🚩🔱 ❄ «ॐ»«ॐ»«ॐ» ❄ 🔱🚩

※══❖═══▩ஜ ۩۞۩ ஜ▩═══❖══※
  🌹🌟 राधे नाम संग हरि बोल 🌟🌹
 ※❖ॐ∥▩∥श्री∥ஜ ۩۞۩ ஜ∥श्री∥▩∥ॐ❖※

   🌹🔱💧संत अमृत वाणी💧🔱🌹

❄ विनाशीका आकर्षण कैसे मिटे ?

(गत ब्लॉगसे आगेका)

       जैसे ‘मैं-पन’ है, यह तो बदलता रहता है, मैं खाता हूँ, मैं सोता हूँ । मैं जाता हूँ; परन्तु मेरी सत्ता (होनापन) तो एक ही है । सुषुप्ति-अवस्थामें ‘मैं-पन’ तो अज्ञानमें लीन हो जाता है; परन्तु आप ‘स्वयम्’ तो रहते हैं । ‘मैं-पन’ के भावका-अभावका‒दोनोंका ज्ञान आपको खुदको होता है । अभी ‘मैं-पन’ का भाव है, सुषुप्ति-अवस्थामें ‘मैं-पन’ का अभाव हो जाता है, तो ‘मैं-पन’ का अभाव होनेपर भी मेरी सत्ता रहती है । तो ‘मैं-पन’ से अलग हमारी स्वतन्त्र सत्ता है, ‘मैं-पन’ तो प्रकट और अप्रकट होता है, पर हमारी सत्ता अप्रकट नहीं होती, प्रकट ही रहती है । हमारी सत्ताके साथ जब ‘मैं-पन’ भी नहीं है तो शरीरका साथ कहाँ है ? और जब शरीर भी साथ नहीं है तो स्त्री, पुरुष, कुटुम्बी साथ कहाँ है ? तो मैं खुद (स्वयं) तो इनसे अलायदा हूँ, ये सब उत्पत्ति-विनाशशील हैं । इनको मैं जानता हूँ, ये सब मेरे जाननेमें आते हैं । ये सब उत्पत्ति-विनाशशील हैं इसका मेरेको ज्ञान है ।

      तीसरी बात, ‘मैं’ कल था, वही आज हूँ और रात्रिमें भी मैं था, तो ‘मैं’ नित्य-निरन्तर रहता हूँ । ये निरन्तर नहीं रहते, मेरे सामने बनते-बिगड़ते हैं, मिटते हैं । इनको मैं महत्त्व देकर इनका आश्रय लेता हूँ, यह गलती करता हूँ । मैं जानता हूँ कि ये उत्पत्ति-विनाशशील हैं, ये मेरा आधार कैसे हो सकते हैं ? ये मेरा आश्रय कैसे हो सकते हैं ? ये मेरेको क्या सहारा दे सकते हैं ? जो कि मैं इनसे अलायदा हूँ । ये सब मेरे जाननेमें आते हैं, सुषुप्तिमें कुछ भी ज्ञान नहीं था, यह भी जाननेमें आता है और जाग्रत्‌, स्वप्नमें जो ज्ञान होता है, यह भी मेरे जाननेमें आता है । मैं (स्वयं) इन सबको जाननेवाला हूँ; मैं जाननेवाला, जाननेमें आनेवाली वस्तुओंसे अलग हूँ ।इसमें कोई सन्देह है क्या ? सन्देह नहीं है न ? तो ‘मैं’ इनसे अलग हूँ इसपर आप स्थिर हो जाओ । दिनमें, रातमें, सुबह-शाम जब आपको समय मिले तब कहो कि मैं वास्तवमें इनके साथ नहीं हूँ और ये मेरे साथ नहीं है । मैं इनके साथ सुषुप्तिमें भी नहीं रह सकता तो मरनेके बाद कैसे रहूँगा ? और ये मेरे साथ सुषुप्तिमें भी नहीं रह सकते तो सदा मेरे साथ कैसे रहेंगे ? अतः इनका हमारा सम्बन्ध नित्य रहनेवाला नहीं है । इसका ज्ञान तो प्रत्यक्ष होना चाहिये न ?

      संसारका आकर्षण न छूटे तो कोई परवाह नहीं, परन्तु यह ज्ञान तो हैं न; कि इनके साथ मेरा नित्य-सम्बन्ध नहीं है ? इस ज्ञानमें तो सन्देह नहीं है न ? यह बात आप धारण कर लो । आकर्षण‒छूटे-न-छूटे इसकी परवाह मत करो, पर मेरे साथ इसका सम्बन्ध नहीं है । पहले नहीं था और फिर नहीं रहेगा । यह बात तो हमारे अनुभवकी है । इस जन्ममें भी जिस कुटुम्बके साथ, जिस घरके साथ, जिन रुपये-पैसोंके साथ, वस्तुओंके साथ आज हमारा सम्बन्ध है, यह सम्बन्ध पहले था क्या ? और अगाड़ी भी रहेगा क्या ? तो पहले हमारे साथ सम्बन्ध नहीं था, अगाड़ी इनका सम्बन्ध हमारे साथ नहीं रहेगा और जो अभी है, वही भी वियुक्त हो रहा है । यह बात मुझे अच्छी लगती है, इस वास्ते मैं बार-बार कहता हूँ ।

    (शेष आगेके ब्लॉगमें)

‒ ‘भगवत्प्राप्ति सहज है’ पुस्तकसे

 ※❖ॐ∥▩∥श्री∥ஜ ۩۞۩ ஜ∥श्री∥▩∥ॐ❖※
 🌹۞☀∥ राधेकृष्ण: शरणम् ∥☀۞🌹
 ※❖ॐ∥▩∥श्री∥ஜ ۩۞۩ ஜ∥श्री∥▩∥ॐ❖※

  🌹: कृष्णा : श्री राधा प्रेमी : 🌹          
 https://plus.google.com/113265611816933398824

🌹धार्मिक पोस्ट पाने या हमारे सत्संग में सामिल होने के लिए हमारे नंम्बर पर " राधे राधे " शेयर करें 💐
 : मोबाइल नम्बर .9009290042 :

※══❖═══▩ஜ ۩۞۩ ஜ▩═══❖══※

टिप्पणियाँ