब्लॉगमें )

‒ ‘अमरताकी ओर’ पुस्तकसे

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सोमवार, 16 जनवरी 2017

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🌹सत्‌-असत्‌का विवेक :

( गत ब्लॉगसे आगे )

परमात्मतत्त्वको कितना ही अस्वीकार करें, उसकी कितनी ही उपेक्षा करें, उससे कितना ही विमुख हो जायँ, उसका कितना ही तिरस्कार करें, उसका कितनी ही युक्तियोंसे खंडन करें, पर वास्तवमें उसका अभाव विद्यमान है ही नहीं । सत्‌का अभाव होना सम्भव ही नहीं है । सत्‌का अभाव कभी कोई कर सकता ही नहीं‒

 ‘विनाशमव्ययस्यास्य न कश्चित्कर्तुमर्हति’ (गीता २/१७) ।

‘उभयोरपि दृष्टः’ पदोंका तात्पर्य है कि तत्त्वदर्शी महापुरुषोंने सत्‌-तत्त्वको उत्पन्न नहीं किया है, प्रत्युत देखा है अर्थात्‌ अनुभव किया है । तात्पर्य है कि असत्‌का अभाव और सत्‌का भाव‒दोनोंके तत्त्वको (निष्कर्ष) को जाननेवाले जीवनमुक्त, तत्त्वज्ञ महापुरुष एक सत्‌-तत्त्वको ही देखते हैं अर्थात्‌ स्वतः-स्वाभाविक एक ‘है’का ही अनुभव करते हैं । इसलिये असत्‌की सत्ता नहीं है‒यह भी सत्य है और सत्‌का अभाव नहीं है‒यह भी सत्य है । अतः दोनोंका तत्त्व सत्‌ ही है‒ऐसा जान लेनेपर उन महापुरुषोंकी दृष्टिमें एक सत्‌-तत्त्व (‘है’) के सिवाय और किसीकी स्वतन्त्र सत्ता रहती ही नहीं ।

असत्‌की सत्ता विद्यमान न रहनेसे उसका अभाव और सत्‌का अभाव विद्यमान न रहनेसे उसका भाव सिद्ध हुआ । निष्कर्ष यह निकला कि असत्‌ है ही नहीं, प्रत्युत सत्‌-ही-सत्‌ है ।

(३)

जो सहज निवृत्त है, वह ‘असत्‌’ है और जो स्वतः प्राप्त है, वह ‘सत्‌’ है ।निवृत्तिका नित्यवियोग है और प्राप्तका नित्ययोग है । असत्‌का केवल अभाव-ही-अभाव है और इस अभावका कभी अभाव (नाश) नहीं होता । सत्‌का केवल भाव-ही-भाव है और इस भावका अभी अभाव नहीं होता । असत्‌की सत्ता माननेसे ही निवृत्त और प्राप्त ये दो विभाग कहे जाते हैं । असत्‌को सत्ता न दें तो न निवृत्त है, न प्राप्त है, प्रत्युत सत्तामात्र ज्यों-की-त्यों है । दूसरे शब्दोंमें, जबतक असत्‌की सत्ता है, तबतक विवेक है । असत्‌की सत्ता मिटनेपर विवेक ही तत्त्वज्ञानमें परिणत हो जाता है ।
‘उभयोरपि दृष्टोऽन्तस्त्वनयोस्तत्त्वदर्शिभिः’‒इसमें‘उभयोरपि’
में विवेक है और ‘अन्तः’ में तत्त्वज्ञान है अर्थात्‌ विवेक तत्त्वज्ञानमें परिणत हो गया और सत्तामात्र ही शेष रह गयी ।

जैसे दिन और रात‒दोनों अलग-अलग हैं, ऐसे ही सत्‌ और असत्‌‒दोनों अलग-अलग हैं । जैसे दिन रात नहीं हो सकता और रात दिन नहीं हो सकती, ऐसे ही सत्‌ असत्‌ नहीं हो सकता और असत्‌ सत्‌ नहीं हो सकता; परन्तु तत्त्वसे दोनों एक ही हैं । जैसे दिन और रात‒दोनों सापेक्ष हैं, दिनकी अपेक्षा रात है और रातकी अपेक्षा दिन है, पर सूर्यमें न दिन है, न रात है अर्थात्‌ वह निरपेक्ष प्रकाश है ।ऐसे ही सत्‌ और असत्‌‒दोनों सापेक्ष हैं, पर परमात्मतत्त्व (सत्‌-तत्त्व) निरपेक्ष है । इसलिये तत्त्वदर्शी महापुरुष सत्‌-असत्‌‒दोनोंके एक ही तत्त्व सत्‌-तत्त्व अर्थात्‌ निरपेक्ष परमात्मतत्त्वका अनुभव करते हैं ।

   (शेष आगेके ब्लॉगमें)

‒ ‘अमरताकी ओर’ पुस्तकसे

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🌹 सत्‌-असत्‌का विवेक : 🌹

श्रीमद्भगवद्गीताका एक श्लोक है‒

नासतो विद्यते भावो नाभावो विद्यते सतः ।

उभयोरपि  दृष्टोऽन्तस्त्वनयोस्तत्त्वदर्शिभिः ॥
      (२/१६)

‘असत्‌का तो भाव (सत्ता) विद्यमान नहीं है और सत्‌का अभाव विद्यमान नहीं है । तत्त्वदर्शी महापुरुषोंने इन दोनोंका ही अन्त अर्थात्‌ तत्त्व देखा है, अनुभव किया है ।’

(१)

इस श्लोकके पूर्वार्धमें आये ‘नासतो विद्यते भावो नाभावो विद्यते सतः’‒इन सोलह अक्षरोंमें सम्पूर्ण वेदों, पुराणों, शास्त्रोंका तात्पर्य भरा हुआ है ! चिन्मय सत्तामात्र ‘सत्‌’ है आर सत्ताके सिवाय जो कुछ भी प्रकृति और प्रकृतिका कार्य (क्रिया और पदार्थ) है, वह सब ‘असत्‌’ अर्थात्‌ जड़ और परिवर्तनशील है । देखने, सुनने, समझने, चिन्तन करने, निश्चय करने आदिमें जो कुछ भी आता है, वह सब ‘असत्‌’ है । जिसके द्वारा देखते, सुनते, चिन्तन आदि करते हैं, वह भी ‘असत्‌’ है और दीखनेवाला भी ‘असत्‌’ है । असत्‌ और सत्‌‒इन दोनोंको ही प्रकृति और पुरुष, क्षर और अक्षर, शरीर और शरीरी, अनित्य और नित्य, नाशवान्‌ और अविनाशी आदि अनेक नामोंसे कहा गया है ।

पूर्वोक्त श्लोकार्ध (सोलह अक्षरों) में तीन धातुओंका प्रयोग हुआ है‒

(१)        ‘भू सत्तायाम्’‒जैसे, ‘अभावः’ और ‘भावः’ ।

(२)        ‘अस् भुवि’‒जैसे, ‘असतः’ और सतः’ ।

(३)        ‘विद् सत्तायाम्’‒जैसे, ‘विद्यते’ और ‘न विद्यते’ ।

यद्यपि इन तीनों धातुओंका मूल अर्थ एक ‘सत्ता’ ही है, तथापि सूक्ष्म रूपसे ये तीनों अपना स्वतन्त्र अर्थ भी रखते हैं; जैसे‒‘भू’ धातुका अर्थ ‘उत्पत्ति’ है, ‘अस्’ धातुका अर्थ ‘सत्ता’ (होनापन) है और ‘विद्’ धातुका अर्थ ‘विद्यमानता’ (वर्तमानकी सत्ता) है ।

(२)

‘नासतो विद्यते भावः’ पदोंका अर्थ है‒‘असतः भावः न विद्यते’ अर्थात्‌ असत्‌की सत्ता विद्यमान नहीं है, प्रत्युत असत्‌का अभाव ही विद्यमान है । असत्‌ वर्तमान नहीं है । असत्‌ उपस्थित नहीं है । असत्‌ प्राप्त नहीं है । असत्‌ मिला हुआ नहीं है । असत्‌ मौजूद नहीं है । असत्‌ कायम नहीं है । जो वस्तु उत्पन्न होती है, उसका नाश अवश्य होता है‒यह नियम है । उत्पन्न होते ही तत्काल उस वस्तुका नाश शुरू हो जाता है । उसका नाश इतनी तेजीसे होता है कि उसको दो बार कोई देख ही नहीं सकता अर्थात्‌ उसको एक बार देखनेपर फिर दुबारा उसी स्थितिमें नहीं देखा जा सकता । यह सिद्धान्त है कि जिस वस्तुका किसी भी क्षण अभाव है, उसका सदा-सर्वदा अभाव ही है । अतः संसारका सदा ही अभाव है । संसारको कितनी ही सत्ता दें, उसको कितना ही ऊँचा मानें, उसका कितना ही आदर करें, उसको कितना ही महत्त्व दें, पर वास्तवमें वह विद्यमान है ही नहीं । असत्‌ प्राप्त है ही नहीं, कभी प्राप्त हुआ ही नहीं, कभी प्राप्त होगा ही नहीं । असत्‌का प्राप्त होना सम्भव ही नहीं है ।

‘नाभावो विद्यते सतः’ पदोंका अर्थ है ‒‘सतः अभावः न विद्यते’ अर्थात्‌ सत्‌का अभाव विद्यमान नहीं है, प्रत्युत सत्‌का भाव ही विद्यमान है । दूसरे शब्दोंमें, सत्‌की सत्ता निरन्तर विद्यमान है । सत्‌ सदा वर्तमान है । सत्‌ सदा उपस्थित है । सत्‌ सदा प्राप्त है । सत्‌ सदा मिला हुआ है । सत्‌ सदा मौजूद है । सत्‌ सदा कायम है । किसी भी देश, काल, वस्तु, व्यक्ति, घटना, परिस्थिति, अवस्था, क्रिया आदिमें सत्‌का अभाव नहीं होता । कारण कि देश, काल, वस्तु आदि तो असत्‌ (अभावरूप अर्थात्‌ निरन्तर परिवर्तनशील) हैं, पर सत्‌ सदा ज्यों-का-त्यों रहता है । उसमें कभी किंचिन्मात्र भी कोई परिवर्तन नहीं होता, कोई कमी नहीं आती । अतः सत्‌का सदा भी भाव है ।

   (शेष आगेके ब्लॉगमें)

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🌹सत्संगसे लाभ कैसे लें ?

( गत ब्लॉग से आगे )

परमात्मा कभी हमारेसे अलग नहीं होते । उनको हम जानें तो हमारे साथ हैं, हम न जानें तो हमारे साथ हैं; हम उनके सम्मुख हो जायँ तो हमारे साथ हैं, उनसे विमुख रहें तो हमारे साथ हैं । जहाँ मैं हूँ, वहाँ भी परमात्मा हैं । जो ‘हूँ’ है, वह ‘है’‒(परमात्मा) के साथ हैं । इस ‘हूँ’ को शरीरके साथ मान लेते हैं‒यह गलती है । परमात्मा यहाँ हैं, अभी हैं, मेरेमें हैं, मेरे हैं‒इस बातको पकड़ लो । ये बातें सीखनेके लिये और सुनने-सुनानेके लिये नहीं हैं । ये पकड़नेकी, स्वीकार करनेकी बातें हैं । संसारकी बातोंमें उलझ करके उनमें भी दो बातें कर लेते हो अर्थात्‌ सुख और दुःख, अनुकूल और प्रतिकूल‒ये दो मान्यताएँ कर लेते हो, इससे बड़ा भारी बन्धन होता है । इन दो चीजोंसे अर्थात्‌ द्वन्द्वोंसे रहित होनेसे मनुष्य सुखपूर्वक बन्धनसे मुक्त हो जाता है‒
‘निर्द्वन्द्वो हि महाबाहो सुखं बन्धात्प्रमुच्यते’ (गीता ५/३) ।
 इसलिये द्वन्द्वोंमें नहीं फँसना चाहिये ।

संसारकी किसी समाज-सम्बन्धी बातको लेकर कोई कहता है कि यह ठीक है और कोई कहता है कि यह बेठीक है, तो वास्तवमें वे दोनों ही बेठीक हैं; क्योंकि दोनोंसे मुक्ति तो होती नहीं ! केवल संसारमें फँसनेका तरीका है । संसारकी दो बातोंको लेकर उनमेंसे किसी एक बातको पकड़ लेते हैं तो बड़ी भारी हानि होती है । इससे कल्याण नहीं होता । व्यवहारमें जो बात ठीक है, उसको कर लें, पर उसको पकड़ें नहीं । वह बात ठहरेगी नहीं, रहेगी नहीं और परमात्मा रहेंगे । परमात्माका सम्बन्ध कभी छूटेगा नहीं । संसारके साथ हमारा सम्बन्ध है ही नहीं । उस संसारमें अच्छा और मन्दा क्या, ठीक और बेठीक क्या, पूरा-का-पूरा बेठीक है । अब ये कहते हैं कि हम तो गृहस्थी हैं । अगर गृहस्थी हो तो अच्छा काम करो, फँसते क्यों हो ? काम गृहस्थीको भी करना है और साधुको भी करना है, पर फँसना नहीं है । मान और अपमान‒दोनोंको बराबर समझना है । ये दोनों ही तुल्य हैं‒
‘मानापमानयोस्तुल्यः’ (गीत १४/२५) ।
जिस जातिका मान है, उसी जातिका अपमान है । ये दोनों ही ताज्य हैं । न मान ग्राह्य है और न अपमान ग्राह्य है । इसमें क्या राजी और क्या नाराज होवें ?
‘किं भद्रं किमभद्रं वा’ (श्रीमद्भागवत ११/२८/४)
‒क्या ठीक और क्या बेठीक ?

गीतामें आया है‒
‘सुखदुःखे समे कृत्वा लाभालाभौ जयाजयौ’ (गीता २/३८) ।
तो ‘समे कृत्वा’ का अर्थ क्या हुआ ? कि जय हो गयी तो क्या और पराजय हो गयी तो क्या ? लाभ हो जाय तो क्या और हानि हो गयी तो क्या ? सुख हो तो क्या और दुःख हो तो क्या ? ये तो मिटनेवाले हैं । रहनेवाली न जय है, न पराजय है, न लाभ है, न हानि है, न सुख है, न दुःख है । वक्तपर जो काम आया, उसे निर्लेप होकर कर दिया, बस । अतः संसारके संयोग-वियोगको महत्त्व मत दो । फिर यह सत्संगवाली स्थिति हो जायगी । परन्तु संसारके संयोग-वियोगको महत्त्व दोगे तो सत्संगकी बात स्थायी होनेके लिये आपको वक्त ही नहीं मिलेगा !

भगवान्‌ने भी आरम्भमें ही कह दिया‒
‘आगमापायिनोऽनित्यास्तांस्तितिक्षस्व’ (गीता २/१४)
अर्थात्‌ ये सांसारिक चीजें आने-जानेवाली और अनित्य हैं, इनको तुम सह लो । सहनेका अर्थ है कि तुम विकृत मत होओ, राजी-नाराज मत होओ । ये सांसारिक पदार्थ जिसको व्यथा नहीं पहुँचाते, वह मुक्तिका पात्र होता है‒
‘यं ही न व्यथयन्त्येते.....सोऽमृततत्वाय कल्पते’ (गीता २/१५)
 और जिसको ये व्यथा पहुँचाते हैं, उसकी मुक्ति नहीं होती । मान अच्छा है, अपमान खराब है‒इसको पकड़ लिया तो मुक्तिसे वंचित रह गये । ये मान-अपमान आदि आपको धोखा देनेवाले हैं । ये तो रहेने नहीं, पर आपको मुक्तिसे वंचित कर देंगे । इसलिये ठीक-बेठीक सब ताज्य है, छोड़नेकी चीज है । हम इनसे छूटें कैसे ? कि हम सम रहें । आप अपनी तरफ खयाल करें । मानके समय आप दूसरे और अपमानके समय आप दूसरे होते हो क्या ? इसलिये इनको न देखकर अपनेमें स्थित रहो, ‘स्व’ में स्थित रहो‒
‘समदुःखसुखः स्वस्थः’ (गीता १४/२४) ।
 इस ‘स्व’ में स्थितिको ही सत्संगके द्वारा पकड़ना है । सत्संगकी बातोंका सुख नहीं लेना है ।

नारायण ! नारायण !! नारायण !!!

‒ ‘भगवत्प्राप्तिकी सुगमता’ पुस्तकसे

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