शनिवार, 10 सितंबर 2016

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  🌹🌟 राधे नाम संग हरि बोल 🌟🌹
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   🌹🔱💧संत अमृत वाणी💧🔱🌹

🌟 गीताकी अलौकिक शिक्षा :

 (गत ब्लॉगसे आगेका)

संसारमें अपने-अपने क्षेत्रमें जो मनुष्य दूसरोंके द्वारा मुख्य, श्रेष्ठ माने जाते हैं, उन आचार्य, गुरु, अध्यापक, व्याख्यानदाता, महन्त, शासक, मुखिया आदिपर दूसरोंको शिक्षा देनेकी, दूसरोंका हित करनेकी विशेष जिम्मेवारी रहती है । अतः उनके लिये गीता कहती है‒

यद्यदाचरति श्रेष्ठस्तत्तदेवेतरो जनः ।
स यत्प्रमाणं कुरुते लोकस्तदनुवर्तते ॥
(३/२१)

‘श्रेष्ठ मनुष्य जो-जो आचरण करता है, दूसरे मनुष्य वैसा-वैसा ही आचरण करते हैं और वह जो कुछ कहता है, दूसरे मनुष्य उसीके अनुसार करते हैं ।’

उपर्युक्त श्लोकमें श्रेष्ठ मनुष्यके आचरणके विषयमें तो ‘यत्-यत्’, ‘तत्-तत्’और ‘एव’‒ये पाँच पद आये हैं, पर प्रमाण-(वचन-) के विषयमें ‘यत्’ और ‘तत्’‒ये दो ही पद आये हैं । इसका तात्पर्य यह है कि मनुष्यके आचरणोंका असर दूसरोंपर पाँच गुना (अधिक) पड़ता है और वचनोंका असर दो गुना (अपेक्षाकृत कम) पड़ता है ।जो मनुष्य स्वयं कर्तव्यका पालन न करके केवल अपने वचनोंसे दूसरोंको कर्तव्यपालनकी शिक्षा देता है, उसकी शिक्षाका लोगोंपर विशेष असर नहीं पड़ता । शिक्षाका लोगोंपर विशेष असर तभी पड़ता है, जब शिक्षा देनेवाला स्वयं भीनिष्कामभावसे शास्त्र और लोककी मर्यादाके अनुसार चले । इसलिये भगवान्‌ अपना उदाहरण देते हुए कहते हैं कि यद्यपि मेरे लिये त्रिलोकीमें कुछ भी कर्तव्य और प्राप्तव्य नहीं है, तो भी मैं जहाँ जिस रूपसे अवतार लेता हूँ, वहाँ उस अवतारके अनुसार ही अपने कर्तव्यका पालन करता हूँ । यदि मैं निरालस्य होकर, सावधानीपूर्वक कर्तव्यका पालन न करूँ तो मुझमें श्रद्धा-विश्वास रखनेवाले दूसरे लोग भी वैसा ही करने लग जायँगे, अर्थात्‌ वे भी प्रमादमें, असावधानीसे अपने कर्तव्यकी उपेक्षा करने लग जायँगे, जिससे परिणाममें उनका पतन हो जायगा (३/२२-२३) ।

मनुष्यमात्रमें तीन कमियाँ होती हैं‒करनेकी कमी, जाननेकी कमी और पानेकी कमी । इन तीनों कमियोंको दूर करके अपना उद्धार करनेके लिये मनुष्यको तीन शक्तियाँ भी प्राप्त हैं‒करनेकी शक्ति, जाननेकी शक्ति और माननेकी शक्ति । इन तीनों शक्तियोंके रहते हुए भी मनुष्य केवल बेसमझी और सुखासक्तिके कारण अपनेमें कमीका दुःख भोगता है । यदि वह इन तीनों शक्तियोंका सदुपयोग करे तो अपनी कमियोंकी पूर्ति करके पूर्णताको प्राप्त कर सकता है । निष्कामभावसे दूसरोंके हितके लिये कर्म (सेवा) करना ‘करनेकी शक्ति’ का सदुपयोग है, जो ‘कर्मयोग’ है । शरीरसे असंग होकर अपने स्वरूपमें स्थित होना ‘जाननेकी शक्ति’ का सदुपयोग है, जो ‘ज्ञानयोग’ है । भगवान्‌को अपना और अपनेको भगवान्‌का मानना ‘माननेकी शक्ति’ का सदुपयोग है, जो ‘भक्तियोग’ है । गीता इन तीनों ही योगमार्गोंकी शिक्षा देती है; जैसे‒

जो केवल यज्ञके लिये अर्थात्‌ निष्कामभावपूर्वक दूसरोंके हितके लिये कर्म करता है, वह कर्मयोगी कर्म-बन्धनसे छूट जाता है-
‘यज्ञायाचरतः कर्म समग्रं प्रविलीयते’
(४/२३) ।
 करण कि शरीरादि पदार्थोंको अपना और अपने लिये न मानकर दूसरोंकी सेवामें लगानेसे इन पदार्थोंसे स्वतः सम्बन्ध-विच्छेद हो जाता है ।

जो सम्पूर्ण क्रियाओंको प्रकृतिके द्वारा होनेवाली देखता है और अपने-आपको किसी भी क्रियाका कर्ता नहींदेखता, उस ज्ञानयोगीको अपने स्वरूपका बोध हो जाता है ।

जो संसारसे विमुख होकर केवल भगवान्‌की शरण हो जाता है और भगवान्‌के सिवाय कुछ भी नहीं चाहता, उसके उद्धारकी सम्पूर्ण जिम्मेवारी भगवान्‌पर ही आ जाती है । इसलिये भगवान्‌ स्वयं उस शरणागत भक्तके योगक्षेमका वहन करते हैं, उसके सम्पूर्ण पापोंका नाश कर देते हैं, उसका मृत्युरूप संसार-समुद्रसे शीघ्र ही उद्धार कर देते हैं और उसे तत्वज्ञान भी करा देते हैं ।भक्तियोगमें यह विशेषता है कि भक्त भगवत्कृपासे भगवान्‌को तत्त्वसे जान भी जाता है, भगवान्‌के दर्शन भी कर लेता है और भगवान्‌को प्राप्त भी कर लेता है ।

इस प्रकार गीतामें ऐसी अनेक अलौकिक शिक्षाएँ दी गयी हैं, जिनके अनुसार आचरण करके मनुष्य सुगमतासे अपने परम लक्ष्य परमात्मतत्त्वकी प्राप्ति कर सकता है ।

नारायण ! नारायण !! नारायण !!!

‒ ‘कल्याण-पथ’ पुस्तकसे

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