शुक्रवार, 16 दिसंबर 2016

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🌹सत्संगसे लाभ कैसे लें ?

( गत ब्लॉग से आगे )

सत्संगके समय ‘हम बदलनेवाले नहीं है’‒इसमें अपनी स्थिति करनी चाहिये । सत्संगके समय सत्संगका रस नहीं लेना है । सत्संगका सुख नहीं लेना है । सत्संगका तत्त्व समझना है, उसको धारण करना है, उसमें तल्लीन हो जाना है । उस तत्त्वके साथ आपका सम्बन्ध होना चाहिये । स्वयंका सम्बन्ध होनेसे जब अनुकूल साधन नहीं होगा, अनुकूल संग नहीं मिलेगा, अनुकूल पुस्तक नहीं मिलेगी, तो उस समय आपको अच्छा नहीं लगेगा, बुरा लगेगा । फिर आप भजन-चिन्तनमें आप-से-आप लग जाओगे । हमारा सम्बन्ध तो भगवान्‌के साथ है । तात्कालिक सुखकी अपेक्षा भगवान्‌के सम्बन्धको भीतरमें ज्यादा महत्त्व देना चाहिये । जैसे, मनुष्योंका रुपयोंमें एक आकर्षण है । रुपये कमानेमें चाहे सुख होवे, चाहे दुःख होवे, पर रुपयोंका आकर्षण वैसे ही रहता है । घाटा लगे तो भी आकर्षण रहता है और मुनाफा हो तो भी आकर्षण रहता है । इस प्रकार जिस जगह रुपयोंका महत्त्व बैठा हुआ है, उस जगह भगवान्‌का महत्त्व बैठाना चाहिये । भीतरमें रुपयोंका महत्त्व होनेसे जैसे रुपयोंकी बातें अच्छी लगती हैं, ऐसे ही भगवान्‌का महत्त्व होनेसे भगवत्सम्बन्धी बातें अच्छी लगेंगी ।

सत्संगी आदमीको पहले कम-से-कम यह सोच लेना चाहिये कि हमारा कौन है और हमारा कौन नहीं है । ध्यान देना, बड़ी मार्मिक बात है । जो हमारे साथ निरन्तर रहता है और हम जिसके साथ निरन्तर रहते हैं, वह हमारा है । हम जिसके साथ निरन्तर नहीं रह सकते और जो हमारे साथ निरन्तर नहीं रहता, वह हमारा नहीं है । अब जो हमारा है, उसको हम पहचानते क्यों नहीं ? जो हमारा नहीं है, सदा उसकी तरफ आकर्षण क्यों होता है ? कारण यह है कि जो हमारा है, सदा हमारे साथ रहता है, उसको अपना मानना छोड़ दिया और जो हमारा नहीं है, कभी हमें मिलता है कभी नहीं मिलता, उसको अपना मानना शुरू कर दिया । यहाँ गलती हुई है । धन, सम्पत्ति, वैभव, पुत्र, परिवार, मान, बड़ाई आदि कभी होते हैं और कभी नहीं होते, घटते-बढ़ते हैं, सदा साथमें नहीं रहते, पर उनको अपना मान लिया । जो अपना है, उससे विमुख हो गये, उसकी उपेक्षा कर दी ! मीराबाईने कहा कि ‘मेरे तो गिरधर गोपाल दूसरों न कोई ।’ हमने ‘दूसरों न कोई’‒इस बातको नहीं पकड़ा, इसीलिये‘मेरे तो गिरधर गोपाल’‒इसका अनुभव नहीं हुआ । वे भगवान्‌ सबके हैं । वे प्राणिमात्रके हृदयमें रहते हैं‒
‘ईश्वरः सर्वभूतानां हृद्देशेऽर्जुन तिष्ठति ’ (गीता १८/६१) ।
 उनकी तरफ हमें देखना चाहिये । मैं बहुत बार कहा करता हूँ कि भगवान्‌ सब देशमें, सब कालमें, सब वस्तुओंमें, सब व्यक्तियोंमें, सम्पूर्ण वृत्तियोंमें, सम्पूर्ण घटनाओंमें, सम्पूर्ण परिस्थितियोंमें, सम्पूर्ण अवस्थाओंमें रहते हैं । ऐसा कहनेका तात्पर्य क्या है ? वे सब जगह हैं तो यहाँ भी हैं, सब समयमें हैं तो अभी भी हैं, सबमें हैं तो हमारेमें भी हैं, सबके हैं तो हमारे भी हैं । इसलिये किसीको भी उनकी प्राप्तिसे निराश होनेकी जरूरत नहीं है । जो किसी देशमें हो, किसी देशमें न हो; किसी कालमें हो, किसी कालमें न हो; उसके साथ हमें सम्बन्ध नहीं जोड़ना है । उसका काम कर देना है, उसकी सेवा कर देनी है । उसके साथ सम्बन्ध जोड़ोगे तो दुःख पाओगे; क्योंकि वह सदा तो रहेगा नहीं ।

सत्संगके द्वारा जो सुख मिलता है, उसको मत लो । जिससे वह सुख मिलता है, उस भगवान्‌को पकड़ो । वह सुख भगवान्‌के यहाँसे आता है । वे भगवान्‌ हमारे हैं । ये शरीर-संसार हमारे नहीं हैं ।अगर शूरवीरतासे आप इस बातको स्वीकार कर लो, तो बहुत ही लाभकी बात है ।

    (शेष आगेके ब्लॉगमें)

‒ ‘भगवत्प्राप्तिकी सुगमता’ पुस्तकसे

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गुरुवार, 15 दिसंबर 2016

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🌹सत्संगसे लाभ कैसे लें ?

श्रोता‒सत्संगमें जैसी स्थिति रहती है, वैसी हर समय नहीं रहती, और हर समय सत्संग मिलता नहीं ?

स्वामीजी‒सत्संग न मिले तो पारमार्थिक पुस्तकें पढ़ो ।

श्रोता‒पुस्तकें पढ़नेको भी सदा समय नहीं मिलता ।

स्वामीजी‒-देखो, सब समय तो कोई बात रहती नहीं । संसारका सम्बन्ध भी सदा नहीं रहता । सत्संगमें जैसी स्थिति, जैसी वृत्तियाँ रहती हैं, वैसी हर समय नहीं रहतीं‒ऐसी बात नहीं है । स्थूल दृष्टिसे तो वैसा दीखता है, पर सूक्ष्म दृष्टिसे देखा जाय तो भीतर सत्संगके जो संस्कार रहते हैं, वे स्थायी रहते हैं । उनके स्थायी रहनेसे ही आपकी सत्संगमें रुचि रहती है । वे संस्कार जितने अधिक स्थायी होंगे, उतनी ही रुचि अधिक होगी और जितनी रुचि अधिक होंगी, उतना ही साधन बढ़ेगा ।अतः तात्कालिक चीज (सत्संग) मिले तो उससे अपनी रुचिको बढ़ाना चाहिये । भीतर सत्संगका महत्त्व अंकित रहना चाहिये कि यह बहुत लाभदायक है, इसकी बड़ी भारी आवश्यकता है । ऐसा होनेसे कहीं भी सत्संग हो तो आपकी रुचि होगी कि हम सत्संग करें ।

दूसरी बात, अभी जो सत्संग सुननेसे रुचि होती है, वह बुद्धिमें, मनमें, अन्तःकरण होती है । वह रुचि वास्तवमें आपके खुदकी होनी चाहिये । खुदकी रुचि होगी तो वह मिटेगी नहीं; क्योंकि खुद मिटता नहीं । अन्तःकरण तो प्रकृतिका कार्य होनेसे बदलता रहता है । तत्त्वज्ञान होनेके बाद भी सिद्ध पुरुषोंमें सात्त्विक, राजस् , तामस वृत्तियाँ आती हैं (गीता १४/२२) । सिद्ध पुरुषोंमें और हमलोगोंमें फरक क्या रहता है ? उन वृत्तियोंके आनेपर सिद्ध पुरुष तो स्वाभाविक तटस्थ रहते हैं, पर हम उन वृत्तियाँके साथ मिल जाते हैं । सत्संगके समय जैसी वृत्तियाँ रहती हैं, और समयमें वैसी वृत्तियाँ नहीं रहतीं‒इसका कारण है अन्तःकरणकी अनित्यता, अन्तःकरणका एक रूप न रहना । बदलनेवाली चीजको जाननेवाले आप नहीं बदलते हो । रुचि और अरुचि‒दोनोंका जिसको अनुभव होता है, उसके साथ रुचि-अरुचि दोनोंका सम्बन्ध नहीं है ।

सात्त्विक, राजस् , तामस वृत्तियाँके साथ मिल जाना अस्वाभाविक है, और इनके साथ न मिलना स्वाभाविक है ।स्वाभाविकताको जबतक नहीं पकड़ते, तबतक यह दशा रहती है । स्वयं (स्वरूप) अच्छे-मन्दे दोनोंको जाननेवाला है, दोनोंका प्रकाशक है, दोनोंका आश्रय है । उसके आश्रित ही अच्छी-मन्दी दोनों क्रियाएँ होती हैं । हमारी स्थिति उस स्वरूपमें होनी चाहिये‒
‘समदुःखसुखः स्वस्थः’ (गीता १४/२४) ।
वह सम्पूर्ण वृत्तियाँका, संयोग-वियोगका आधार है, उनका निर्लिप्त प्रकाशक है । जैसे, दि़पक जल रहा है । अब आपलोग आयें तो दीपक वैसा ही है, आपलोग थोड़े आयें तो दीपक वैसा ही है । और कोई भी नहीं आये तो दीपक वैसा ही है । ऐसे ही आपका स्वरूप वृत्तियाँ आदिको प्रकाशित करनेवाला है, उनके साथ चिपकनेवाला नहीं है । अगर स्वरूप चिपकनेवाला होता तो एकके साथ ही रहता, दूसरेके साथ नहीं जाता । अगर आप सत्त्वगुणमें चिपक जाते तो रजोगुण-तमोगुणमें कौन जाता ? रजोगुणमें चिपक जाते तो सत्त्वगुण-तमोगुणमें कौन जाता ?तमोगुणमें चिपक जाते तो सत्त्वगुण-रजोगुणमें कौन जाता ? आपका चिपकानेका स्वभाव नहीं है । जाग्रत्‌, स्वप्न, और सुषुप्ति‒ये तीनों अवस्थाएँ आपके सामने आती हैं, पर आप किसी भी अवस्थाके साथ हरदम नहीं रहते । अवस्थाएँ बदलती हैं, आप नहीं बदलते । आप आने-जानेवाली वृत्तियाँके साथ, अवस्थाओंके साथ मिल जाते हो, इसीसे गलती होती है । इसमें आप तटस्थ रहो‒‘देखो निरपख होय तमाशा ।’ कभी नफा हुआ, कभी नुकसान हुआ, किसीका जन्मना हुआ, किसीका मरना हुआ, किसीका संयोग हुआ, किसीका वियोग हुआ‒यह तो होता ही रहता है, पर हम इसके साथ नहीं हैं और यह हमारे साथ नहीं है । ये बदलनेवाले हैं, हम बदलनेवाले नहीं हैं ।

   (शेष आगेके ब्लॉगमें)

‒ ‘भगवत्प्राप्तिकी सुगमता’ पुस्तकसे

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बुधवार, 14 दिसंबर 2016

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🌹सत्संगकी महिमा :

(गत ब्लॉगसे आगेका)

प्रश्न‒सत्संगसे मुफ्तमें लाभ मिलता है सो कैसे ?

उत्तर‒सत्संगसे जो लाभ होता है वह साधनसे नहीं होता । साधन करके जो परमात्माको प्राप्त करता है, वह कमाकर धनी बनता है और सत्संगसे वह गोद चला जाता है, कमाया हुआ मिल जाता है । सन्तोंका कमाया हुआ धन मिलता है । गोद जानेवालेको क्या जोर आवे ? आज कंगाल और कल लखपति । वह तो जा बैठा गोदमें । कमाये हुए धनका मालिक हो जाता है ।सत्संगके द्वारा ऐसी चीजें मिलती हैं, जो वर्षोंतक साधन करनेसे भी नहीं मिलतीं ।अतः सत्संग मिल जाय तो अवश्य करना चाहिये । मुफ्तमें कल्याण होता है, मुफ्तमें ।

प्रश्न‒नाम-जपसे अधिक सत्संगकी महिमा कही‒इसका क्या कारण है ?

उत्तर‒सत्संग करनेवाला नाम जपे बिना रह नहीं सकता । नाम-जप स्वाभाविक ही होगा ।

प्रश्न‒सत्संग न मिले तो क्या करें ?

उत्तर‒भगवान्‌से प्रार्थना करें हे नाथ ! हे नाथ ! करके पुकारो । भगवान्‌ सर्वसमर्थ हैं । इसके अलावा सत्‌-शास्त्रोंका अध्ययन करें ।

प्रश्न‒मनुष्यका सुधार करनेमें सबसे बढ़िया उपाय क्या है ? आप अपने अनुभवके आधारपर बतावें ?

उत्तर‒मेरेको जितना लाभ सत्संगसे हुआ है, उतना किसी साधनसे नहीं हुआ । अच्छे संगमें रहनेसे बड़ा भारी लाभ होता है, जिसकी कोई सीमा नहीं । सत्संग मत छ़ोडो, जिस सत्संगसे अपने हृदयकि गाँठ खुलती है, आत्मसाक्षात्कार होता है, प्रकाश मिलता है, ऐसा सत्संग छोड़ो मत । सब कुछ मिल जाता है पर ‘सन्त समागम दुर्लभ भाई ।’

प्रश्न‒सत्संगसे प्रकाश कैसे मिलता है ?

उत्तर‒सत्संगतिका अर्थ होता है प्रकाश । जैसे हम कहीं जाते हैं और रात्रिका समय हो तो मोटरका प्रकाश सामने ही रहता है । ऐसा नहीं होता कि प्रकाश पीछे रह जाय और मोटर आगे निकल जाय । प्रकाश आगे ही रहेगा और वह प्रकाश चलनेके लिए रास्ता बताता है । ऐसे ही सत्संगतिसे मनुष्यको प्रकाश मिलता है कि हम कैसे चलें ? सत्संगकी बातें केवल याद कर लें, पुस्तकोंमें पढ़ लें, लोगोंसे कह दें और हम उसके अनुसार चलें नहीं तो प्रकाशको तेज करनेमात्रसे रास्ता नहीं कटता । लाइट कम भी है, परन्तु जहाँतक रास्ता दीखता है, वहाँतक हम चलते जायें तो उससे आगे दीखने ही लगेगा‒यह नियम है । परन्तु एक जगह खड़े-खड़े कितनी ही तेज लाइट कर लें, गन्तव्य स्थान नहीं दीखेगा । ऐसे ही सत्संगतिके द्वारा हमें जो प्रकाश मिल जाय उसके अनुसार चलें । तभी वह प्रकाश सार्थक होता है । जीवन न भी बनावें तो भी यह प्रकाश निरर्थक नहीं जाता; क्योंकि जो सत्य चीज है, वह प्रकट हो ही जाती है ।सत्यकी विजय होती है, झूठकी विजय नहीं होती । परन्तु यदि सत्यका आदर करें तो बहुत जल्दी और विशेष लाभ ले सकते हैं ।तो सत्संगकी बातें अपने आचरणमें लाना चाहिये ।

नारायण ! नारायण !! नारायण !!!

‒ ‘जीवनोपयोगी प्रवचन’ पुस्तकसे

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मंगलवार, 13 दिसंबर 2016

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🌹सत्संगकी महिमा :

(गत ब्लॉगसे आगेका)

तुलसी पूरब पाप ते,  हरि चर्चा न सुहाय ।

जैसे ज्वर के जोर ते, भूख बिदा ह्वै जाय ॥

मनुष्यको बुखार आ जाता है तो भूख नहीं लगती, अन्न अच्छा नहीं लगता । अन्न अच्छा नहीं लगता तो इसका अर्थ है उसको रोग है । जब पित्तका जोर होता है तो मिश्री भी कड़वी लगती है । मिश्री कड़वी नहीं है, उसकी जीभ कड़वी है । इसी तरह जिसे भगवान्‌की चर्चा सुहाती नहीं तो इसका कारण है कि उसे कोई बड़ा रोग हो गया । कथामें रुचि नहीं होती तो स्पष्ट है कि अन्तकरण बहुत मैला है, मामूली मैला नहीं, ज्यादा मात्रामें मैला है ।

प्रश्न‒ज्यादा मैला होनेपर क्या उसको सत्संग दूर नहीं कर सकता ?

उत्तर‒सत्संग सब मैलोंको दूर कर सकता है; पर मनुष्य पासमें ही नहीं आता । बुखारका जोर होनेसे अन्न अच्छा नहीं लगता और मिश्री कड़वी लगती है । कैसे करें ? मिश्री कड़वी लगे तो भी खाते रहो । मिश्रीमें खुदमें ताकत है कि वह पित्तको शान्त कर देगी और मीठी लगने लगेगी ।ऐसे ही भजनेमं रुचि नहीं हो तो भी भजन करते रहो । भजन करते-करते ज्यों-ज्यों पाप नष्ट होते हैं, त्यों-त्यों उसमें मिठास आने लगता है । सत्संगमें ऐसे लोग आये हैं जो रुचि नहीं रखते थे । पर किसीके कहनेसे आये तो फिर विशेषतासे आने लग गये ।

प्रश्न‒सत्संग प्रतिदिन क्यों किया जाय ?

उत्तर‒सत्संगकी महिमा क्या कहें ?सत्संग तो रोजाना करनेका है, नित्यप्रति करनेका है । यह त्यागनेका है ही नहीं ।सत्संगसे सांसारिक बाधाएँ मिट जाती हैं । कोई बीमार होता है, कोई लड़ाई करता है, किसीको कोई बाधा लग जाती है‒ये सब तरह-तरहके साँप हैं जो काटते हैं । उनसे जहर चढ़ जाता है तो वह घबरा जाता है । वह अगर सत्संगमें जाकर सत्संगरूपी बूटी सूँघ ले तो स्वस्थ हो जाय, प्रसन्न हो जाय । चित्तकी चिन्ता दूर हो जाय । फिर जाकर संसारका काम करे । काम करते-करते उसमें उलझ जाते हैं तो जहर चढ़ जाता है । वह जहर सत्संगमें जानेसे ठीक हो जाता है । इस तरह करते हुए हमारे जो शत्रु हैं‒काम, क्रोध, राग, द्वेष आदि वे सब-के-सब मर जाते हैं । जैसे अन्न, जल आवश्यक है, साँस लेना आवश्यक है, उसी तरह सत्संग भी प्रतिदिन करना जरूरी है । वह तो रोजाना खुराक है । सत्संगसे बहुत शान्ति मिलती है । बहुत-सी मानसिक बीमारियाँ दूर होती हैं । सत्संग सूर्यकी तरह होता है जो अन्तःकरणके अन्धकारको दूर कर देता है । उससे पाप दूर हो जाते हैं, बिना पूछे शंकाएँ दूर हो जाती हैं । तरह-तरहकी जो हृदयमें उलझनें हैं, वे सुलझ जाती हैं । सत्संग जहाँ हो जाय, मिल जाय तो समझना चाहिये कि भगवान्‌ने विशेष कृपा की । भगवान्‌ शंकरने दो ही बात माँगी‒‘पद सरोज अनपायनी भगति’ और ‘सदा सत्संग ।’

    (शेष आगेके ब्लॉगमें)

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सोमवार, 3 अक्तूबर 2016

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🌟 सत्संगकी महिमा :

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एक सज्जन मिले । वे कहते थे कि तीर्थोंका माहात्मय बहुत है । गंगाजी अच्छी हैं, यमुनाजी अच्छी हैं, प्रयागराज बड़ा अच्छा है‒ऐसा लोग कहते तो हैं, परन्तु किराया तो देते नहीं । किराया दें तो वहाँ जायें । सत्संगमें बढ़िया-बढ़िया बात सुनते हैं और परमात्माके धाम जानेके किराया भी मिलता है । सत्संगमें ज्ञान मिलता है, प्रेम मिलता है, भगवान्‌की भक्ति मिलती है । भगवान्‌ शबरीसे कहते हैं‒‘प्रथम भगति संतन्ह कर संगा ।’ दण्डक वन था, उसमें वृक्ष आदि सब सूखे हुए थे । उसमें शबरी रहती थी । यहाँ शबरीको सत्संग मिल गया, यह भगवान्‌की कृपा है । मतंग ऋषि थे, बड़े वृद्ध सन्त, कृपाकी मूर्ति । उन्होंने शबरीको आश्वासन दिया था कि बेटा, तू चिन्ता मत कर, यहाँ रह जा । ऋषि-मुनियोंने इसका बड़ा विरोध किया, पर सन्तकी कृपा बड़ी विचित्र होती है ।

         धनी आदमी राजी हो जाय तो धन दे दे, अपनी कुछ चीज दे दे, परन्तु सन्त कृपा करें तो भगवान्‌को दे दें । उनके पास भगवान्‌रूपी धन होता है । वे सामान्य धनके धनी नहीं होते हैं, असली धनके धनी होते है, मालामाल होते हैं और वह माल ऐसा विलक्षण है कि ‘दानेन वर्धते नित्यम्’, ज्यों-ज्यों देते हैं, त्यों-त्यों बढ़ता है । ऐसा अपूर्व धन है । अतः खुला खर्च करते हैं । खुला भंडार पड़ा हुआ है, अपार, असीम, अनन्त है; जिसक कोई अन्त ही नहीं है । भगवान्‌का ऐसा अनन्त अपार खजाना है । फिर भी मनुष्य मुफ्तमें दुःख पा रहे हैं । इसलिये सज्जनो, बड़े आश्चर्यकी बात है !

पानीमें   मीन   पियासी, मोहि    देखत  आवै   हाँसी ।
जल बिच मीन, मीन बिच जल है, निश दिन रहत पियासी ॥

भगवान्‌में सब संसार है और सबके भीतर भगवान्‌ हैं । उन भगवान्‌से विमुख होते हैं तो सन्त-महात्मा जीवको परमात्माके सम्मुख कर देते हैं । ‘सनमुख होइ जीव मोहि जबहीं ।’ अरे भाई ! परमात्मा तो सम्मुख है ही, हमारा प्यारा माता-पिता, भाई-बन्धु, कुटुम्बी, सम्बन्धी‒वह सब तरहसे अपना है । वे प्रभु हमारे हैं । सन्त ऐसी बात बता दें और हम वह बात सुनकर पकड़ लें तो बड़ा भारी लाभ होता है । स्वयं हम पकड़ें और किसी सन्त-महात्माके कहनेसे हृदयसे पकड़ें तो उसमें बड़ा अन्तर होता है ।

सन्त-महात्मा जो कहते हैं, उनके वचनोंका आदर करो । जमानत भी ली जाती है तो इज्जतदार आदमीकी । हर एककी जमानत नहीं होती है । ऐसे हीभगवान्‌के दरबारमें सन्त-महात्माओंकी और भक्तोंकी बड़ी इज्जत है, तभी तो गोस्वामीजीने कह दिया‒

सत्य बचन आधीनता   पर तिय मातु समान ।
इतने पै हरि ना मिले तो तुलसीदास जमान ॥

तुलसीदासजीकी जमानत है । सन्त लोग जमानत दे देते हैं और वह भगवान्‌के यहाँ चलती है । सन्तोंके यहाँ परमात्माका बड़ा खजाना रहता है । मुफ्तमें धन मिलता है, मुफ्तमें कमाया हुआ, तैयार किया हुआ, सत्संगसे यह सब मिल सकता है ।

प्रश्न‒कुछ लोगोंको सत्संग करना सुहाता ही नहीं । इसका क्या कारण है ?

उत्तर‒पापीका यह स्वाभाव है कि उसे सत्संग सुहाता नहीं ।

पापवंत कर      सहज सुभाऊ ।
भजनु मोर तेहि भाव न काऊ ॥

 (मानस ५/४३/२)

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🌟 सत्संगकी महिमा :

(गत ब्लॉगसे आगेका)

         सत्संगमें व्यापार एक ही चलता है, भगवान्‌की बात । उसीको कहना, सुनना, समझना, विचार करना, चिन्तन करना ।भगवान्‌ जिसपर कृपा करते हैं, उसको सत्संग देते हैं । सत्संग दिया तो समझो भगवान्‌के खोजनेकी बढ़िया चीज मिल गयी । जो भगवान्‌के प्यारे होते हैं, वे भगवान्‌के भीतर रहते हैं । यह हृदयका धन है । माता-पिता जिस बालकपर ज्यादा स्नेह रखते हैं, उसको अपनी पूँजी बता देते हैं कि बेटा, देखो यह धन है । ऐसे ही भगवान्‌ जब बहुत कृपा करते हैं तो अपने खजानेकी चीज (पूँजी) सन्त-महात्माओंकोदेते हैं‒लो बेटा, यह धन हमारे पास है ।

         सत्संग मिल जाय तो समझना चाहिये कि हमारा उद्धार करनेकी भगवान्‌के मनमें विशेषतासे आ गयी; नहीं तो सत्संग क्यों दिया ? हम तो ऐसे ही जन्मते-मरते रहते, यह अडंगा क्यों लगाया ? यह तो कल्याण करनेके लिये लगाया है । जिसे सत्संग मिल गया तो उसे यह समझना चाहिये कि भगवान्‌ने उसे निमन्त्रण दे दिया कि आ जाओ । ठाकुरजी बुलाते हैं, अपने तो प्रेमसे सत्संग करो, भजन-स्मरण करो, जप करो । सत्संग करनेमें सब स्वतन्त्र हैं । सत्‌ परमात्मा सब जगह मौजूद है । वह परमात्मा मेरा है और मैं उसका हूँ‒ऐसा मानकर सत्संग करे तो वह निहाल हो जाय ।

        सत्संग कल्पद्रुम है । सत्संग अनन्त जन्मोंके पापोंको नष्ट-भ्रष्ट कर देता है । जहाँ सत्‌की तरफ गया कि असत्‌ नष्ट हुआ । असत्‌ तो बेचारा नष्ट ही होता है । जीवित रहता ही नहीं । इसने पकड़ लिया असत्‌को । अगर यह सत्‌की तरफ जायगा तो असत्‌ तो खत्म होगा ही । सत्संग अज्ञानरूपी अन्धकारको दूर कर देता है । महान्‌ परमानन्द-पदवीको दे देता है । यह परमानन्द-पदवी दान करता है । कितनी विलक्षण बात है ! सत्संग क्या नहीं करता ? सत्संग सब कुछ करता है । ‘प्रसूते सद्‌बुद्धिम् ।’ सत्संग श्रेष्ठ बुद्धि पैदा करता है । बुद्धि शुद्ध हो जाती है ।
गोस्वामीजी महाराज लिखते हैं‒

मज्जन फल    पखिय ततकाला ।
काक होहिं पिक बकउ मराला ॥

(मानस १/२/१)

       साधु-समाजरूपी प्रयागमें डुबकी लगानेसे तत्काल फल मिलता है । कौआ कोयल बन जाता है, बगुला हंस बन जाता है अर्थात्‌ सत्संग करनेसे रंग नहीं बदलता, ढंग बदला जाता है । जो वाणी कौआकी तरह है, वह कोयलकी तरह हो जाती है । जो बगुला होता है, वह हंसकी तरह नीर-क्षीर विवेक करने लगता है । सत्संगसे आचरण और विवेक तत्काल बदल जाते हैं । सत्संग मिल जाय तो ये बदल जाते हैं अगर नहीं बदले तो, या तो सत्संग नहीं मिला या सत्संगमें आप नहीं गये । दोनोंके मिलनेसे ही काम बनता है । पारस लोहेको सोना बना दे, अगर मिले तब तो, पर बीचमें पत्ता रख दिया जाय तो फिर कुछ नहीं बननेका ।

         भगवान्‌के प्रति व सन्त-महात्माओंके प्रति निष्काम-भावसे प्रेम करो । भगवान्‌ मीठे लगें, प्यारे लगें, अच्छे लगें । क्यों लगें ? क्योंकि वे मेरे हैं । बच्चेको माँ अच्छी लगती है । क्यों अच्छी लगती है ? क्योंकि मेरी माँ है । ऐसे ही भगवान्‌के साथ अपनापन रहे, तो यह सत्संग होता है ।भगवान्‌ हमारे हैं, हम भगवान्‌के हैं । कैसी बढ़िया बात है ।

    (शेष आगेके ब्लॉगमें)

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🌟 सत्संगकी महिमा :

(गत ब्लॉगसे आगेका)

        मनमें ईर्ष्या, राग, द्वेष आदि दोष भरे हुए हैं । बहुत-से भाई-बहन इस बातको जानते ही नहीं है और जो जानते हैं वे विशेष खयाल नहीं करते । कई खयाल करके छोड़ना भी चाहते हैं, लेकिन इसमें सुख लेते रहते हैं । इस कारण राग, द्वेष, ईर्ष्या आदि छूटते नहीं, क्योंकि असत्‌का संग रहता है ।

         सत्‌का संग (सत्संग) मिल जाय तो आदमी निहाल हो जाय । जहाँ सत्‌का संग हुआ, वह निहाल हुआ । कारण क्या है ? परमात्मा सत्‌ हैं । बीचमें जितना-जितना असत्‌का सम्बन्ध मान रखा है, वही बाधा है ।

         जैसे कल्पवृक्षके नीचे जानेसे सब काम सिद्ध होते हैं, वैसे ही सत्संग करनेसे सब काम सिद्ध होते हैं । अर्थ, धर्म, काम, मोक्ष‒चारों पुरुषार्थ सिद्ध होते हैं । तो क्या सत्संगसे धन मिल जाता है ? कहते हैं कि सत्संगसे बड़ा विलक्षण धन मिलता है । रुपया मिलनेसे तृष्णा जागृत होती है और सत्संग करनेसे तृष्णा मिट जाती है । रुपयोंकी जरूरत ही नहीं रहती ।

गंगा पापं शशी तापं   दैन्यं कल्पतरुर्हरेत् ।
पापं तापं तथा दैन्यं सद्यः साधुसमागमः ॥

         गंगाजीमें स्नान करनेसे पाप दूर हो जाते हैं; पूर्णिमाके दिन चन्द्रमा पूरा उदय होता है, उस दिन तपत (गरमी) शान्त हो जाती है; कल्पवृक्षके नीचे बैठनेसे दरिद्रता दूर हो जाती है । पर सत्संगसे तीनों बातें हो जाती हैं‒पाप नष्ट होते हैं, भीतरी ताप मिट जाता है और संसारकी दरिद्रता दूर हो जाती है ।

चाह गई चिन्ता मिटी,       मनुआ बेपरवाह ।
जिनको कछू न चाहिए, सो साहन पतिशाह ॥

सत्संगसे हृदयकी चाहना भी मिट जाती है । यह बात एकदम सच्ची है, सत्संग करनेवाले भाई-बहन तो इस बातको जानते हैं । बिलकुल ठीक बात है,सत्संगसे हृदयकी जलन दूर हो जाती है ।

        मनुष्य चाहता है कि ऐसे हो जाय, वैसे हो जाय तो ऐसी बात आती है कि‒

मना मनोरथ छोड़ दे    तेरा किया न होय ।
पानी में घी निपजे तो सूखी खाय न कोय ॥

*** ***

यद्भावि न तद्भावि   भावि चेन्न तदन्यथा ।
इति चिन्ताविषघ्नोऽयमगदः किं न पीयते ॥

         जो नहीं होना है, वह नहीं होगा और जो होनेवाला है वह टल नहीं सकता, होकर रहेगा फिर ऐसा क्यों आग्रह कि यह होना चाहिये, यह नहीं होना चाहिये । बस हाँ-में-हाँ मिला दें । सत्संग भी एक कला है । सत्संगमें कला मिलती है, दुःखोंसे पार होनेकी । जैसे समुद्रमें डूबनेवालेको तैरनेकी कला हाथ लग जाय, ऐसे सत्संगमें युक्ति मिल जाय तो निहाल हो जाय ।

सत्संगमें उत्तम विचार मिलते हैं ।ज्ञानमार्गमें तो यहाँतक बताया है‒

धन किस लिए है चाहता, तू आप मालामाल है ।
सिक्के सभी जिससे बनें,   तू वह महा टकसाल है ॥

         उस धनके आगे तू इस धनको क्यों चाहता है ? धन-ही-धन है । परमात्मा-ही-परमात्मा है; लबालब भरा हुआ है । उस धनसे धन्य हो जाय । परमात्माका, सत्‌का दर्शन‒यह सत्संग करा देता है ।

    (शेष आगेके ब्लॉगमें)

‒ ‘जीवनोपयोगी प्रवचन’ पुस्तकसे

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गुरुवार, 29 सितंबर 2016

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🌟 सत्संगकी महिमा :

प्रथम भगति संतन्ह कर संगा ।

(मानस ३/३४/४)

           सन्त-महात्माओंका संग पहली भक्ति है ।

भक्ति सुतंत्र सकल सुख खानी ।
बिनु सतसंग न पावहिं प्रानी ॥

(मानस ७/४४/३)

           भक्ति स्वतन्त्र है, सम्पूर्ण सुखोंकी खान है । कहते हैं‒

सतसंगत    मुद      मंगल    मूला ।
सोई फल सिधि सब साधन फूला ॥

 (मानस १/२/४)

          सम्पूर्ण मंगलोंकी मूल सत्संगति है । वृक्षमें पहिले मूल होता है और अन्तिम लक्ष्य फल होता है । सत्संगति मूल भी है और फल भी है । जितने अन्य साधन हैं सब फूल-पत्ती हैं, जो मूल और फलके बीचमें रहनेवाली चीजें हैं । सत्संगतिमें ही सब साधन आ जाते हैं । इसलिये सत्संगकी बड़ी भारी महिमा है । सुन्दरदासजी महाराज कहते हैं‒

सन्त समागम करिये भाई ।
यामें बैठो  सब मिल आई ॥

           सन्त-समागम करना चाहिये । यह नौकाकी तरह है, इसमें बैठकर पार हो जायेंगे । सत्संग चन्दनकी तरह पवित्र बना दे और पारसरूपी सत्संगसे कंचन-जैसा हो जाय‒ऐसा सत्संग है । आगे सुन्दरदासजी महाराज फिर कहते हैं‒

और उपाय नहीं तिरने का, सुन्दर काढहि राम दुहाई ।

         रामजीकी सौगन्ध दे दी कि कल्याणका और कोई उपाय नहीं है । यह अचूक उपाय है । इसलिये सत्संगमें जाकर बैठ जाएँ तो निहाल हो जायें । सत्‌का संग करो । जहाँ भगवान्‌की चर्चा हो, सत्‌-चर्चा हो, सत्‌-चिन्तन हो, सत्कर्म हो और सत्संग हो तो सत्‌के साथ सम्बन्ध हो जाय । बस, इससे निहाल हो जाय जीव ।

        जीवको जितने दुःख आते हैं, सब असत्‌के संगसे आते हैं और अविनाशीका संग करते ही स्वतः निहाल हो जाता है, क्योंकि वह भगवान्‌का अंश है ।

ईश्वर अंस     जीव अबिनासी ।
चेतन अमल सहज सुखरासी ॥

 (मानस ७/११६/१)

           अतः सत्संगसे, सत्‌का प्रेम होनेसे सत्‌ प्राप्त हो जाता है । सत्संग मिल जाय, परमात्माका संग मिल जाय तो निहाल हो जाय । सत्‌से जहाँ सम्बन्ध होता है, वह सत्संग है । भगवान्‌के साथ जो संग है, वह सत्संग है । असली संग होता है असत्‌के त्यागसे । वैसे असत्‌के द्वारा भी सत्संगमें सहायता होती है, जैसे सत्‌-चर्चा करते हैं तो बिना वाणीसे कैसे करें ? सत्कर्म करते हैं तो बिना बाहरी क्रियासे सत्कर्म कैसे करें ? सत्‌-चिन्तन करते हैं तो मनके बिना कैसे करें ? पर सत्संगमें दूसरा नहीं है; अपने-आपहीमें मिल जाय, तल्लीन हो जाय । सत्संग, सत्‌-चिन्तन, सत्कर्म, सत्‌-चर्चा और सद्‌ग्रन्थोंका अवलोकन ‒इन सबका उद्देश्य सत्संग है । सत्‌की प्राप्तिके लिये असत्‌को दूर कर दे तो सत्संगका उद्देश्य पूरा हो जाता है ।

           ‘सनमुख होइ जीव मोहि जबहीं ।’
असत्‌से विमुख होनेपर सत्‌का संग हो जाता है । राग, द्वेष, इर्षा आदिका जो कूड़ा-करकट भीतरमें भरा है, यह सत्संग नहीं होने देता । ऐसा मालूम होता है कि मनुष्य चाहे तो इनका त्याग कर सकता है; परन्तु फिर भी इसे कठिनता मालूम देती है; कबतक ? जबतक पक्का विचार न हो जाय । पक्का विचार करनेपर यह कठिनता नहीं रहती । चाहे जो हो, हमें तो इधर ही चलना है, पक्का विचार हो जाय, फिर सुगमता हो जाती है ।

     (शेष आगेके ब्लॉगमें)

‒ ‘जीवनोपयोगी प्रवचन’ पुस्तकसे

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🌟 भक्तशिरोमणि श्रीहनुमान्‌जीकी दास्य-रति :

(गत ब्लॉगसे आगेका)

जब बहुत आग्रह किया, तब हनुमान्‌जी वहाँसे चले गये और छतपर जाकर बैठ गये । वहाँ बैठकर उन्होंने लगातार चुटकी बजाना शुरू कर दिया; क्योंकि रामजीको न जाने कब जम्हाई आ जाय ! यहाँ रामजीको ऐसी जम्हाई आयी कि उनका मुख खुला ही रह गया, बन्द हुआ ही नहीं ! यह देखकर सीताजी बड़ी व्याकुल हो गयीं कि न जाने रामजीको क्या हो गया है ! भरतादि सभी भाई आ गये । वैद्योंको बुलाया गया तो वे भी कुछ कर नहीं सके । वशिष्ठजी आये तो उनको आश्चर्य हुआ कि ऐसी चिन्ताजनक स्थितिमें हनुमान्‌जी दिखायी नहीं दे रहे हैं ! और सब तो यहाँ हैं, पर हनुमान्‌जी कहाँ है ? खोज करनेपर हनुमान्‌जी छतपर चुटकी बजाते हुए मिले । उनको बुलाया गया और वे रामजीके पास आये तो चुटकी बजाना बन्द करते ही रामजीका मुख स्वाभाविक स्थितिमें आ आया ! अब सबकी समझमें आया कि यह सब लीला हनुमान्‌जीकी चुटकी बजानेके कारण ही थी ! भगवान्‌ने यह लीला इसलिये की थी कि जैसे भूखेको अन्न देना ही चाहिये, ऐसे ही सेवाके लिये आतुर हनुमान्‌जीको सेवाका अवसर देना ही चाहिये, बन्द नहीं करना चाहिये । फिर भरतादि भाइयोंने ऐसा आग्रह नहीं रखा । तात्पर्य है कि संयोग-रति और वियोग-रति‒दोनोंमें ही हनुमान्‌जी भगवान्‌की सेवा करनेमें तत्पर रहते हैं ।

         इस प्रकार हनुमान्‌जीका दास्य, सख्य, वात्सल्य तथा माधुर्य-भाव बहुत विलक्षण है ! इस कारण हनुमान्‌जीकी ऐसी विलक्षण महिमा है कि संसारमें भगवान्‌से भी अधिक उसका पूजन होता है । जहाँ भगवान्‌ श्रीरामके मन्दिर हैं, वहाँ तो उनके साथ हनुमान्‌जी विराजमान हैं ही, जहाँ भगवान्‌ श्रीरामके मन्दिर नहीं हैं, वहाँ भी हनुमान्‌जीके स्वतन्त्र मन्दिर हैं । उनके मन्दिर प्रत्येक गाँव और शहरमें, जगह-जगह मिलते हैं । केवल भारतमें ही नहीं, प्रत्युत विदेशोंमें भी हनुमान्‌जीके अनेक मन्दिर हैं । इस प्रकार वे रामजीके साथ भी पूजित होते हैं और स्वतन्त्र रूपसे भी पूजित होते हैं । इसलिये कहा गया है‒

मोरे मन प्रभु   अस बिस्वासा ।
राम ते अधिक राम कर दासा ॥

(मानस ७/१२०/८)

          भगवान्‌ शंकर कहते हैं‒

हनुमान्‌ सम    नाहिं बड़भागी ।
नहीं कोउ राम चरन अनुरागी ॥
गिरजा जासु     प्रीति सेवकाई ।
बार बार प्रभु   निज मुख गाई ॥
                                                 (मानस ७/५०/४-५)

          स्वयं भगवान्‌ श्रीराम हनुमान्‌जीसे कहते हैं‒

मदङ्गे जीर्णतां यातु      यत् त्वयोपकृतं कपे ।
नरः प्रत्युपकाराणामापत्स्वायाति पात्रताम् ॥
                                                 (वाल्मीकि॰ उत्तर॰ ४०/२४)

          ‘कपिश्रेष्ठ ! मैं तो यही चाहता हूँ कि तुमने जो-जो उपकार किये हैं, वे सब मेरे शरीरमें ही पच जायँ ! उनका बदला चुकानेका मुझे कभी अवसर न मिले; क्योंकि उपकारका बदला पानेका अवसर मनुष्यको आपत्तिकालमें ही मिलता है (मैं नहीं चाहता कि तुम कभी संकटमें पड़ो और मैं तुम्हारे उपकारका बदला चुकाऊँ) ।’

नारायण ! नारायण !! नारायण !!!

‒ ‘कल्याण-पथ’ पुस्तकसे

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मंगलवार, 27 सितंबर 2016

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🌟 भक्तशिरोमणि श्रीहनुमान्‌जीकी दास्य-रति :

(गत ब्लॉगसे आगेका)

हनुमान्‌जीकी वियोग-रति भी विचित्र ही है । लौकिक अथवा पारमार्थिक जगत्‌में कोई भी व्यक्ति अपने इष्टका वियोग नहीं चाहता । परन्तु भगवान्‌का कार्य करनेके लिये तथा उनका निरन्तर स्मरण करनेके लिये, उनका गुणानुवाद (लीला-कथा) सुननेके लिये हनुमान्‌जी भगवान्‌से वियोग-रतिका वरदान माँगते हैं‒

यावद् रामकथा वीर   चरिष्यति महीतले ।
तावच्छरीरे वत्स्यन्तु प्राणा मम न संशयः ॥

(वाल्मीकि॰उत्तर॰४०/१७)

         ‘वीर श्रीराम ! इस पृथ्वीपर जबतक रामकथा प्रचलित रहे, तबतक निःसन्देह मेरे प्राण इस शरीरमें ही बसे रहें ।’

           कोई प्रेमास्पद भी अपने प्रेमीसे वियोग नहीं चाहता । परन्तु भगवान्‌ श्रीराम जब परमधाम पधारने लगे, तब वे भक्तोंकी सहायता, रक्षाके लिये हनुमान्‌जीको इस पृथ्वीपर ही रहनेकी आज्ञा देते हैं । यह भी एक विशेष बात है ! भगवान्‌ कहते हैं‒

जीविते कृतबुद्धिस्त्वं मा प्रतिज्ञां वृथा कृथाः ।
मत्कथाः प्रचरिष्यन्ति   यावल्लोके हरिश्वर ॥
तावद् रमस्व सुप्रीतो    मद्वाक्यमनुपालयन् ।
एवमुक्तस्तु हनुमान्‌       राघवेण महात्मना ॥
वाक्यं विज्ञापयामास        परं हर्षमवाप च ।

 (वाल्मीकि॰उत्तर॰ १०८/३३-३५)

        ‘हरीश्वर ! तुमने दीर्घकालतक जीवित रहनेका निश्चय किया है । अपनी इस प्रतिज्ञाको व्यर्थ न करो । जबतक संसारमें मेरी कथाओंका प्रचार रहे, तबतक तुम भी मेरी आज्ञाका पालन करते हुए प्रसन्नतापूर्वक विचरते रहो । महात्मा श्रीरघुनाथजीके ऐसा कहनेपर हनुमान्‌जीको बड़ा हर्ष हुआ और वे इस प्रकार बोले‒’

यावत्‌ तव कथा लोके    विचरिष्यति पावनी ॥
तावत् स्थास्यामि मेदिन्यां तवाज्ञामनुपलयन् ।
                                                 (वाल्मीकि॰ उत्तर॰ १०८/३५-३६)

            इसलिये हनुमान्‌जीके लिये आया है‒‘राम चरित सुनिबे को रसिया ।’

        एक बार भरत, लक्ष्मण और शत्रुघ्न‒तीनों भाइयोंने माता सीताजीसे मिलकर विचार किया कि हनुमान्‌जी हमें रामजीकी सेवा करनेका मौका ही नहीं देते, पूरी सेवा अकेले ही किया करते हैं । अतः अब रामजीकी सेवाका पूरा काम हम ही करेंगे, हनुमान्‌जीके लिये कोई काम नहीं छोड़ेंगे । ऐसा विचार करके उन्होंने सेवाका पूरा काम आपसमें बाँट लिया । जब हनुमान्‌जी सेवाके लिये सामने आये, तब उनको रोक दिया और कहा कि आजसे प्रभुकी सेवा बाँट दी गयी है, आपके लिये कोई सेवा नहीं है । हनुमान्‌जीने देखा कि भगवान्‌के जम्हाई (जम्भाई) आनेपर चुटकी बजानेकी सेवा किसीने भी नहीं ली है । अतः उन्होंने यही सेवा अपने हाथमें ले ली । यह सेवा किसीके खयालमें ही नहीं आयी थी ! हनुमान्‌जीमें प्रभुकी सेवा करनेकी लगन थी । जिसमें लगन होती है, उसको कोई-न-कोई सेवा मिल ही जाती है । अब हनुमान्‌जी दिनभर रामजीके सामने ही बैठे रहे और उनके मुखकी तरफ देखते रहे; क्योंकि रामजीको किस समय जम्हाई आ जाय, इसका क्या पता ? जब रात हुई, तब भी हनुमान्‌जी उसी तरह बैठे रहे । भरतादि सभी भाइयोंने हनुमान्‌जीसे कहा कि रातमें आप यहाँ नहीं बैठ सकते, अब आप चले जायँ । हनुमान्‌जी बोले कैसे चला जाऊँ ? रातको न जाने कब रामजीको जम्हाई आ जाय !

   (शेष आगेके ब्लॉगमें)

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सोमवार, 26 सितंबर 2016

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🌟 भक्तशिरोमणि श्रीहनुमान्‌जीकी दास्य-रति :

(गत ब्लॉगसे आगेका)

         सभी रतियोंकी दो अवस्थाएँ मानी गयी हैं—संयोग (सम्भोग) और वियोग (विप्रलम्भ) । संयोग-रतिमें पत्नी भोजनादिके द्वारा पतिकी सेवा करती है और वियोग-रतिमें (पतिके दूर होनेसे) वह पतिका स्मरण-चिन्तन करती है । वियोग-रतिमें प्रेमास्पदकी निरन्तर मानसिक सेवा होती है । अतः संयोग-रतिकी अपेक्षा वियोग-रतिको श्रेष्ठ माना गया है । चैतन्य महाप्रभुने भी इस वियोग-रतिका विशेष आदर किया है । इसमें भी ‘परकीया माधुर्य-रति’ की वियोगावस्था सबसे ऊँची है, जिसमें प्रेमी और प्रेमास्पदमें नित्ययोग रहता है । प्रेम-रसकी वृद्धिके लिये इस नित्ययोगमें चार अवस्थाएँ होती हैं‒

           १-नित्ययोगमें योग

           २-नित्ययोगमें वियोग

           ३- वियोगमें नित्ययोग

           ४-वियोगमें वियोग

       प्रेमी और प्रेमास्पदका परस्पर मिलन होना ‘नित्ययोगमें योग’ है । प्रेमास्पदसे मिलन होनेपर भी प्रेमीमें यह भाव आ जाता है कि प्रेमास्पद कहीं चले गये हैं‒यह ‘नित्ययोगमें वियोग’ है । प्रेमास्पद सामने नहीं हैं, पर मनसे उन्हींका गाढ़ चिन्तन हो रहा है और वे मनसे प्रत्यक्ष मिलते हुए दिख रहे हैं‒यह ‘वियोगमें नित्ययोग’ है ।प्रेमास्पद थोड़े समयके लिये सामने नहीं आये, पर मनमें ऐसा भाव है कि उनसे मिले बिना युग बीत गया‒यह ‘वियोगमें वियोग’ है । वास्तवमें इन चारों अवस्थाओंमें प्रेमास्पदके साथ नित्ययोग ज्यों-का-त्यों बना रहता है, वियोग कभी होता ही नहीं, हो सकता ही नहीं और होनेकी सम्भावना भी नहीं । प्रेमका आदान-प्रदान करनेके लिये ही प्रेमी और प्रेमास्पदमें संयोग-वियोगकी लीला हुआ करती है ।

     हनुमान्‌जीमें संयोग-रति और वियोग-रति‒दोनों ही विलक्षणरूपसे विद्यमान हैं ।संयोगकालमें वे भगवान्‌की सेवामें ही रत रहते हैं और वियोगकालमें भगवान्‌के स्मरण-चिन्तनमें डूबे रहते हैं । संयोग-रतिमें प्रेमी खुद भी सुख लेता है; जैसे पतिको सुख देनेके साथ-साथ पत्नी खुद भी सुखका अनुभव करती है । परन्तु हनुमान्‌जीकी संयोग-रतिमें किंचिन्मात्र भी अपना सुख नहीं है । केवल भगवान्‌के सुखमें ही उनका सुख है‒‘तत्सुखे सुखित्वम्’ । वे तो भगवान्‌को सुख पहुँचाने, उनकी सेवा करनेके लिये सदा आतुर रहते हैं, छटपटाते रहते हैं‒

राम काज करिबे को आतुर । (हनुमानचालीसा)

राम काजू कीन्हें बिनु मोही कहाँ बिश्राम ॥ (मानस ५/१)

      एक बार सुबह हनुमान्‌जीको भूख लग गयी तो वे माता सीताजीके पास गये और बोले कि माँ ! मेरेको भूख लगी है, खानेके लिये कुछ दो । सीताजीने कहा कि बेटा ! मैंने अभीतक स्नान नहीं किया है । तुम ठहरो, मैं अभी स्नान करके भोजन देती हूँ । सीताजीने स्नान करके श्रृंगार किया । उनकी माँगमें सिन्दूर देखकर सहज सरल हनुमान्‌जीने पूछा कि माँ ! आपने यह सिन्दूर क्यों लगाया है ? सीताजीने कहा कि बेटा ! इसको लगानेसे तुम्हारे स्वामीकी आयु बढ़ती है । ऐसा सुनकर हनुमान्‌को विचार आया कि अगर सिन्दूरकी एक रेखा खींचनेसे रामजीकी आयु बढ़ती है, तो फिर पूरे शरीरमें सिन्दूर लगानेसे उनकी आयु कितनी बढ़ जायगी ! सीताजी रसोईमें गयीं तो हनुमान्‌जी श्रृंगार कक्षमें चले गये और उन्होंने सिन्दूरकी डिबियाको नीचे पटक दिया । सब सिन्दूर नीचे बिखर गया और हनुमान्‌जी वह सिन्दूर अपने पूरे शरीरपर लगा लिया ! अब मेरे प्रभुकी आयु खूब बढ़ जायगी‒ऐसा सोचकर हनुमान्‌जी बड़े हर्षित हो गये और भूख-प्यासको भूलकर सीधे रामजीके दरबारमें पहुँच गये ! उनको इस वेशमें देखकर सभी हँसने लगे । रामजीने पूछा कि हनुमान्‌ ! आज तुमने अपने शरीरपर सिन्दूरका लेप कैसे कर लिया ? हनुमान्‌जी बोले कि प्रभो ! माँके थोड़ा-सा सिन्दूर लगानेसे आपकी आयु बढ़ती है‒ऐसा जानकर मैंने पूरे शरीरपर ही सिन्दूर लगाना शुरू कर दिया है, जिससे आपकी आयु खूब खूब बढ़ जाय !रामजीने कहा कि बहुत अच्छा ! अब आगेसे जो भक्त तुम्हारेको तेल और सिन्दूर चढ़ायेगा, उसपर मैं बहुत प्रसन्न होऊँगा !

    (शेष आगेके ब्लॉगमें)

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रविवार, 25 सितंबर 2016

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 (गत ब्लॉगसे आगेका)

        माधुर्य-रतिके दो भेद हैं‒स्वकीया और परकीया । ‘स्वकीया माधुर्य-रति’ में पति-पत्नीके सम्बन्धका भाव रहता है । पतिव्रता स्त्री अपने माता, पिता, भाई, कुल आदि सबका त्याग करके अपने-आपको पतिकी सेवामें अर्पित कर देती है । इतना ही नहीं, वह अपने गोत्रका भी त्याग करके पतिके गोत्रकी बन जाती है* । अपना तन, मन, धन, बल, बुद्धि आदि सब कुछ पतिके अर्पण करके सर्वथा पतिके परायण हो जाती है । उसमें दास्य, सख्य, वात्सल्य और माधुर्य‒सभी भाव विद्यमान रहते हैं ।वह दासीकी तरह पतिकी सेवा करती है, मित्रकी तरह पतिको उचित सलाह देती है और माताकी तरह भोजन, वस्त्र आदिसे पतिका पालन करती है तथा उसके सुख-आरामका खयाल रखती है† ।

       ‘परकीया माधुर्य-रति’ में अपनी पत्नीसे भिन्न स्त्री (परनारी) के सम्बन्धका और अपने पतिसे भिन्न पुरुष (परपुरुष या उपपति) के सम्बन्धका भाव रहता है । यद्यपि लौकिक दृष्टिसे यह सम्बन्ध व्यभिचार होनेसे महान्‌ पतन करनेवाला है, तथापि पारमार्थिक दृष्टिसे इस सम्बन्धका भाव बहुत उन्नति करनेवाला है । यद्यपि पत्नी अपने पतिकी सेवा करती है, तथापि वह अधिकारपूर्वक पतिसे यह आशा भी रखती है कि वह रोटी, कपड़ा, मकान आदि जीवन-निर्वाहकी वस्तुओंका प्रबन्ध करे और बाल-बच्चोंके पालन-पोषण, विद्याध्ययन, विवाह आदिकी व्यवस्था करे । परन्तु परकीया-भावमें अपने इष्टको सुख पहुँचानेके सिवाय कोई भी कामना या स्वार्थ नहीं रहता । स्वकीया-भावकी अपेक्षा परकीया-भावमें अपने प्रेमास्पदका चिन्तन भी अधिक होता है और उससे मिलनेकी इच्छा भी तीव्र होती है । स्वकीया-भावमें तो हरदम साथमें रहनेसे प्रेमास्पदके आचरणोंको लेकर उसमें दोषदृष्टि भी हो सकती है; परन्तु परकीया-भावमें प्रेमास्पदमें दोषदृष्टि होती ही नहीं ।यद्यपि लौकिक परकीया-भावमें अपने सुखकी इच्छा भी रहती है, तथापिपारमार्थिक परकीया-भावमें भक्तके भीतर अपने सुखकी किंचिन्मात्र भी इच्छा नहीं रहती । उसमें केवल एक ही लगन रहती है कि प्रेमास्पद (भगवान्‌) को अधिक-से-अधिक सुख कैसे पहुँचे ! उसका अहंभाव भगवान्‌में लीन हो जाता है ।

           हनुमान्‌जीका भाव स्वकीया अथवा परकीया माधुर्य-रतिसे भी श्रेष्ठ है ! उन्होंने वानरका शरीर इसलिये धारण किया है कि उनको अपने प्रेमास्पदसे अथवा दूसरे किसीसे किंचिन्मात्र भी कोई वस्तु लेनेकी जरूरत न पड़े । उनको न रोटीकी जरूरत है, न कपड़ेकी जरूरत है, न मकानकी जरूरत है, न बाल-बच्चोंके देखभालकी जरूरत है, न मान-बड़ाई आदिकी जरूरत है ! वानर तो जंगलमें फल-फुल-पत्ते खाकर और पेड़ोंपर रहकर ही जीवन-निर्वाह कर लेता है । लौकिक परकीया-भावमें प्रेमीका अपने माता-पिता, भाई-बहन आदिके साथ भी सम्बन्ध रहता है; परन्तु हनुमान्‌जीका एक भगवान्‌ श्रीरामके सिवाय और किसीसे सम्बन्ध है ही नहीं ।

     (शेष आगेके ब्लॉगमें)

‒ ‘कल्याण-पथ’ पुस्तकसे

 *भक्तके लिये कहा गया है‒‘साह ही को गोतु होत है गुलाम को ।’
                                 (कवितावली, उत्तर॰ १०७)

    † कार्ये दासी रतौ   रम्भा   भोजने जननीसमा ।
        विपत्सु मन्त्रिणी भर्तुः सा च भार्या पतिव्रता ॥

 (पद्मपुराण, सृष्टि॰ ४७/५६)

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शुक्रवार, 23 सितंबर 2016

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🌟 भक्तशिरोमणि श्रीहनुमान्‌जीकी दास्य-रति :

(गत ब्लॉगसे आगेका)

सेव्यने सेवा स्वीकार कर ली‒इसी बातसे भक्त अपनेको कृत्यकृत्य मानता है । इतना ही नहीं, अपने इष्टदेवके भक्तोंकी भी सेवाका अवसर मिल जाय तो वह इसको अपना सौभाग्य समझता है । हनुमान्‌जी सनकादिकोंसे कहते हैं‒

ऐहिकेषु च कार्येषु           महापत्सु च सर्वदा ॥
नैव योज्यो राममन्त्रः       केवलं मोक्षसाधकः ।
ऐहिके समनुप्राप्ते        मां स्मरेद् रामसेवकम् ॥
यो रामं संस्मरेन्नित्यं       भक्त्या मनुपरायणः ।
तस्याहमिष्टसंसिद्ध्यै दीक्षितोऽस्मि मुनिश्वराः ॥
वाञ्छितार्थं प्रदास्यामि    भक्तानां राघवस्य तु ।
सर्वथा जागरूकोऽस्मि         रामकार्यधुरंधरः ॥

(रामरहस्योपनिषद् ४/१०-१३)

‘लौकिक कार्योंके लिये तथा बड़ी-से-बड़ी आपत्तियोंमें भी कभी राममन्त्रका उपयोग नहीं करना चाहिये । वह तो संकट आ पड़े तो केवल मोक्षका साधक है । यदि कोई लौकिक कार्य या संकट आ पड़े तो मुझ राम-सेवकका स्मरण करे । मुनीश्वरो ! जो नित्य भक्तिभावसे मन्त्र-जपमें संलग्न होकर भगवान्‌ रामका सम्यक्‌‌ स्मरण करता है, उसके अभीष्टकी पूर्ण सिद्धिके लिये मैं दीक्षा लिये बैठा हूँ । श्रीरघुनाथजीके भक्तोंको मैं अवश्य मनोवाञ्छित वस्तु प्रदत्त करूँगा । श्रीरामका कार्यभार मैंने अपने सिरपर उठा रखा है और उसके लिये मैं सर्वथा जागरूक हूँ ।’

हनुमान्‌जी भगवान्‌ रामकी सेवा करनेमें इतने दक्ष हैं कि भगवान्‌के मनमें संकल्प उठनेसे पहले ही वे उसकी पूर्ति कर देते हैं ! सीताजीकी खोजके लिये जाते समय हनुमान्‌जीको केवल उनका कुशल समाचार लानेके लिये ही कहा गया था । परन्तु सीताजीकी खोजके साथ-साथ उन्होंने इन बातोंका भी पता लगा लिया कि लंकाके दुर्ग किस विधिसे बने हैं, किस प्रकार लंकापुरीकी रक्षाकी व्यवस्था की गयी है, किस तरह सेनाओंसे सुरक्षित है, वहाँ सैनिकों और वाहनोंकी संख्या कितनी है आदि-आदि । जब अशोकवाटिकामें उन्होंने त्रिजटाका स्वप्न सुना‒

सपनें बानर लंका जारी । जातुधान सेना सब मारी ॥
(मानस ५/११/२)

तब इसको हनुमान्‌जी भगवान्‌की प्रेरणा (आज्ञा) समझी । जब उनकी पूँछमें आग लगानेकी बात चली, तब इस बातकी पूरी तरह पुष्टि हो गयी‒

बचन सुनत कपि मन मुसकाना ।
भई सहाय        सारद मैं जाना ॥
(मानस ५/२५/२)

          अतः हनुमान्‌जी भगवान्‌की लंका-दहनरूप सेवाका कार्य भलीभाँति पूरा कर दिया ! इतना ही नहीं, रामजीको लंकापर विजय करनेमें सुगमता पड़े, इसके लिये उन्होंने जलानेके साथ-साथ लंकाकी आवश्यक युद्ध-सामग्रीको भी नष्ट कर दिया, खाइयोंको पाट दिया, परकोटोंको गिरा दिया और विशाल राक्षस-सेनाका एक चौथाई भाग नष्ट कर दिया (वाल्मीकि॰ युद्ध॰३) । आगे राक्षसोंकी संख्या न बढ़े, इसके लिये उन्होंने भयंकर गर्जना करके राक्षसियोंके गर्भ भी गिरा दिये‒

चलत महाधुनि   गर्जेसि भारी ।
गर्भ स्रवहिं सुनि निसिचर नारी ॥
 (मानस ५/२८/१)

कारण कि भगवान्‌का अवतार राक्षसोंका विनाश करनेके लिये हुआ है‒‘विनाशय च दुष्कृताम्’ (गीता ४/८)और हनुमान्‌जीको भगवान्‌का कार्य ही करना है‒‘राम काज लगि तव अवतारा’ (मानस ४/३०/३) ।

    (शेष आगेके ब्लॉगमें)

‒ ‘कल्याण-पथ’ पुस्तक से

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बुधवार, 21 सितंबर 2016

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🌟 भक्तशिरोमणि श्रीहनुमान्‌जीकी दास्य-रति :

    भगवान्‌की मंगलमयी अपार कृपासे भारतभूमिपर अनन्तकालसे असंख्य ऋषि, सन्त-महात्मा, भक्त होते रहे हैं । उनमें भक्तशिरोमणि श्रीहनुमान्‌जी महाराजका विशेष स्थान है । वानर-जैसी साधारण योनिमें जन्म लेकर भी अपने भावों, गुणों और आचरणोंके द्वारा हनुमान्‌जीने प्राणिमात्रका जो परम हित किया है एवं कर रहे हैं, उससे लोग प्रायः परिचित ही हैं । उनके उपकारसे कोई भी प्राणी कभी उऋण नहीं हो सकता । भगवान्‌ श्रीरामके प्रति उनकी जो दास्य-भक्ति है, उसका पूरा वर्णन करनेकी सामर्थ्य किसीमें भी नहीं है । फिर भी समय सार्थक करनेके लिये उसका किंचित्‌ संकेत करनेकी चेष्टा की जा रही है ।

        अपने-आपको सर्वथा भगवान्‌को समर्पित कर देना, उनके मनोभाव, प्रेरणा अथवा आज्ञाके अनुसार उनकी सेवा करना, उनको निरन्तर सुख पहुँचानेका भाव रखना तथा बदलेमें उनसे कभी कुछ न चाहना‒यही भक्तिका स्वरूप है । ये बातें हनुमान्‌जीमें पूर्णरूपसे पायी जाती हैं । वे अपने शरीर, इन्द्रियाँ, मन, बुद्धि, बल, योग्यता, समय आदिको एकमात्र भगवान्‌का ही समझकर उनकी सेवामें लगाये रखते हैं । उनका पूरा जीवन ही भगवान्‌को सुख पहुँचानेके भावसे ओतप्रोत है ।

       भगवान्‌को श्रद्धा-प्रेमपूर्वक सुख पहुँचानेके भावको ‘रति’ कहते हैं । यह रति मुख्यरूपसे चार प्रकारकी मानी गयी है‒दास्य, सख्य, वात्सल्य और माधुर्य । इनमेंदास्यसे सख्य, सख्यसे वात्सल्य और वात्सल्यसे माधुर्य रति श्रेष्ठ है । कारण किइनमें भक्तको क्रमशः भगवान्‌के ऐश्वर्यकी अधिक विस्मृति होती जाती है और भक्तका संकोच (कि मैं तुच्छ हूँ, भगवान्‌ महान्‌ हैं) मिटता जाता है तथा भगवत्सम्बन्ध (प्रेम) की घनिष्ठता होती जाती है । परन्तु जब इन चारोंमेंसे कोई एक रति भी पूर्णतामें पहुँच जाती है, तब उसमें दूसरी रतियाँ भी आ जाती हैं । जैसे, दास्यरति पूर्णतामें पहुँच जाती है तो उसमें सख्य, वात्सल्य और माधुर्य‒तीनों रतियाँ आ जाती हैं । यही बात अन्य रतियोंके विषयमें भी समझनी चाहिये । कारण यह है कि भगवान्‌ पूर्ण हैं, उनका प्रेम भी पूर्ण है और परमात्माका अंश होनेसे जीव स्वयं भी पूर्ण है । अपूर्णता तो केवल संसारके सम्बन्धसे ही आती है; क्योंकि संसार सर्वथा अपूर्ण है । हनुमान्‌जी में दास्यरतिकी पूर्णता है; अतः उनमें अन्य रतियोंकी कमी नहीं है । उनमें दास्य, सख्य, वात्सल्य और माधुर्य‒चारों रतियाँ पूर्ण रूपसे विद्यमान हैं ।

🌟 दास्य-रति :

       दास्य-रतिमें भक्तका यह भाव रहता है कि भगवान्‌ मेरे स्वामी हैं और मैं उनका दास (सेवक) हूँ । वे चाहे जो करें, चाहे जैसी परिस्थितिमें मेरेको रखें और मेरेसे चाहे जैसा काम लें, मेरेपर उनका पूरा अधिकार है । इस रतिमें भक्तका शरीर, इन्द्रियाँ, मन, बुद्धि आदिमें किंचिन्मात्र भी अपनापन नहीं रहता । उसमें ‘मैं सेवक हूँ’ ऐसा अभिमान भी नहीं रहता । वह तो यही समझता है कि मैं भगवान्‌की प्रेरणा और शक्तिसे उन्हींकी दी हुई सामग्री उनके ही अर्पण कर रहा हूँ । ऐसे अनन्य सेवाभाववाले भक्तोंको यदि भगवान्‌ सालोक्य, सार्ष्टि, सामीप्य, सारूप्य और सायुज्य‒ये पाँच प्रकारकी मुक्तियाँ* भी दे दें तो वे इनको ग्रहण नहीं करते‒

सालोक्यसार्ष्टिसामीप्यसारूप्यैकत्वमप्युत ।
दीयमानं न गृह्णन्ति विना मत्सेवनं जनाः ॥

    (शेष आगेके ब्लॉगमें)

‒ ‘कल्याण-पथ’ पुस्तकसे

*भगवान्‌के नित्यधाममें निवास करना ‘सालोक्य’, भगवान्‌के समान ऐश्वर्य प्राप्त करना ‘सार्ष्टि’, भगवान्‌की नित्य समीपता प्राप्त करना ‘सामीप्य’, भगवान्‌का-सा रूप प्राप्त करना ‘सारूप्य’ तथा भगवान्‌के विग्रहमें समा जाना अर्थात्‌ उनमें ही मिल जाना ‘सायुज्य’ मुक्ति कहलाती है ।

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मंगलवार, 20 सितंबर 2016

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🌟 हनुमान्‌जीका सेवाभाव :

सुमिरि पवनसुत पावन नामू ।
अपने बस   करि   राखे रामू ॥

 (मानस, बाल॰२६/६)

हनुमान्‌ने महान्‌ पवित्र नामका स्मरण करके श्रीरामजीको अपने वशमें कर रखा है । हरदम नाममें तल्लीन रहते हैं । ‘रहिये नाममें गलतान’ रात-दिन नाम जपते ही रहते हैं । हनुमान्‌जी महाराजको खुश करना हो तो राम-नाम सुनाओ, रामजीके चरित्र सुनाओ; क्योंकि ‘प्रभुचरित्र सुनिबेको रसिया’ भगवान्‌के चरित्र सुननेके बड़े रसिया हैं ।

       रामजीने भी कह दिया, ‘धनिक तूँ पत्र लिखाउ’ हनुमान्‌जीको धनी कहा और अपनेको कर्जदार कहा । रामजीने देखा कि मैं तो बन गया कर्जदार, पर सीताजी कर्जदार न बनें तो घरमें ही दो मत हो जायेंगे । इसलिये रामजीका सन्देश लेकर सीताजीके चरणोंमें हनुमान्‌जी महाराज गये । जिससे सीताजी भी ऋणी बन गयीं । ‘बेटा, तूने आकर महाराजकी बात सुनाई । ऐसा सन्देश और कौन सुनायेगा !’ रामजीने देखा कि हम दोनों तो ऋणी बन गये, पर लक्ष्मण बाकी रह गया । जब लक्ष्मणके शक्तिबाण लगा, उस समय संजीवनी लाकर लक्ष्मणजीके प्राण बचाये ।‘लक्ष्मणप्राणदाता च’ इस प्रकार जंगलमें आये हुए तीनों तो ऋणी बन गये, पर घरवाले बाकी रह गये । भरतजीको जाकर सन्देश सुनाया कि रामजी महाराज आ रहे हैं । हनुमान्‌जीने बड़ी चतुराईसे संक्षेपमें सारी बात कह दी ।

रिपु रन जीति सुजस सुर गावत ।
सीता सहित अनुज प्रभु आवत ॥

   (मानस, उत्तर॰२/५)

        पहले हनुमान्‌जी आये थे तो भरतजीका बाण लगा था, उस समय उन्होंने वहाँकी बात कही कि ‘युद्ध हो रहा है, लक्ष्मणजीको मूर्च्छा हो गई है और सीताजीको रावण ले गया है ।’ अब किसकी विजय हुई, क्या हुआ ? इसका पता नहीं है ? यह सब इतिहास जानना चाहते हैं भरतजी महाराज । तो थोड़ेमें सब इतिहास सुना दिया । ऐसे ‘अपने बस करि राखे रामू ॥’ इनकी सेवासे रामजी अपने परिवारसहित वशमें हो गये । ऐसी कई कथाएँ आती हैं । हनुमान्‌जी महाराज सेवा बहुत करते थे । सेवा करनेवालेके वशमें सेवा लेनेवाला हो ही जाता है ।

          सेवा करनेवाला ऐसे तो छोटा कहलाता है और दास होकर ही सेवा करता है; परन्तु सेवा करनेसे सेवक मालिक हो जाता है और सेवा लेनेवाला स्वामी उसका दास हो जाता है । स्वामीको सेवककी सब बात माननी पड़ती है ।संसारमें रहनेकी यह बहुत विलक्षण विद्या है‒सेवा करना ‘सेवाधर्मः परमगहनो योगिनामप्यगम्यः’ सेवाका धर्म बड़ा कठोर है । भरतजी महाराज भी यही कहते हैं । ऐसे सेवा-धर्मको हनुमान्‌जी महाराजने निभाया ।

       वे रघुनाथजी महाराजकी खूब सेवा करते थे । जंगलमें तो सेवा करते ही थे, राजगद्दी होनेपर भी वहाँ हनुमान्‌जी महाराज सेवा करनेके लिये साथमें रह गये । एक बारकी बात है । लक्ष्मणजी और सीताजीके मनमें आया कि हनुमान्‌जीको कोई सेवा नहीं देनी है । देवर-भौजाईने आपसमें बात कर ली कि महाराजकी सब सेवा हम करेंगे । सीताजीने हनुमान्‌जीकेसामने बात रखी कि ‘देखो बेटा ! तुम सेवा करते हो ना ! अब वह सेवा हम करेंगे । इस कारण तुम्हारे लिये कोई सेवा नहीं है ।’ हनुमान्‌जी बोले‒‘माताजी ! आठ पहर जो-जो सेवा आपलोग करोगे, उसमेंसे जो बचेगी, वह सेवा मैं करूँगा । इसलिये एक लिस्ट बना दो ।’ बहुत अच्छी बात । अब कोई सेवा हनुमान्‌के लिये बची नहीं । हनुमान्‌जी महाराजको बहाना मिल गया । भगवान्‌को जब उबासी आवे तो चुटकी बजा देवें ।

        शास्त्रोंमें, स्मृतियोंमें ऐसा वचन आता है कि उबासी आनेपर शिष्यके लिये गुरुको भी चुटकी बजा देनी चाहिये । इसलिये रघुनाथजी महाराजको उबासी आते ही चुटकी बजा देते थे, यह सेवा हो गयी । अब वह उस कागजमें लिखी तो थी ही नहीं । चुटकी बजानेकी कौन-सी सेवा है ! रात्रिके समय हनुमान्‌जीको बाहर भेज दिया । अब तो वे छज्जेपर बैठे-बैठे मुँहसे ‘सीताराम सीताराम’ कीर्तन करते रहते और चुटकी भी बजाते रहते । न जाने कब भगवान्‌को उबासी आ जाय । अब चुटकी बजने लगे तो रामजीको भी जँभाई आनी शुरू हो गयी । सीताजीने देखा कि बात क्या हो गयी ? घबराकर कौशल्याजीसे कहा और सबको बुलाने लगी । वशिष्ठजीको बुलाया कि रामललाको आज क्या हो गया । वशिष्ठजीने पूछा‒‘हनुमान्‌ कहाँ है ?’ ‘उसको तो बाहर भेज दिया ।’ ‘हनुमान्‌को तो बुलाओ ।’ हनुमान्‌जी ने आते ही ज्यों चुटकी बजाना बन्द कर दिया, त्यों ही भगवान्‌की जँभाई भी बन्द हो गयी । तब सीताजीने भी सेवा करनेकी खुली कर दी । इस प्रकार हृदयमें रामजीको वशमें कर लिया ।

       भरतजीने भी हनुमान्‌जीसे कह दिया‘नाहिन तात उरिन मैं तोही ।’ तुमने जो बात सुनायी, उससे उऋण नहीं हो सकता । ‘अब प्रभु चरित सुनावहु मोही ।’ अब भगवान्‌के चरित्र सुनाओ । खबर सुनानेमात्रसे आप पहले ही ऋणी हो गये । चरित्र सुनानेसे और अधिक ऋणी हो जाओगे । भरतजीने विचार किया कि जब कर्जा ले लिया तो कम क्यों लें ? कर्जा तो ज्यादा हो जायगा, पर रामजीकी कथा तो सुन लें । हनुमान्‌जी महाराजको प्रसन्न करनेका उपाय भी यही है और उऋण होनेका उपाय ही यही है कि उनको रामजीकी कथा सुनाओ, चाहे उनसे सुन लो । रामजीकी चर्चासे वे खुश हो जाते हैं ।इस प्रकार हनुमान्‌जीके सब वशमें हो गये ।

नारायण ! नारायण !! नारायण !!!

‒ ‘मानसमें नाम-वन्दना’ पुस्तकसे

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सोमवार, 19 सितंबर 2016

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🌟 गीताका तात्पर्य :

(गत ब्लॉगसे आगेका)

       कई वर्ष पहलेकी बात है । बाँकुड़ा जिलेमें अकाल पड़ गया तो गीताप्रेसके संस्थापक, संचालक तथा संरक्षक सेठजी श्रीजयदयालजी गोयन्दकाने वहाँ कई जगह कीर्तन आरम्भ करवा दिया और लोगोंसे कहा कि वहाँ बैठकर दो घण्टे कीर्तन करो और आधा सेर चावल ले जाओ । पैसे देनेसे वे मांस, मछली आदि खरीदेंगे, पर चावल देनेसे वे चावल खायेंगे ही, इसलिये चावल देना शुरू किया । इस तरह उन्होंने सौ-सवा सौ कैम्प खोल दिये । एक दिन सेठजी वहाँ देखनेके लिये गये । रात्रिमें वे जहाँ ठहरे थे, वहाँ बहुत-से बंगाली लोग इकठ्ठे हुए । उन्होंने सेठजीकी बड़ी प्रशंसा की और कहा कि आपने हमारे जिलेको जिला दिया ! सेठजी बोले कि देखो, तुमलोग झूठी प्रशंसा करतेहो, हमने क्या खर्च किया है ? हम मारवाड़से यहाँ आये थे । यहाँ आकर हमने बंगालसे जितना कमाया, वह सब-का-सब दे दें तो आपकी ही वस्तु आपको दी, हमने अपना क्या दिया ? वह भी सब नहीं दिया है । वह सब दे दें और फिर हम मारवाड़से लाकर दें, तब यह माना जायगा कि हमने दिया । इस तरह हमें हरेकको उसीकी वस्तु समझकर उसको देनी है । देकर हम उऋण हो जायँगे, नहीं तो ऋण रह जायगा । अपनेमें सेवकपनेका अभिमान भी नहीं होना चाहिये । घरमें रसोई बनती है तो बच्चे भी खाते हैं, स्त्रियाँ भी खाती हैं, पुरुष भी खाते हैं; क्योंकि उसमें सबका हिस्सा है । इसी तरह कोई भूखा आ जाय, कुत्ता आ जाय, कौआ आ जाय तो उनका भी उसमें हिस्सा है । उनके हिस्सेकी चीज उनको दे दें । इस प्रकार निःस्वार्थभावसे आचरण करनेपर हमारा कल्याण हो जायगा ।गीतामें आया है‒

स्वकर्मणा तमभ्यर्चं सिद्धिं विन्दति मानवः ॥

  (१८/४६)

      ‘अपने कर्तव्य कर्मके द्वारा उस परमात्माका पूजन करके मनुष्य सिद्धिको प्राप्त हो जाता है ।’

      तात्पर्य है कि ब्राह्मण ब्राह्मणोचित कर्मोंके द्वारा पूजन करे, क्षत्रिय क्षत्रियोचित कर्मोंके द्वारा पूजन करे, वैश्य वैश्योचित कर्मोंके द्वारा पूजन करे और शूद्र शूद्रोचित कर्मोंके द्वारा पूजन करे । इस प्रकार सबका पूजन, सबका हित करनेसे अपना कल्याण हो जाता है‒यह बात गीतामें बहुत विलक्षण रीतिसे बतायी गयी है ।

      यदि हम सुख चाहते हैं तो दूसरोंको भी सुख पहुँचाना हमारा कर्तव्य है । यदि हम अपने पास कुछ भी नहीं रखते हैं तो दूसरोंको देनेका विधान हमारेपर लागू भी नहीं होता । इन्कमपर टैक्स लगता है । हमने कमाया है तो उसपर टैक्स लगेगा । यदि हमने कमाया ही नहीं तो उसपर टैक्स कैसे लगेगा ? अतः यदि हम अपने पास वस्तुएँ रखते हैं तो उनसे दूसरोंकी सेवा करनी है, दूसरोंका हित करना है । गीताका तात्पर्य सबके कल्याणमें है और सबके कल्याणमें ही हमारा कल्याण निहित है ।जो लोगोंको अन्न बाँटता है क्या वह भूखा रहेगा ? क्या उसका हित नहीं होगा ? उसका हित अपने-आप हो जायगा ।

        चाहे धनी हो, चाहे गरीब हो; चाहे बहुत परिवारवाला हो चाहे अकेला हो; चाहे बलवान् हो, चाहे निर्बल हो; चाहे विद्वान् हो, कल्याणमें सबका समान हिस्सा है । जैसे, एक माँके दस बेटे होते हैं तो क्या माँके दस हिस्से होते हैं ? माँ तो सभी बेटोंके लिये पूरी-की-पूरी होती है । दसों बेटे पूरी माँको अपनी मानते हैं । ऐसे ही भगवान्‌ पूरे-के-पूरे हमारे हैं । भगवान्‌के हिस्से नहीं होते । हम सब उनकी गोदमें बैठनेके समान अधिकारी हैं । इसलिये हम सब आपसमें प्रेमसे रहें और एक-दूसरेका हित करें‒यह गीताका सिद्धान्त है‒
‘परस्परं भावयन्तः’, ‘सर्वभूतहिते रताः ।’

        प्रश्न‒दान देनेमें, सेवा करनेमें पात्र-अपात्रका विचार करना चाहिये कि नहीं ?

        उत्तर‒अन्न, जल, वस्त्र और औषध‒इनको देनेमें पात्र-अपात्र आदिका विचार नहीं करना चाहिये । जिसको अन्न, जल आदिकी आवश्यकता है, वही पात्र है ।परन्तु कन्यादान, भूमिदान, गोदान आदि विशेष दान करना हो तो उसमें देश, काल, पात्र आदिका विशेष विचार करना चाहिये ।

        अन्न, जल, वस्त्र और औषध‒इनको देनेमें यदि हम पात्र-कुपात्रका अधिक विचार करेंगे तो खुद कुपात्र बन जायँगे और दान करना कठिन हो जायगा ! अतः हमारी दृष्टिमें अगर कोई भूखा, प्यासा आदि दीखता हो तो उसको अन्न, जल आदि दे देना चाहिये । यदि वह अपात्र भी हुआ तो हमें पाप नहीं लगेगा ।

       प्रश्न‒दूसरोंको देनेसे लेनेवालेकी आदत बिगड़ जायगी, लेनेका लोभ पैदा हो जायगा; अतः देनेसे क्या लाभ ?

      उत्तर‒दूसरेको निर्वाहके लिये दें, संचयके लिये नहीं अर्थात्‌ उतना ही दें, जिससे उसका निर्वाह हो जाय । यदि लेनेवालेकी आदत बिगड़ती है तो यह दोष वास्तवमें देनेवालेका है अर्थात्‌ देनेवाला कामना, ममता, स्वार्थ आदिको लेकर देता है । यदि देनेवाला निःस्वार्थ-भावसे, बदलेकी आशा न रखकर दे तो जिसको देगा, उसका स्वभाव भी देनेका बन जायगा, वह भी सेवक बन जायगा ! रामायणमें आया है‒

सर्बस दान   दीन्ह सब काहू ।
जेहिं पावा राखा नहिं ताहू ॥

(मानस, बाल॰१९४/४)

नारायण ! नारायण !! नारायण !!!

‒ ‘जित देखूँ तित तू’ पुस्तकसे

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रविवार, 18 सितंबर 2016

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🌟 गीताका तात्पर्य :

(गत ब्लॉगसे आगेका)

     सबके हितका भाव हरेक भाई-बहन रख सकते हैं । यह भाव गृहस्थ भी रख सकते हैं, साधु-संन्यासी भी रख सकते हैं, दरिद्र-से-दरिद्र मनुष्य भी रख सकते हैं, धनी-से-धनी मनुष्य भी रख सकते हैं । हमारे पास जो वस्तुएँ हैं, वे किसकी हैं‒इसका पता नहीं है, पर कोई अभावग्रस्त आदमी सामने आ जाय तो वस्तुको उसीकी समझकर उसको दे दें‒‘त्वदीयं वस्तु गोविन्द तुभ्यमेव समर्पये ।’ जैसे हमारे पास कोई सज्जन आता है और कहता है कि ‘भाई, आज मेरेको मेलेमें जाना है । मेरे पास एक हजार रुपये हैं, कोई जेब न कतर ले, इसलिये इन रुपयोंको आपके पास रखता हूँ ।’ वह रुपये रखकर चला जाता है । शामको वह आकर रुपये माँगता है और हम उसको रुपये वापस दे देते हैं तो क्या हमे दान कर दिया ? दान नहीं किया, प्रत्युत उसीकी वस्तु उसको दे दी ।

       शास्त्रमें आया है कि रसोई बननेके बाद यदि ब्रह्मचारी और संन्यासी आ जायँ तो उनको अन्न न देनेसे पाप लगता है, जिसकी शुद्धि चान्द्रायणव्रत करनेसे होती है । यदि उनको थोड़ा-सा अन्न भी दे दें तो इतनेमें हमारे धर्मका पालन हो जायगा और पाप नहीं लगेगा । इसमें कोई शंका कर सकता है कि हमने पैसे कमाये, उससे सब सामग्री लाये और रसोई बनायी, पर कोई संन्यासी आ जाय तो उसको न देनेसे पाप लग जायगा‒यह कैसा न्याय है ? इसका समाधान यह है कि जिसने संन्यास ले लिया, त्याग कर दिया और जो अपने पासमें कुछ नहीं रखता, उसके हकका धन कहाँ गया ? यदि वह चाहता तो दूकान, खेत आदिमें काम करके, पढ़ाने-लिखानेका काम करके अपने जीवन-निर्वाहके योग्य धन कमा सकता था, रुपयोंका संग्रह कर सकता था, पर वह उसने नहीं किया तो वे रुपये हमारे पास ही रहे ! इसलिये समयपर भोजनके लिये आ जाय तो उसको रोटी दे दें‒यह हमारा कर्तव्य है । नहीं देंगे तो उसका हमपर ऋण रहेगा, हमें पाप लगेगा ।

        साधुओंकी भिक्षावृत्तिको शास्त्रोंमें बहुत अधिक पवित्र बताया गया है; क्योंकि कई घरोंसे थोड़ा-थोड़ा लेनेसे देनेवालेपर कोई भार भी नहीं पड़ता और लेनेवालेकी उदरपूर्ति भी हो जाती है । इसलिये इसको‘माधुकरी वृत्ति’ भी कहते हैं । ‘मधुकर’ नाम भौरें अथवा मधुमक्खीका है । मधुमक्खी हरेक पुष्पसे थोड़ा-थोड़ा रस लेती है और किसी पुष्पका नुकसान भी नहीं करती । एक साधु थे । उनसे किसीने पूछा कि ‘आप भोजन कहाँ पाते हो ? पासमें एक पैसा तो है नहीं !’ साधुने कहा कि ‘भिक्षा पा लेते हैं ।’ उसने फिर पूछा कि ‘कभी भिक्षा न मिले तो ?’ साधु बोला‒‘तो भूखको ही पा लेते हैं !’ भूखको पानेका तात्पर्य है कि आज हम भोजन नहीं करेंगे, कल करेंगे ।

        संसारमें एक-दूसरेको दिये बिना, एक-दूसरेकी सेवा किये बिना किसीका भी निर्वाह नहीं हो सकता । राजा-महाराजा कोई क्यों न हो, अपने निर्वाहके लिये कुछ-न-कुछ सहायता लेनी ही पड़ती है ।इसलिये गीतामें आया है‒

देवान्भावयतानेन ते देवा भावयन्तु वः ।
परस्परं भावयन्तः श्रेयः परमवाप्स्यथ ॥
                                                  (३/११)

      ‘अपने कर्तव्य-कर्मके द्वारा तुमलोग देवताओंको उन्नत करो और वे देवतालोग अपने कर्तव्यके द्वारा तुमलोगोंको उन्नत करें । इस प्रकार एक-दूसरेको उन्नत करते हुए तुमलोग परम कल्याणको प्राप्त हो जाओगे ।’

        कितनी विलक्षण बात है कि एक-दूसरेका पूजन (सेवा) करते-करते परम कल्याणकी प्राप्ति हो जाती है !

    (शेष आगेके ब्लॉगमें)

‒ ‘जित देखूँ तित तू’ पुस्तकसे

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🌟 गीताका तात्पर्य :

(गत ब्लॉगसे आगेका)

शरीर, इन्द्रियाँ, मन, बुद्धि आदि कुछ भी मेरा नहीं है । इनको संसारका मान लें तो कर्मयोग हो जायगा, प्रकृतिमात्रका समझ लें तो ज्ञानयोग हो जायगा और भगवान्‌का मान लें तो भक्तियोग हो जायगा । यदि इनको अपना मानेंगे तो जन्म-मरणयोग हो जायगा अर्थात्‌ जन्म-मरण होगा, मिलेगा कुछ नहीं । जो अपना नहीं है, वह मिलेगा कैसे ? अपने पास रहेगा कैसे ?इसलिये गीता कहती है कि इन शरीर, इन्द्रियाँ, मन, बुद्धिसे जो भी काम करो, सबके हितके लिये करो‒

यज्ञायाचरतः कर्म समग्रं प्रविलीयते ॥  (४/२३)

‘यज्ञके लिये अर्थात्‌ निःस्वार्थभावसे केवल दूसरोंके हितके लिये कर्म करनेवाले मनुष्यके सम्पूर्ण कर्म विलीन हो जाते हैं ।

रामायणमें आया है‒

परहित बस जिन्ह के मन माहीं ।
तिन्ह कहुँ जग दुर्लभ कछु नाहीं ॥

 (मानस, अरण्य॰ ३१/५)

पर हित सरिस धर्म नहिं भाई ।
पर पीड़ा सम नहिं अधमाई ॥

 (मानस, उत्तर॰ ४१/१)

दूसरोंका हित करनेसे कर्मयोग, ज्ञानयोग और भक्तियोग‒तीनों सिद्ध हो जाते हैं । सगुण और निर्गुण‒दोनोंकी प्राप्ति दूसरोंका हित करनेसे हो जाती है । गीताने सगुणकी प्राप्तिके लिये कहा है‒

ते प्राप्नुवन्ति मामेव सर्वभूतहिते रताः ॥ (५/२५)

‘जिनका शरीर मन-बुद्धि-इन्द्रियोंसहित वशमें है, जो सम्पूर्ण प्राणियोंके हितमें रत हैं, जिनके सम्पूर्ण संशय मिट गये हैं, जिनके सम्पूर्ण कल्मष (दोष) नष्ट हो गये हैं, वे विवेकी साधक निर्वाण ब्रह्मको (निर्गुणको) प्राप्त होते हैं ।’

हिन्दू, मुसलमान, ईसाई, पारसी, यहूदी आदि कोई भी क्यों न हो, यदि वह अपने सिद्धान्तोंका, नियमोंका पालन करते हुए त्याग करे अर्थात्‌ मिली हुई वस्तुको अपनी न माने तो उसका कल्याण हो जायगा । त्यागमें सब एक हो जाते हैं, कोई मतभेद नहीं रहता । जैसे कोई देवताओंका पूजन करता है, कोई ऋषियोंका पूजन करता है, कोई माँ-बापका पूजन करता है आदि-आदि । परन्तु नियम-पालनमें भिन्नता होनेपर भी दूसरोंके हितके लिये स्वार्थ और अभिमानका त्याग करनेमें सब एक हो जाते हैं । जिनमें अपने स्वार्थ और अभिमानके त्यागकी मुख्यता है, वे मत, सिद्धान्त, सम्प्रदाय, ग्रन्थ, व्यक्ति आदि महान् श्रेष्ठ होते हैं । परन्तु जिनमें अपने स्वार्थ और अभिमानकी मुख्यता है, वे मत, सिद्धान्त, ग्रन्थ व्यक्ति आदि महान्‌ निकृष्ट होते हैं ।

सबका हित करनेसे अपना हित मुफ्तमें, स्वाभाविक ही हो जाता है । इसलिये हमें कोई नया काम नहीं करना है, प्रत्युत अपना भाव बदलना है कि हमारी सम्पत्ति सबके लिये है । हम तो सम्पत्तिकी रक्षा करनेवाले हैं । जैसे आवश्यकता पड़नेपर हम अन्न, जल, वस्त्र आदि अपने काममें लेते हैं, ऐसे ही आवश्यकता पड़नेपर दूसरोंको भी अन्न, जल, वस्त्र, औषध दे दें । जैसे खुद आवश्यकताके अनुसार वस्तु लेते हैं, ऐसे ही दूसरोंको भी आवश्यकताके अनुसार दें ।

     (शेष आगेके ब्लॉगमें)

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शुक्रवार, 16 सितंबर 2016

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🌹 गीताका तात्पर्य :

(गत ब्लॉगसे आगेका)

इसलिये हरेक काममें परहितका भाव रखें । इसमें खर्चा तो बहुत थोड़ा है, पर लाभ बड़ा भारी है । थोड़ा खर्च यह है कि कोई अभावग्रस्त सामने आ जाय तो उसको थोड़ा-सा अन्न दे दो, थोड़ा-सा जल दे दो, थोड़ा-सा वस्त्र दे दो, थोड़ा-सा आश्रय दे दो, उसकी थोड़ी-सी सहायता कर दो । कभी खुद भूखे रहकर दूसरेको भोजन देनेका मौका भी आ जाय तो कोई बात नहीं । हम एकादशीव्रत करते हैं तो उस दिन भूखे रहते ही हैं । जब देशका विभाजन हुआ था, उस समय पाकिस्तानसे आये कई व्यक्तियोंको दस-दस रुपये देनेपर भी एक गिलास पानी नहीं मिला था । अतः सब समय अन्न-जलका मिलना कोई हाथकी बात नहीं है । कभी भूखा-प्यासा रहना ही पड़ता है । यदि दूसरेके हितके लिये भूखे-प्यासे रह जायँ तो कल्याण हो जाय !

इस प्रकार जो कुछ किया जाय, सबके हितके लिये किया जाय । कोई किसी भी धर्म, सम्प्रदाय, मत-मतान्तर, वर्ण, आश्रम आदिका हो, जो पक्षपात न रखकर सबके हितका भाव रखता है, उसका कल्याण हो जाता है ।

अयं निजः परो वेत्ति गणना लघुचेतसाम् ।

उदारचरितानां तु      वसुधैव कुटुम्बकम् ॥

 (पञ्च॰ अपरीक्षित॰ ३७)

‘यह अपना है और यह पराया है‒इस प्रकारका भाव संकुचित हृदयवाले मनुष्य करते हैं । उदार हृदयवाले मनुष्योंके लिये तो सम्पूर्ण विश्व ही अपना कुटुम्ब है ।’

तात्पर्य है कि उदार भाववाले मनुष्य सम्पूर्ण कार्य विश्वमात्रके हितके लिये ही करते हैं । रामायणमें आया है‒

उमा संत कइ इहई बड़ाई ।

मंद करत जो करइ भलाई ॥

 (मानस. सुन्दर॰ ४१/४)

जो अपना बुरा करता है, उसका भी सन्तलोग भला ही करते हैं । भगवान्‌ राम अंगदको रावणके पास भेजते समय कहते हैं कि शत्रुसे इस तरह बर्ताव करना, जिससे हमारा काम (सीताजीकी प्राप्ति) भी हो जाय और उसका हित भी हो‒

काजू हमार तासु हित होई ।

रिपु सन करेहु बतकही सोई ॥

 (मानस, लंका॰१७/४)

मनुष्यमें ऐसा उदारभाव त्यागसे आता है । इसलिये गीतामें त्यागकी बड़ी महिमा है ।त्यागसे तत्काल शान्ति मिलती है‒
‘त्यागाच्छान्तिरनन्तरम्’ (गीता १२/१२) ।
मनुष्य मल-मूत्र जैसी वस्तुका भी त्याग करता है तो उसको एक शान्ति मिलती है, चित्तमें प्रसन्नता होती है, शरीर हलका हो जाता है, नीरोगता आ जाती है । जब मैली-से-मैली वस्तुके त्यागका भी इतना माहात्म्य है, फिर अन्न-वस्त्र आदिका दूसरोंके हितके लिये त्याग किया जाय तो उसका कितना माहात्म्य होगा ! त्यागके विषयमें एक मार्मिक बात है कि जो वस्तु अपनी नहीं होती, उसीका त्याग होता है ! तात्पर्य यह है कि वस्तु अपनी नहीं है, पर भूलसे अपनी मान ली है, इस भूलका ही त्याग होता है । जैसे, जब हम मनुष्यशरीरमें आये थे, तब अपने साथ कुछ नहीं लाये थे, शरीर भी माँसे मिला था और जब हम जायँगे, तब अपने साथ कुछ नहीं ले जायँगे । परन्तु यहाँकी वस्तुओंको अपनी मानकर हम उसके मालिक बन जाते हैं । अतः उन वस्तुओंका मनसे त्याग करना है कि ये हमारी नहीं हैं, प्रत्युत सबकी हैं, जो कि वास्तविकता है । केवल इतनी-सी बातसे हमारा कल्याण हो जायगा । गीता कहती है‒

निर्ममो निरहंकारः स शान्तिमधिगच्छति ॥

  (२/७१)

अर्थात्‌ शरीरमें ‘मैं’-पन और वस्तुओंमें ‘मेरा’-पनका त्याग करनेसे शान्ति मिल जाती है, कल्याण हो जाता है ।

     (शेष आगेके ब्लॉगमें)

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गुरुवार, 15 सितंबर 2016

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🌟 गीताका तात्पर्य :

(गत ब्लॉगसे आगेका)

हमारी भारतीय संस्कृति बड़ी विलक्षण है, जो प्राणिमात्रका उद्धार चाहती है । राजस्थानमें मैंने देखा कि जब किसनालोग खेती करते हैं, तब पहले वे भगवान्‌से प्रार्थना करते हैं कि ‘पशुओंके भाग्यका, पक्षियोंके भाग्यका, चिड़ी-कमेड़ीके भाग्यका, अटाऊ-बटाऊके भाग्यका हमें देना महाराज !’ तात्पर्य है खेती केवल हमारे लिये नहीं है, प्रत्युत सबके लिये है, जब खेती पकती है, तब जो फल सबसे पहले आता है, उसको पहले अपने काममें नहीं लेते । पहले उसको मन्दिरमें या ब्राह्मणों अथवा साधुओंके पास भेजते हैं, फिर उसको काममें लेते हैं । ऐसे ही रसोई बनती है तो पहले अतिथि आदिको देकर फिर भोजन करते हैं । रसोई बननेके बाद ‘बलिवैश्वदेव’ करनेका विधान आता है । उसमें विश्वमात्रके लिये अन्न अर्पण किया जाता है । कोई मर जाता है तो उसके लिये श्राद्ध और तर्पण करते हैं । इतना ही नहीं, सम्पूर्ण जीवोंको, देवताओंको और ईश्वरको भी पिण्ड और पानी देते हैं । भगवान्‌में किसी कमीकी सम्भावना ही नहीं है । परन्तु जैसे बालक पिताकी ही चीज पिताको अर्पण करता है तो पिता प्रसन्न हो जाता है, ऐसे ही भगवान्‌की चीज भगवान्‌को अर्पण करनेसे भगवान्‌ प्रसन्न हो जाते हैं ।समुद्रको भी जल देते हैं और सूर्यको भी दीपक दिखाते हैं, आरती करते हैं । क्या समुद्रमें जलकी कमी है ? सूर्यमें प्रकाशकी कमी है ? उनमें कमी नहीं है, पर हमारा उदारभाव, सबकी सेवा करनेका भाव, सबको सुख पहुँचानेका भाव कल्याण करनेवाला है‒

सर्वे भवन्तुः सुखिनः       सर्वे सन्तु निरामयाः ।
सर्वे भद्राणि पशन्तु मा कश्चिद् दुःखभाग्भवेत् ॥

‒इसी बातको गीताने ‘सर्वभूतहिते रताः’ (५/२५, १२/४) पदोंसे कहा है । सबको देनेके बाद जो शेष बचता है, वह‘यज्ञशेष’ कहलाता है । गीता कहती है‒

यज्ञशिष्टाशिनः सन्तो मुच्यन्ते सर्वकिल्बिषैः ।
                                                    (३/१३)

‘यज्ञशेषग्रहण करनेवाले श्रेष्ठ मनुष्य सम्पूर्ण पापोंसे मुक्त हो जाते हैं ।’
यज्ञशिष्टामृतभुजो यान्ति ब्रह्म सनातनम् ॥
                                                   (४/३१)

‘यज्ञशेष अमृतको ग्रहण करनेवाले सनातन परब्रह्म परमात्माको प्राप्त होते हैं ।’

कर्मयोगी सब वस्तुओंको संसारके अर्पण करता है, ज्ञानयोगी प्रकृतिके अर्पण करता है और भक्तियोगी भगवान्‌के अर्पण करता है । किसीके भी अर्पण करो, पर अपने लिये मत मानो‒यह खास बात है । वास्तवमें वस्तु कल्याण करनेवाली नहीं है, प्रत्युत हमारा उदारभाव कल्याण करनेवाला है । यदि वस्तु कल्याण करनेवाली हो तो लखपति, करोड़पति या अरबपति तो अपना कल्याण कर लेंगे, पर साधारण आदमी अपना कल्याण नहीं कर सकेगा । परन्तु वास्तवमें कल्याण त्यागीका होता है, संग्रहीका नहीं । अतः इतना धन खर्च करनेसे कल्याण होगा, इतनी वस्तुओंको देनेसे कल्याण होगा‒यह बात है ही नहीं । कल्याण हमारे इस भावसे होगा कि सबका हित हो जाय, सब सुखी हो जायँ । भगवान्‌ क्रियाग्राही या वस्तुग्राही नहीं हैं, प्रत्युत भावग्राही हैं‒‘भावग्राही जनार्दनः ।’

    (शेष आगेके ब्लॉगमें)

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🌹 गीताका तात्पर्य :

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मान लें कि कोई सज्जन अपने लिये रसोई बनाता है । अचानक एक भिक्षु आता है और आवाज देता है तो वह सज्जन बड़े प्रेमसे उसको भिक्षा देता है । वह अन्न बड़ा शुद्ध होता है । परन्तु जब वह सज्जन रसोई अपनी थालीमें परोस लेता है, तब वह अन्न उतना शुद्ध नहीं रहता क्योंकि ‘मैं भोजन करूँगा’‒यह भाव आ गया । अब यदि भिक्षुक आता है तो उसको वह अन्न देनेमें संकोच होता है और भिक्षुकको लेनेमें संकोच होता है । फिर भी भिक्षुक उसमेंसे थोड़ा अन्न ले सकता है । परन्तु वह सज्जन भोजन करने बैठ गया और उसने ग्रास बना लिया तो वह अन्न पहले-जैसा शुद्ध नहीं रहा । अगर वह उस ग्रासको मुँहमें ले लेता है तो वह अशुद्ध, जूठन हो जाता है । जब वह उस ग्रासको निगल लेता है, तब (अपने लिये भोजन करनेसे) वह महान्‌ अशुद्ध हो जाता है । यदि किसी कारणसे उलटी हो जाय तो वह उलटी किया हुआ अन्न बड़ा अशुद्ध होता है । उलटी न हो तो वह महान्‌ अशुद्ध होकर मैला बन जाता है । परन्तु दूसरे दिन वह जंगलमें उस मैलेका त्याग कर देता है तो हवा, धूप, वर्षा आदिके कारण वह मैला समय लगनेपर स्वतः मिट्टीमें मिलकर मिट्टी ही बन जाता है और इतना शुद्ध हो जाता है कि पता ही नहीं लगता कि मैलापन कहाँ था ! वह मिट्टी दूसरी वस्तुओं (बर्तन आदि) को भी शुद्ध कर देती है । यह त्यागका ही माहात्म्य है ! इस प्रकार अपने लिये बनाने-खानेसे शुद्ध वस्तु भी महान्‌ अशुद्ध हो जाती है और त्याग करनेसे महान्‌ अशुद्ध वस्तु (मल-मूत्र) भी शुद्ध हो जाती है । अतः जिस-जिस वस्तुको हम स्वार्थवश अपनी और अपने लिये मानते हैं, उस-उस वस्तुको हम अशुद्ध कर देते हैं । कारण कि संसारकी वस्तुएँ सबके लिये हैं, उनमें सबका हिस्सा है । गीता कहती है‒

भुञ्जते ते त्वघं पापा ये पचन्त्यात्मकारणात् ॥
                     (३/१३)

‘जो केवल अपने लिये ही पकाते हैं, वे पापीलोग तो केवल पापका ही भक्षण करते हैं ।’

हमारे पास जो चीज है, वह सबके लिये है, केवल हमारे लिये नहीं है‒इस उदारभावसे बड़ी शान्ति मिलती है । रसोई बननेपर कोई भूखा आ जाय, अतिथि आ जाय, भिक्षुक आ जाय, कुत्ता आदि आ जाय तो शक्तिके अनुसार उनको भी दे दें । वे सब-का-सब माँगे तो उनसे कह सकते हैं कि ‘भाई, सब कैसे दे दें, हमें भी तो लेना है, आप अपना हिस्सा ले लो !’ हम दूसरेको भोजन तो करा सकते हैं, पर उसकी इच्छापूर्ति कभी नहीं कर सकते । इतना ही नहीं, संसारके सब लोग मिलकर भी एक आदमीकी इच्छापूर्ति नहीं कर सकते‒

यत् पृथिव्यां व्रीहियवं हिरण्यं पशवः स्त्रियः ।
न दुह्यन्ति मनःप्रीतिं    पुंसः कामहतस्य ते ॥

          (श्रीमद्भा॰ ९/१९/१३)

‘पृथ्वीपर जितने भी धान्य, स्वर्ण, पशु और स्त्रियाँ हैं, वे सब-के-सब मिलकर भी उस पुरुषके मनको सन्तुष्ट नहीं कर सकते, जो कामनाओंके प्रहारसे जर्जर हो रहा है ।’

    (शेष आगेके ब्लॉगमें)

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मंगलवार, 13 सितंबर 2016

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🌟 गीताका तात्पर्य :

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व्यवहार करते हुए तत्त्वज्ञान हो जाय, भगवद्भक्ति हो जाय, योगका अनुष्ठान हो जाय, लययोग, राजयोग, मन्त्रयोग आदि योगोंकी प्राप्ति हो जाय‒ऐसी विलक्षण विद्या गीताने बतायी है ! वह विलक्षण विद्या क्या है‒इसको बतानेकी चेष्टा की जाती है । हम जो-जो व्यवहार करते हैं, उसमें अपने स्वार्थ और अभिमानका आग्रह छोड़कर सबके हितकी दृष्टिसे कार्य करें, हितकी दृष्टिसे कार्य करनेका तात्पर्य है कि वर्तमानमें भी हित हो और भविष्यमें भी हित हो, हमारा भी हित हो और दूसरे सबका भी हित हो‒ऐसी दृष्टि रखकर कार्य करे । ऐसा करनेसे बड़ी सुगमतासे परमात्मतत्त्वकी प्राप्ति हो जायगी । एकान्तमें रहकर वर्षोंतक साधना करनेपर ऋषि-मुनियोंको जिस तत्त्वकी प्राप्ति होती थी, उसी तत्त्वकी प्राप्ति गीताके अनुसार व्यवहार करते हुए हो जायगी । सिद्धि-असिद्धिमें सम रहकर कर्म करना ही गीताके अनुसार व्यवहार करना है । गीता कहती है‒

सुखदुःखे समे कृत्वा लाभालाभौ जयाजयौ ।

ततो युद्धाय युजय्स्व नैवं पापमवाप्स्यसि ॥

            (२/३८)

‘जय-पराजय, लाभ-हानि और सुख-दुःखको समान करके फिर युद्धमें लग जा । इस प्रकार युद्ध करनेसे तू पापको प्राप्त नहीं होगा ।’

योगस्थः  कुरु  कर्माणि      संग  त्यक्ता  धनञ्जय ।

सिद्ध्यसिद्ध्योः समो भूत्वा समत्वं योग उच्यते ॥

             (२/४८)

‘हे धनञ्जय ! तू आसक्तिका त्याग करके सिद्धि-असिद्धिमें सम होकर योगमें स्थित हुआ कर्मोंको कर; क्योंकि समत्व ही योग कहा जाता है ।’

संसारका स्वरूप है‒क्रिया और पदार्थ ।परमात्म-तत्त्वकी प्राप्तिके लिये क्रिया और पदार्थसे सम्बन्ध-विच्छेद करना आवश्यक है ।इसके लिये गीताने कर्मयोग, ज्ञानयोग और भक्तियोग‒तीनों ही योगोंकी दृष्टिसे क्रिया और पदार्थोंसे सम्बन्ध-विच्छेद करनेकी युक्ति बतायी है; जैसे‒कर्मयोगी क्रिया और पदार्थमें आसक्तिका त्याग करके उनको दूसरोंके हितमें लगाता है*; ज्ञानयोगी क्रिया और पदार्थसे असंग होता है† और भक्तियोगी क्रिया और पदार्थ भगवान्‌के अर्पण करता है‡ । सम्पूर्ण क्रियाओं और पदार्थोंको भगवान्‌के अर्पण करनेसे मनुष्य सुगमतापूर्वक संसार-बन्धनसे मुक्त होकर भगवान्‌को प्राप्त हो जाता है । भगवान्‌के अर्पण करनेसे क्रियाएँ और वस्तुएँ नहीं रहेगी‒यह बात नहीं है, प्रत्युत वे महान्‌ पवित्र हो जायँगी । जैसे भक्तलोग भगवान्‌को भोग लगाते हैं तो भोग लगायी हुई वस्तु वैसी-की-वैसी ही मिलती है, कम नहीं होती, पर वह वस्तु महान्‌ पवित्र हो जाती है । इसी तरहसंसारमें भी हम जिस वस्तुको अपनी न मानकर दूसरोंकी सेवाके लिये मानते हैं, वह वस्तु महान्‌ पवित्र हो जाती है और जिस वस्तुको हम केवल अपने लिये ही मानते हैं, वह वस्तु महान्‌ अपवित्र हो जाती है ।

    (शेष आगेके ब्लॉगमें)

‒ ‘जित देखूँ तित तू’ पुस्तकसे
                             
 *यदा हि नेन्द्रियार्थेषु  न कर्मस्वनुषज्जते ।                                                  सर्वसङ्कल्पसंन्यासी योगारूढस्तदोच्यते ॥
          ‘जिस समय न इन्द्रियोंके भोगोंमें तथा न कर्मोंमें ही आसक्त होता है, उस समय वह सम्पूर्ण संकल्पोंका त्यागी मनुष्य योगारूढ़ कहा जाता है ।
                                               
† तत्त्ववित्तु महाबाहो गुणकर्मविभागयोः ।
                                               
गुणा गुणेषु वर्तन्त इति मत्वा न सज्जते ॥

       ‘हे महाबाहो ! गुण-विभाग और कर्म-विभागको तत्त्वसे जाननेवाला महापुरुष ‘सम्पूर्ण गुण ही गुणोंमें बरत रहे हैं’‒ऐसा मानकर उनमें आसक्त नहीं होता ।’
 
‡ पत्रं पुष्पं फलं तोयं यो मे भक्त्या प्रयच्छति
                                                 
तदहं भक्त्युपहृतमश्नामि           प्रयतात्मनः ॥

यत्करोषि यदश्नासि  यज्जुहोषि ददासि यत् ।
                                                  यत्तपस्यसि कौन्तेय         तत्कुरुष्व मदर्पणम् ॥

         ‘जो भक्त पात्र, पुष्प, फल, जल आदि (यथासाध्य प्राप्त वस्तु) को भक्तिपूर्वक मेरे अर्पण करता है, उस मेरेमें तल्लीन हुए अन्तःकरणवाले भक्तके द्वारा भक्तिपूर्वक दिये हुए उपहार (भेंट) को मैं ख लेता हूँ ।’

           ‘हे कुन्तीपुत्र ! तू जो कुछ करता है, जो कुछ खाता है, जो कुछ यज्ञ करता हा और जो कुछ तप करता है, वह सब मेरे अर्पण कर दे ।’

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सोमवार, 12 सितंबर 2016

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🌟 गीताका तात्पर्य :

(गत ब्लॉगसे आगेका)

इसी तरह ईश्वरके विषयमें कई कहते हैं कि यह सगुण है, कई कहते हैं कि यह निर्गुण है, कई कहते हैं कि यह साकार है, कई कहते हैं कि यह निराकार है कई कहते हैं कि यह द्विभुज है, कई कहते हैं कि यह चतुर्भुज है, कई कहते हैं कि यह सहस्रभुज है, कई कहते हैं कि यह विराट्‌रूप है । कई कहते हैं कि यह व्यक्त है, कई कहते हैं कि यह अव्यक्त है, कई कहते हैं कि यह अवतार लेता है, कई कहते हैं कि यह अवतार नहीं लेता; आदि-आदि । इसी तरह जगत्‌के विषयमें कई कहते हैं कि यह अनादि और अनन्त है, कई कहते हैं कि यह अनादि और सान्त है, कई कहते हैं कि यह अनादि और परिवर्तनशील अर्थात्‌ प्रवाहरूपसे रहनेवाला है आदि-आदि । गीताने इन सब वाद-विवादोंमें न पड़कर सीधी बात बतायी है कि तुम्हारे सामने दीखता है, यह ‘जगत्’ है । हरेक मनुष्यको ‘मैं हूँ’‒ऐसा अनुभव होता है, यह‘जीव’ है । जो जड़-चेतन, अपर-परा सबका स्वामी है, वह ‘ईश्वर’ है* । गीताकी इस बातमें सभी दार्शनिक एकमत हैं । इसमें भी एक विलक्षण बात है कि यदि कोई ईश्वरको न माने तो भी गीताके अनुसार चलनेसे उसका कल्याण हो जायगा† !

गीताने व्यवहारमें परमार्थकी विलक्षण कला बतायी है, जिससे प्रत्येक मनुष्य प्रत्येक परिस्थितिमें रहते हुए, निषिद्धरहित सब तरहका व्यवहार करते हुए भी अपना कल्याण कर सके‡ । दूसरे ग्रन्थ तो प्रायः यह कहते हैं कि अगर अपना कल्याण चाहते हो तो सब कुछ त्यागकर साधु हो जाओ; क्योंकि व्यवहार और परमार्थ‒दोनों एक साथ नहीं होंगे । परन्तु गीता कहती है कि आप जहाँ हैं, जिस मतको मानते हैं, जिस सिद्धान्तको मानते हैं, जिस धर्म, सम्प्रदाय आदिको मानते हैं, उसीको मानते हुए गीताके अनुसार चलो तो कल्याण हो जायगा । तात्पर्य है कि कोई भी मनुष्य चाहे हिन्दू हो, चाहे मुसलमान हो, चाहे ईसाई हो, चाहे यहूदी हो, चाहे पारसी हो, वह किसी भी मतका अनुसरण करनेवाला हो, किसी भी सिद्धान्तको माननेवाला हो, यदि उसका उद्देश्य अपना कल्याण करनेका है तो उसको भी गीतामें अपने कल्याणकी पूरी सामग्री मिल जायगी ।

(शेष आगेके ब्लॉगमें)

‒ ‘जित देखूँ तित तू’ पुस्तकसे

        *न त्वेवाहं जातु नासं न त्वं नेमे जनाधिपाः ।

   न चैव न भविष्यामः      सर्वे वयमतः परम् ॥  (२/१२)              
किसी कालमें मैं नहीं था और तू नहीं था तथा ये राजालोग नहीं थे‒यह बात भी नहीं है और इसके बाद ये सभी (मैं, तू और राजालोग) नहीं रहेंगे‒यह बात भी नहीं है ।’

द्वाविमौ पुरुषौ लोके     क्षरश्चाक्षर एव च ।

क्षरः सर्वाणि भूतानि कूटस्थोऽक्षर उच्यते ॥

उत्तमः पुरुषस्त्वन्यः     परमात्मेत्युधाहृतः ।

यो लोकत्रयमाविश्य   बिभर्त्यव्यय ईश्वरः ॥

यस्मात्क्षरमतीतोऽहमक्षरादपि     चोत्तमः ।

अतोऽस्मि लोके वेदे च प्रथितः पुरुषोत्तमः ॥
                    (गीता १५/१६-१८)

इस संसारमें क्षर (नाशवान्‌) और अक्षर (अविनाशी)‒ये दो प्रकारके पुरुष हैं । सम्पूर्ण प्राणियोंके शरीर नाशवान्‌ और कूटस्थ (जीवात्मा) अविनाशी कहा जाता है । उत्तम पुरुष तो अन्य ही है, जो परमात्मा नामसे कहा गया है । वही अविनाशी ईश्वर तीनों लोकोंमें प्रविष्ट होकर सबका भरण-पोषण करता है । मैं क्षरसे अतीत हूँ और अक्षरसे भी उत्तम हूँ, इसलिये लोकमें और वेदमें पुरुषोत्तम नामसे प्रसिद्द हूँ ।’

                       † देवान्भावयतानेन ते देवा भावयन्तु वः ।

परस्परं भावयन्तः   श्रेयः परमवाप्स्यथ ॥
                        (गीता ३/११)

अपने कर्तव्य-कर्मके द्वारा तुमलोग देवताओंको उन्नत करो और वे देवातालोग अपने कर्तव्यके द्वारा तुमलोगोंको उन्नत करें । इस प्रकार एक-दूसरेको उन्नत करते हुए तुमलोग परम कल्याणको प्राप्त हो जाओगे ।’

स्वे स्वे कर्मण्यभिरतः संसिद्धिं लभते नरः ।
                         (गीता १८/४५)

‘अपने-अपने कर्तव्यमें तत्परतापूर्वक लगा हुआ मनुष्य सम्यक् सिद्धि (परमात्मा) को प्राप्त कर लेता है ।’

‡सर्वकर्माण्यपि सदा कुर्वाणो मद्‌व्यपाश्रयः ।

   मत्प्रसादादवाप्नोति      शाश्वतं  पदमव्ययम् ॥
                          (गीता १८/५६)

‘मेरा आश्रय लेनेवाला भक्त सदा सब विहित कर्म करते हुए भी मेरी कृपासे शाश्वत अविनाशी पदको प्राप्त हो जाता है ।’

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