गुरुवार, 15 सितंबर 2016

🚩🔱 ❄ «ॐ»«ॐ»«ॐ» ❄ 🔱🚩

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  🌹🌟 राधे नाम संग हरि बोल 🌟🌹
 ※❖ॐ∥▩∥श्री∥ஜ ۩۞۩ ஜ∥श्री∥▩∥ॐ❖※

   🌹🔱💧संत अमृत वाणी💧🔱🌹

🌟 गीताका तात्पर्य :

(गत ब्लॉगसे आगेका)

हमारी भारतीय संस्कृति बड़ी विलक्षण है, जो प्राणिमात्रका उद्धार चाहती है । राजस्थानमें मैंने देखा कि जब किसनालोग खेती करते हैं, तब पहले वे भगवान्‌से प्रार्थना करते हैं कि ‘पशुओंके भाग्यका, पक्षियोंके भाग्यका, चिड़ी-कमेड़ीके भाग्यका, अटाऊ-बटाऊके भाग्यका हमें देना महाराज !’ तात्पर्य है खेती केवल हमारे लिये नहीं है, प्रत्युत सबके लिये है, जब खेती पकती है, तब जो फल सबसे पहले आता है, उसको पहले अपने काममें नहीं लेते । पहले उसको मन्दिरमें या ब्राह्मणों अथवा साधुओंके पास भेजते हैं, फिर उसको काममें लेते हैं । ऐसे ही रसोई बनती है तो पहले अतिथि आदिको देकर फिर भोजन करते हैं । रसोई बननेके बाद ‘बलिवैश्वदेव’ करनेका विधान आता है । उसमें विश्वमात्रके लिये अन्न अर्पण किया जाता है । कोई मर जाता है तो उसके लिये श्राद्ध और तर्पण करते हैं । इतना ही नहीं, सम्पूर्ण जीवोंको, देवताओंको और ईश्वरको भी पिण्ड और पानी देते हैं । भगवान्‌में किसी कमीकी सम्भावना ही नहीं है । परन्तु जैसे बालक पिताकी ही चीज पिताको अर्पण करता है तो पिता प्रसन्न हो जाता है, ऐसे ही भगवान्‌की चीज भगवान्‌को अर्पण करनेसे भगवान्‌ प्रसन्न हो जाते हैं ।समुद्रको भी जल देते हैं और सूर्यको भी दीपक दिखाते हैं, आरती करते हैं । क्या समुद्रमें जलकी कमी है ? सूर्यमें प्रकाशकी कमी है ? उनमें कमी नहीं है, पर हमारा उदारभाव, सबकी सेवा करनेका भाव, सबको सुख पहुँचानेका भाव कल्याण करनेवाला है‒

सर्वे भवन्तुः सुखिनः       सर्वे सन्तु निरामयाः ।
सर्वे भद्राणि पशन्तु मा कश्चिद् दुःखभाग्भवेत् ॥

‒इसी बातको गीताने ‘सर्वभूतहिते रताः’ (५/२५, १२/४) पदोंसे कहा है । सबको देनेके बाद जो शेष बचता है, वह‘यज्ञशेष’ कहलाता है । गीता कहती है‒

यज्ञशिष्टाशिनः सन्तो मुच्यन्ते सर्वकिल्बिषैः ।
                                                    (३/१३)

‘यज्ञशेषग्रहण करनेवाले श्रेष्ठ मनुष्य सम्पूर्ण पापोंसे मुक्त हो जाते हैं ।’
यज्ञशिष्टामृतभुजो यान्ति ब्रह्म सनातनम् ॥
                                                   (४/३१)

‘यज्ञशेष अमृतको ग्रहण करनेवाले सनातन परब्रह्म परमात्माको प्राप्त होते हैं ।’

कर्मयोगी सब वस्तुओंको संसारके अर्पण करता है, ज्ञानयोगी प्रकृतिके अर्पण करता है और भक्तियोगी भगवान्‌के अर्पण करता है । किसीके भी अर्पण करो, पर अपने लिये मत मानो‒यह खास बात है । वास्तवमें वस्तु कल्याण करनेवाली नहीं है, प्रत्युत हमारा उदारभाव कल्याण करनेवाला है । यदि वस्तु कल्याण करनेवाली हो तो लखपति, करोड़पति या अरबपति तो अपना कल्याण कर लेंगे, पर साधारण आदमी अपना कल्याण नहीं कर सकेगा । परन्तु वास्तवमें कल्याण त्यागीका होता है, संग्रहीका नहीं । अतः इतना धन खर्च करनेसे कल्याण होगा, इतनी वस्तुओंको देनेसे कल्याण होगा‒यह बात है ही नहीं । कल्याण हमारे इस भावसे होगा कि सबका हित हो जाय, सब सुखी हो जायँ । भगवान्‌ क्रियाग्राही या वस्तुग्राही नहीं हैं, प्रत्युत भावग्राही हैं‒‘भावग्राही जनार्दनः ।’

    (शेष आगेके ब्लॉगमें)

‒ ‘जित देखूँ तित तू’ पुस्तकसे

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