रविवार, 25 सितंबर 2016

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  🌹🌟 राधे नाम संग हरि बोल 🌟🌹
 ※❖ॐ∥▩∥श्री∥ஜ ۩۞۩ ஜ∥श्री∥▩∥ॐ❖※

   🌹🔱💧संत अमृत वाणी💧🔱🌹

🌟 भक्तशिरोमणि श्रीहनुमान्‌जीकी दास्य-रति :

 (गत ब्लॉगसे आगेका)

        माधुर्य-रतिके दो भेद हैं‒स्वकीया और परकीया । ‘स्वकीया माधुर्य-रति’ में पति-पत्नीके सम्बन्धका भाव रहता है । पतिव्रता स्त्री अपने माता, पिता, भाई, कुल आदि सबका त्याग करके अपने-आपको पतिकी सेवामें अर्पित कर देती है । इतना ही नहीं, वह अपने गोत्रका भी त्याग करके पतिके गोत्रकी बन जाती है* । अपना तन, मन, धन, बल, बुद्धि आदि सब कुछ पतिके अर्पण करके सर्वथा पतिके परायण हो जाती है । उसमें दास्य, सख्य, वात्सल्य और माधुर्य‒सभी भाव विद्यमान रहते हैं ।वह दासीकी तरह पतिकी सेवा करती है, मित्रकी तरह पतिको उचित सलाह देती है और माताकी तरह भोजन, वस्त्र आदिसे पतिका पालन करती है तथा उसके सुख-आरामका खयाल रखती है† ।

       ‘परकीया माधुर्य-रति’ में अपनी पत्नीसे भिन्न स्त्री (परनारी) के सम्बन्धका और अपने पतिसे भिन्न पुरुष (परपुरुष या उपपति) के सम्बन्धका भाव रहता है । यद्यपि लौकिक दृष्टिसे यह सम्बन्ध व्यभिचार होनेसे महान्‌ पतन करनेवाला है, तथापि पारमार्थिक दृष्टिसे इस सम्बन्धका भाव बहुत उन्नति करनेवाला है । यद्यपि पत्नी अपने पतिकी सेवा करती है, तथापि वह अधिकारपूर्वक पतिसे यह आशा भी रखती है कि वह रोटी, कपड़ा, मकान आदि जीवन-निर्वाहकी वस्तुओंका प्रबन्ध करे और बाल-बच्चोंके पालन-पोषण, विद्याध्ययन, विवाह आदिकी व्यवस्था करे । परन्तु परकीया-भावमें अपने इष्टको सुख पहुँचानेके सिवाय कोई भी कामना या स्वार्थ नहीं रहता । स्वकीया-भावकी अपेक्षा परकीया-भावमें अपने प्रेमास्पदका चिन्तन भी अधिक होता है और उससे मिलनेकी इच्छा भी तीव्र होती है । स्वकीया-भावमें तो हरदम साथमें रहनेसे प्रेमास्पदके आचरणोंको लेकर उसमें दोषदृष्टि भी हो सकती है; परन्तु परकीया-भावमें प्रेमास्पदमें दोषदृष्टि होती ही नहीं ।यद्यपि लौकिक परकीया-भावमें अपने सुखकी इच्छा भी रहती है, तथापिपारमार्थिक परकीया-भावमें भक्तके भीतर अपने सुखकी किंचिन्मात्र भी इच्छा नहीं रहती । उसमें केवल एक ही लगन रहती है कि प्रेमास्पद (भगवान्‌) को अधिक-से-अधिक सुख कैसे पहुँचे ! उसका अहंभाव भगवान्‌में लीन हो जाता है ।

           हनुमान्‌जीका भाव स्वकीया अथवा परकीया माधुर्य-रतिसे भी श्रेष्ठ है ! उन्होंने वानरका शरीर इसलिये धारण किया है कि उनको अपने प्रेमास्पदसे अथवा दूसरे किसीसे किंचिन्मात्र भी कोई वस्तु लेनेकी जरूरत न पड़े । उनको न रोटीकी जरूरत है, न कपड़ेकी जरूरत है, न मकानकी जरूरत है, न बाल-बच्चोंके देखभालकी जरूरत है, न मान-बड़ाई आदिकी जरूरत है ! वानर तो जंगलमें फल-फुल-पत्ते खाकर और पेड़ोंपर रहकर ही जीवन-निर्वाह कर लेता है । लौकिक परकीया-भावमें प्रेमीका अपने माता-पिता, भाई-बहन आदिके साथ भी सम्बन्ध रहता है; परन्तु हनुमान्‌जीका एक भगवान्‌ श्रीरामके सिवाय और किसीसे सम्बन्ध है ही नहीं ।

     (शेष आगेके ब्लॉगमें)

‒ ‘कल्याण-पथ’ पुस्तकसे

 *भक्तके लिये कहा गया है‒‘साह ही को गोतु होत है गुलाम को ।’
                                 (कवितावली, उत्तर॰ १०७)

    † कार्ये दासी रतौ   रम्भा   भोजने जननीसमा ।
        विपत्सु मन्त्रिणी भर्तुः सा च भार्या पतिव्रता ॥

 (पद्मपुराण, सृष्टि॰ ४७/५६)

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