मंगलवार, 9 अगस्त 2016

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  🌹🌟 राधे नाम संग हरि बोल 🌟🌹
 ※❖ॐ∥▩∥श्री∥ஜ ۩۞۩ ஜ∥श्री∥▩∥ॐ❖※

   🌹🔱💧संत अमृत वाणी💧🔱🌹

🌹परमात्मप्राप्तिमें मुख्य बाधा‒सुखासक्ति :

(गत ब्लॉगसे आगेका)

     इसमें बाधा यह है कि हम जिन पदार्थोंको नाशवान् मानते हैं, उनको अपना मान लेते हैं । यह गलती है । इस गलतीको मिटानेमें जोर पड़ता है । परमात्मतत्त्वकी प्राप्ति तो सुगम है, पर संसारका त्याग करनेमें जोर पड़ता है । जिनको हम नाशवान् जानते हैं, उनका ही संग्रह करते हैं । उनसे ही सुख लेते हैं‒यह जो हमारी चाल है न, यह चाल खतरनाक है । यह चाल बदलनी चाहिये । चालमें भी केवल भीतरका भाव बदलना है कि औरोंको सुख कैसे हो ? यह भले ही घरसे शुरू कर दो कि माता, पिता, स्त्री, पुत्र, परिवारको सुख कैसे हो ? पर साथ-साथ उनसे सुख लेनेकी आशा छोड़ दो । जिससे सुख मिलनेकी आशा नहीं है, उसको सुख नहीं पहुँचाते और जिसको सुख पहुँचाते हैं उससे सुख लेनेकी आशा रहती है‒यह है खास बन्धन । इसलिये सुखकी आशा न रखकर दूसरोंको सुख देना है, दूसरोंको आराम देना है, दूसरोंकी बात रखनी है । अपनी बात रखोगे तो बड़ी भारी आफत हो जायगी । मेरी बात रहे‒इसीमें बन्धन है ।

     हम जो नाशवान् पदार्थोंसे राजी होते हैं; जानते हैं कि ये रहेंगे नहीं, टिकेंगे नहीं, फिर भी उसमें रस लेते हैं, यहींसे बन्धन होता है।

     श्रोता‒महाराजजी ! हमारी तो आदत ही ऐसी पड़ गयी सुख लेनेकी !

     स्वामीजी‒भैया ! आदत छोड़नेके लिये ही तो हम यहाँ इकठ्ठे हुए हैं । यहाँ कौन-से पैसे मिलते हैं ! आदत सुधारनेके समान कोई उन्नति है ही नहीं । अपने स्वभावको शुद्ध बना लेनेके समान आपका कोई पुरुषार्थ नहीं है । इसके समान कोई लाभ नहीं है । आपका पुरुषार्थ, उद्योग, प्रयत्न इसीमें होना चाहिये कि स्वभाव सुधरे ।स्वभाव ही सुधरता है और क्या सुधरता है बताओ ? जो सन्त-महात्मा होते हैं, उनका भी स्वभाव ही सुधरता है । शरीरमें फरक नहीं पड़ता, स्वभावमें फरक पड़ता है । इसलिये अपनी आदत है, अपना स्वभाव है, अपनी प्रकृति है, इसको हमें शुद्ध करना है । इसमें जो-जो अशुद्धि आये, उसको निकालना है । यह एक ही खास काम करना है ।

यह याद कर लो कि अपना स्वभाव सुधारनेमें हम स्वतन्त्र हैं, पराधीन नहीं हैं । इसको दूसरा कोई कर देगा‒यह बात नहीं है । यह तो आप ही करोगे, तब होगा । जब कभी करोगे तो आपको ही करना पड़ेगा । आपने प्रश्न किया था कि यह गुरु-कृपासे होगा या सन्त-कृपासे होगा, तो इस विषयमें आपको एक मार्मिक बात बताता हूँ । अगर गुरु-कृपासे होगा तो गुरुको आप मानोगे, तब होगा । अगर सन्त-कृपासे होगा तो सन्तको आप मानोगे, तब होगा । अन्तमें बात आपके ऊपर ही आयेगी । आप मानोगे तब होगा । ईश्वरकी कृपा तो सदासे है, पर आप मानोगे, तब वह काम करेगी । इसलिये गीतामें कहा गया है कि अपने-आपसे अपना उद्धार करे‒‘उद्धरेदात्मनात्मानम्’ (६/५) । आपके माने बिना गुरु क्या करेगा ? हम गुरु मानेंगे, सन्त-महात्मा मानेंगे, तभी वे कृपा करेंगे ।

 (शेष आगेके ब्लॉगमें)

‒ ‘स्वाधीन कैसे बनें ?’ पुस्तकसे

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