बुधवार, 7 सितंबर 2016

🚩🔱 ❄ «ॐ»«ॐ»«ॐ» ❄ 🔱🚩

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  🌹🌟 राधे नाम संग हरि बोल 🌟🌹
 ※❖ॐ∥▩∥श्री∥ஜ ۩۞۩ ஜ∥श्री∥▩∥ॐ❖※

   🌹🔱💧संत अमृत वाणी💧🔱🌹

🌟 कर्म, सेवा और पूजा :

(गत ब्लॉगसे आगेका)

प्रश्न‒ क्या प्राणी सेवा ही प्रभु-सेवा है, सेवा और पूजामें अन्तर क्या है ?

उत्तर‒हाँ जी । काम कर देना सेवा है । पूजन होता है चन्दनसे, अगरबत्तीसे, दीपक दिखानेसे, आरती करनेसे, फूल चढ़ानेसे । यह पूजा होती है । इसको भी सेवा कह देते हैं, पर पूजा है यह । तो पूजा करनेमें जिसका हम पूजन करते हैं, उसको ऐसा कोई लाभ नहीं होता । पुष्प चढ़ा दिया तो क्या हुआ, चन्दन चढ़ा दिया तो क्या हुआ ? धूप-दीप कर दिया तो क्या मिल गया उसको ? उसको सुख ज्यादा होता है सेवा करनेसे । पग-चम्पी कर दी, स्नान करा दिया, कपड़े धो दिये । ऐसे यदि वह उनकी सेवा करे तो सुख ज्यादा होता है, नि:सहाय पर सेवा बुद्धिसे भी विशेष अगर पूजा बुद्धिसे करता है तो स्वयं गद्‌गद हो जाता है । क्योकि भगवान तो जीवमात्र में है। मस्त हो जाता है वह कहीं सेवाका काम मिले तो ! सेवामें पूजा-बुद्धि हो जाती है तो निहाल हो जाता है । चरण-चम्पी करता है एक तो और एक चरण छूता है । चरण छूनेमें, जिसके चरण छूता है, उसको कुछ नहीं मिलता । स्वयं अभिमान भले ही कर ले । और चरण-चम्पी करता है तो थकावट दूर होती है ।

भाव चरण छूनेका है और पूजा-बुद्धि है तो चरण छूनेमात्रसे जैसे बिजलीका करंट आता है, ऐसे ही उसके आनन्दका एक करंट आता है । ऐसे चरण-चम्पी करना सेवा है और चरण छूना पूजा है । यह पूजाका और सेवाका भेद है । जितना अपने अभिमानका त्याग होता है, उसको सुख कैसे पहुँचे ? उसको आराम कैसे पहुँचे ? यह सेवाभाव होता है । वह पूजनीय, आदरणीय है; वह हमारा भोजन भी स्वीकार कर ले, चन्दन भी स्वीकार कर ले, हमारा नमस्कार भी स्वीकार कर ले तो मैं निहाल हो जाऊँ ! यह पूजाका भाव है ।

जहाँ पूज्यभाव होता है, वहाँ भारी कैसे लगे ? वो तो त्याग करता रहता है, हरदम ही विचार करता रहता है, किस तरहसे मेरेको सेवा मिल जाय । सेवा मिल जाय तो अपना अहोभाग्य समझता है कि बस निहाल हो गया आज तो ! और ऐसा मालूम पड़ता है कि इनकी कृपासे ही यह हो रहा है । मेरेमें यह भाव है न, यह इनकी कृपा है । काम भी इनकी कृपासे होता है । वह तो जीवन्मुक्त हो गया महाराज ! इतना मस्त हो गया । उसकी तो सेवा-पूजा देखकर दूसरे आदमियोंका कल्याण हो जाय । अगर उसका भाव यह है तो ऐसी बात है और भारी लगता है तो आलस्य है, प्रमाद है, अभिमान आदि दोष है ।

यह बात है भैया ! जितना ही दुःख होता है, आनन्द नहीं आता है, उसमें अपने दोष है भीतर । अपने दोष न रहनेसे बहुत ही मौज होती है । जितना निर्दोष जीवन है, उतना उसके आनन्द रहता है । इस बातको समझते नहीं, इस वास्ते लोग चोरी करते हैं, चालाकी कर लेते हैं, ठग लेते हैं, उससे खुदको दुःख होगा, शान्ति नहीं रह सकती, उससे प्रसन्नता नहीं रह सकती ।परन्तु पदार्थोंमें ज्यादा आसक्ति है, पदार्थोंको मूल्यवान समझता है; इस वास्ते झूठ-कपट कर, धोखा दे राजी होता है ।यह महान्‌ पतनका रास्ता है । बहुत नुकसान कर लिया अपना ! और जितना निर्दोष जीवन होता है, अपना शुद्ध जीवन होता है; आलस्य, प्रमाद, झूठ, धोखेबाजी, लोभ, क्रोध, कामना कुछ नहीं होती, उतना अन्तःकरण निर्मल होता है, हल्का होता है, मस्ती रहती है, आनन्द हरदम रहता है‒

कंचन खान खुली घट माहीं ।
रामदास के     टोटो  नाहीं ॥

भीतरसे आनन्द उमड़ता है । जैसे शीत-ज्वर चढ़े तो भीतरसे ही ठण्ड लगती है । ऐसे भीतरसे आनन्द उठता है उसके, बाह्य-पदार्थोंसे सुख लेनेकी इच्छा नहीं होती ।

    (शेष आगेके ब्लॉगमें)

‒ ‘भगवत्प्राप्ति सहज है’ पुस्तकसे

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