गुरुवार, 18 अगस्त 2016

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   🌹🔱💧संत अमृत वाणी💧🔱🌹

🌹सुखासक्तिसे छूटनेका उपाय :

( गत ब्लाग से आगे )

बहुत वर्षोंतक मेरेमें यह जाननेकी लालसा रही कि गडबड़ी कहाँ है ? बाधा किस जगह लग रही है ? न चाहते हुए भी मनमें मान-बड़ाईकी, आदर-सत्कारकी, पदार्थोंकी इच्छा हो जाती है, तो यह कहाँ टिकी हुई है ? यह छूटती क्यों नहीं ? वर्षोंके बाद इसकी जड़ मिली, वह है‒सुखकी लोलुपता । हमें यह बात वर्षोंके बाद मिली, आपको सीधी बता दी । आपको सुगमतासे मिल गयी, इसलिये आप इसका आदर नहीं करते । यदि कठिनतासे मिलती तो आप आदर करते । आप पहाड़ोंमें भटकते, बद्रीनारायण जाते, खूब तलाश करते और इस तरह भटकते-भटकते कोई सन्त मिल जाता तथा वह यह बात कहता तो आप इसका आदर करते । अब रुपये कमाते हो, कुटुम्बके साथ घरोंमें मौजसे बैठे हो और सत्संगकी बातें मिल जाती हैं तो आप उनका महत्त्व नहीं मानते । उलटे ऐसा मानते हो कि स्वामीजी तो यों ही कहते हैं, ये दुकानपर बैठें तो पता लगे ! इस तरह आप अपनी ही बातको प्रबल करते हो । सिद्ध क्या हुआ ? कि हमारी बात सच्ची है, इनकी (स्वामीजीकी) बात कच्ची है । आपने विजय तो कर ली, पर फायदा क्या हुआ ? आप जीत गये, हम हार गये, पर जीतमें आपका ही नुकसान ही हुआ ।

एक धनी आदमीने कहा कि स्वामीजी रुपयोंके तत्त्वको जानते नहीं तो मैंने कहा कि देखो, मैंने रुपये रखे भी हैं और उनका त्याग भी किया है, इसलिये दोनोंको जानता हूँ । परन्तु आपने रुपये रखे हैं, उनका त्याग नहीं किया है, इसलिये आप एक ही बातको जानते हो, दोनोंको नहीं जानते । कोई तत्त्व नहीं है रुपयोंमें । आप लोभसे दबे हुए हो, आपने रुपयोंका महत्त्व स्वीकार कर लिया है, फिर कहते हो कि हम जानते हैं । धूल जानते हो आप ! जानते हो ही नहीं ।

परमात्माको जाननेके लिये परमात्माके साथ अभिन्न होना पड़ता है और संसारको जाननेके लिये संसारसे अलग होना पड़ता है । परमात्मासे अलग रहकर परमात्माको नहीं जान सकते और संसारसे मिले रहकर संसारको नहीं जान सकते‒यह सिद्धान्त है । ऐसा सिद्धान्त क्यों है ? कि वास्तवमें आप परमात्माके साथ अभिन्न हो और संसारसे अलग हो । परन्तु आपने अपनेको परमात्मासे अलग और संसारसे अभिन्न मान लिया, अब कैसे जानोगे ? जो बीड़ी, सिगरेट आदि पीता है, वह बीड़ी आदिको जान नहीं सकता । जो इनको छोड़ देता है, उसको इनका ठीक-ठाक ज्ञान हो जाता है । एक बार मैंने कहा कि चाय छोड़ दो ।बहुतोंने चाय छोड़ दी । पासमें ही एक वकील बैठे थे, वे कुछ भी बोले नहीं । तीन-चार दिन बादमें वे मेरे पास आये और बोले कि चाय तो मैंने भी उसी दिन छोड़ दी थी, पर सभामें मेरी बोलनेकी हिम्मत नहीं हुई ।चाय छोड़नेके बाद यह बात मेरी समझमें आयी कि जिस प्यालेसे गोमांसभक्षी चाय पीता है, छूतकी महान्‌ बीमारीवाला चाय पीता है, उसी प्यालेसे हम चाय पीते हैं ! इससे सिद्ध हुआ कि संसारको छोड़े बिना उसके तत्वको नहीं जान सकते ।

सत्‌की प्रप्तिकी लालसा करो तो असत्‌ छूट जायगा और असत्‌का त्याग कर तो सत्‌की प्राप्ति हो जायगी । दोनोंमेंसे कोई एक करो तो दोनों हो जायँगे । असत्‌का संग करते हुए, आसक्ति रखते हुए असत्‌को नहीं जान सकते और सत्‌से दूर रहकर बड़ी-बड़ी पण्डिताईकी बातें बघार लो, षट्‌शास्त्री पण्डित बन जाओ, तो भी सत्‌को नहीं जान सकते ।

संसारकी आसक्ति दूर करनेका सुगम उपाय है‒दूसरोंको सुख देना । माता, पिता, स्त्री, पुत्र, भाई, भौजाई आदि सबको सुख दो, पर उनसे सुख मत लो तो सुगमतासे आसक्ति छूट जायगी ।

नारायण ! नारायण !! नारायण !!!

‒ ‘स्वाधीन कैसे बनें ?’ पुस्तकसे

( शेष आगे के ब्लाग में )

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