गुरुवार, 29 सितंबर 2016

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🌟 सत्संगकी महिमा :

प्रथम भगति संतन्ह कर संगा ।

(मानस ३/३४/४)

           सन्त-महात्माओंका संग पहली भक्ति है ।

भक्ति सुतंत्र सकल सुख खानी ।
बिनु सतसंग न पावहिं प्रानी ॥

(मानस ७/४४/३)

           भक्ति स्वतन्त्र है, सम्पूर्ण सुखोंकी खान है । कहते हैं‒

सतसंगत    मुद      मंगल    मूला ।
सोई फल सिधि सब साधन फूला ॥

 (मानस १/२/४)

          सम्पूर्ण मंगलोंकी मूल सत्संगति है । वृक्षमें पहिले मूल होता है और अन्तिम लक्ष्य फल होता है । सत्संगति मूल भी है और फल भी है । जितने अन्य साधन हैं सब फूल-पत्ती हैं, जो मूल और फलके बीचमें रहनेवाली चीजें हैं । सत्संगतिमें ही सब साधन आ जाते हैं । इसलिये सत्संगकी बड़ी भारी महिमा है । सुन्दरदासजी महाराज कहते हैं‒

सन्त समागम करिये भाई ।
यामें बैठो  सब मिल आई ॥

           सन्त-समागम करना चाहिये । यह नौकाकी तरह है, इसमें बैठकर पार हो जायेंगे । सत्संग चन्दनकी तरह पवित्र बना दे और पारसरूपी सत्संगसे कंचन-जैसा हो जाय‒ऐसा सत्संग है । आगे सुन्दरदासजी महाराज फिर कहते हैं‒

और उपाय नहीं तिरने का, सुन्दर काढहि राम दुहाई ।

         रामजीकी सौगन्ध दे दी कि कल्याणका और कोई उपाय नहीं है । यह अचूक उपाय है । इसलिये सत्संगमें जाकर बैठ जाएँ तो निहाल हो जायें । सत्‌का संग करो । जहाँ भगवान्‌की चर्चा हो, सत्‌-चर्चा हो, सत्‌-चिन्तन हो, सत्कर्म हो और सत्संग हो तो सत्‌के साथ सम्बन्ध हो जाय । बस, इससे निहाल हो जाय जीव ।

        जीवको जितने दुःख आते हैं, सब असत्‌के संगसे आते हैं और अविनाशीका संग करते ही स्वतः निहाल हो जाता है, क्योंकि वह भगवान्‌का अंश है ।

ईश्वर अंस     जीव अबिनासी ।
चेतन अमल सहज सुखरासी ॥

 (मानस ७/११६/१)

           अतः सत्संगसे, सत्‌का प्रेम होनेसे सत्‌ प्राप्त हो जाता है । सत्संग मिल जाय, परमात्माका संग मिल जाय तो निहाल हो जाय । सत्‌से जहाँ सम्बन्ध होता है, वह सत्संग है । भगवान्‌के साथ जो संग है, वह सत्संग है । असली संग होता है असत्‌के त्यागसे । वैसे असत्‌के द्वारा भी सत्संगमें सहायता होती है, जैसे सत्‌-चर्चा करते हैं तो बिना वाणीसे कैसे करें ? सत्कर्म करते हैं तो बिना बाहरी क्रियासे सत्कर्म कैसे करें ? सत्‌-चिन्तन करते हैं तो मनके बिना कैसे करें ? पर सत्संगमें दूसरा नहीं है; अपने-आपहीमें मिल जाय, तल्लीन हो जाय । सत्संग, सत्‌-चिन्तन, सत्कर्म, सत्‌-चर्चा और सद्‌ग्रन्थोंका अवलोकन ‒इन सबका उद्देश्य सत्संग है । सत्‌की प्राप्तिके लिये असत्‌को दूर कर दे तो सत्संगका उद्देश्य पूरा हो जाता है ।

           ‘सनमुख होइ जीव मोहि जबहीं ।’
असत्‌से विमुख होनेपर सत्‌का संग हो जाता है । राग, द्वेष, इर्षा आदिका जो कूड़ा-करकट भीतरमें भरा है, यह सत्संग नहीं होने देता । ऐसा मालूम होता है कि मनुष्य चाहे तो इनका त्याग कर सकता है; परन्तु फिर भी इसे कठिनता मालूम देती है; कबतक ? जबतक पक्का विचार न हो जाय । पक्का विचार करनेपर यह कठिनता नहीं रहती । चाहे जो हो, हमें तो इधर ही चलना है, पक्का विचार हो जाय, फिर सुगमता हो जाती है ।

     (शेष आगेके ब्लॉगमें)

‒ ‘जीवनोपयोगी प्रवचन’ पुस्तकसे

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🌟 भक्तशिरोमणि श्रीहनुमान्‌जीकी दास्य-रति :

(गत ब्लॉगसे आगेका)

जब बहुत आग्रह किया, तब हनुमान्‌जी वहाँसे चले गये और छतपर जाकर बैठ गये । वहाँ बैठकर उन्होंने लगातार चुटकी बजाना शुरू कर दिया; क्योंकि रामजीको न जाने कब जम्हाई आ जाय ! यहाँ रामजीको ऐसी जम्हाई आयी कि उनका मुख खुला ही रह गया, बन्द हुआ ही नहीं ! यह देखकर सीताजी बड़ी व्याकुल हो गयीं कि न जाने रामजीको क्या हो गया है ! भरतादि सभी भाई आ गये । वैद्योंको बुलाया गया तो वे भी कुछ कर नहीं सके । वशिष्ठजी आये तो उनको आश्चर्य हुआ कि ऐसी चिन्ताजनक स्थितिमें हनुमान्‌जी दिखायी नहीं दे रहे हैं ! और सब तो यहाँ हैं, पर हनुमान्‌जी कहाँ है ? खोज करनेपर हनुमान्‌जी छतपर चुटकी बजाते हुए मिले । उनको बुलाया गया और वे रामजीके पास आये तो चुटकी बजाना बन्द करते ही रामजीका मुख स्वाभाविक स्थितिमें आ आया ! अब सबकी समझमें आया कि यह सब लीला हनुमान्‌जीकी चुटकी बजानेके कारण ही थी ! भगवान्‌ने यह लीला इसलिये की थी कि जैसे भूखेको अन्न देना ही चाहिये, ऐसे ही सेवाके लिये आतुर हनुमान्‌जीको सेवाका अवसर देना ही चाहिये, बन्द नहीं करना चाहिये । फिर भरतादि भाइयोंने ऐसा आग्रह नहीं रखा । तात्पर्य है कि संयोग-रति और वियोग-रति‒दोनोंमें ही हनुमान्‌जी भगवान्‌की सेवा करनेमें तत्पर रहते हैं ।

         इस प्रकार हनुमान्‌जीका दास्य, सख्य, वात्सल्य तथा माधुर्य-भाव बहुत विलक्षण है ! इस कारण हनुमान्‌जीकी ऐसी विलक्षण महिमा है कि संसारमें भगवान्‌से भी अधिक उसका पूजन होता है । जहाँ भगवान्‌ श्रीरामके मन्दिर हैं, वहाँ तो उनके साथ हनुमान्‌जी विराजमान हैं ही, जहाँ भगवान्‌ श्रीरामके मन्दिर नहीं हैं, वहाँ भी हनुमान्‌जीके स्वतन्त्र मन्दिर हैं । उनके मन्दिर प्रत्येक गाँव और शहरमें, जगह-जगह मिलते हैं । केवल भारतमें ही नहीं, प्रत्युत विदेशोंमें भी हनुमान्‌जीके अनेक मन्दिर हैं । इस प्रकार वे रामजीके साथ भी पूजित होते हैं और स्वतन्त्र रूपसे भी पूजित होते हैं । इसलिये कहा गया है‒

मोरे मन प्रभु   अस बिस्वासा ।
राम ते अधिक राम कर दासा ॥

(मानस ७/१२०/८)

          भगवान्‌ शंकर कहते हैं‒

हनुमान्‌ सम    नाहिं बड़भागी ।
नहीं कोउ राम चरन अनुरागी ॥
गिरजा जासु     प्रीति सेवकाई ।
बार बार प्रभु   निज मुख गाई ॥
                                                 (मानस ७/५०/४-५)

          स्वयं भगवान्‌ श्रीराम हनुमान्‌जीसे कहते हैं‒

मदङ्गे जीर्णतां यातु      यत् त्वयोपकृतं कपे ।
नरः प्रत्युपकाराणामापत्स्वायाति पात्रताम् ॥
                                                 (वाल्मीकि॰ उत्तर॰ ४०/२४)

          ‘कपिश्रेष्ठ ! मैं तो यही चाहता हूँ कि तुमने जो-जो उपकार किये हैं, वे सब मेरे शरीरमें ही पच जायँ ! उनका बदला चुकानेका मुझे कभी अवसर न मिले; क्योंकि उपकारका बदला पानेका अवसर मनुष्यको आपत्तिकालमें ही मिलता है (मैं नहीं चाहता कि तुम कभी संकटमें पड़ो और मैं तुम्हारे उपकारका बदला चुकाऊँ) ।’

नारायण ! नारायण !! नारायण !!!

‒ ‘कल्याण-पथ’ पुस्तकसे

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मंगलवार, 27 सितंबर 2016

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🌟 भक्तशिरोमणि श्रीहनुमान्‌जीकी दास्य-रति :

(गत ब्लॉगसे आगेका)

हनुमान्‌जीकी वियोग-रति भी विचित्र ही है । लौकिक अथवा पारमार्थिक जगत्‌में कोई भी व्यक्ति अपने इष्टका वियोग नहीं चाहता । परन्तु भगवान्‌का कार्य करनेके लिये तथा उनका निरन्तर स्मरण करनेके लिये, उनका गुणानुवाद (लीला-कथा) सुननेके लिये हनुमान्‌जी भगवान्‌से वियोग-रतिका वरदान माँगते हैं‒

यावद् रामकथा वीर   चरिष्यति महीतले ।
तावच्छरीरे वत्स्यन्तु प्राणा मम न संशयः ॥

(वाल्मीकि॰उत्तर॰४०/१७)

         ‘वीर श्रीराम ! इस पृथ्वीपर जबतक रामकथा प्रचलित रहे, तबतक निःसन्देह मेरे प्राण इस शरीरमें ही बसे रहें ।’

           कोई प्रेमास्पद भी अपने प्रेमीसे वियोग नहीं चाहता । परन्तु भगवान्‌ श्रीराम जब परमधाम पधारने लगे, तब वे भक्तोंकी सहायता, रक्षाके लिये हनुमान्‌जीको इस पृथ्वीपर ही रहनेकी आज्ञा देते हैं । यह भी एक विशेष बात है ! भगवान्‌ कहते हैं‒

जीविते कृतबुद्धिस्त्वं मा प्रतिज्ञां वृथा कृथाः ।
मत्कथाः प्रचरिष्यन्ति   यावल्लोके हरिश्वर ॥
तावद् रमस्व सुप्रीतो    मद्वाक्यमनुपालयन् ।
एवमुक्तस्तु हनुमान्‌       राघवेण महात्मना ॥
वाक्यं विज्ञापयामास        परं हर्षमवाप च ।

 (वाल्मीकि॰उत्तर॰ १०८/३३-३५)

        ‘हरीश्वर ! तुमने दीर्घकालतक जीवित रहनेका निश्चय किया है । अपनी इस प्रतिज्ञाको व्यर्थ न करो । जबतक संसारमें मेरी कथाओंका प्रचार रहे, तबतक तुम भी मेरी आज्ञाका पालन करते हुए प्रसन्नतापूर्वक विचरते रहो । महात्मा श्रीरघुनाथजीके ऐसा कहनेपर हनुमान्‌जीको बड़ा हर्ष हुआ और वे इस प्रकार बोले‒’

यावत्‌ तव कथा लोके    विचरिष्यति पावनी ॥
तावत् स्थास्यामि मेदिन्यां तवाज्ञामनुपलयन् ।
                                                 (वाल्मीकि॰ उत्तर॰ १०८/३५-३६)

            इसलिये हनुमान्‌जीके लिये आया है‒‘राम चरित सुनिबे को रसिया ।’

        एक बार भरत, लक्ष्मण और शत्रुघ्न‒तीनों भाइयोंने माता सीताजीसे मिलकर विचार किया कि हनुमान्‌जी हमें रामजीकी सेवा करनेका मौका ही नहीं देते, पूरी सेवा अकेले ही किया करते हैं । अतः अब रामजीकी सेवाका पूरा काम हम ही करेंगे, हनुमान्‌जीके लिये कोई काम नहीं छोड़ेंगे । ऐसा विचार करके उन्होंने सेवाका पूरा काम आपसमें बाँट लिया । जब हनुमान्‌जी सेवाके लिये सामने आये, तब उनको रोक दिया और कहा कि आजसे प्रभुकी सेवा बाँट दी गयी है, आपके लिये कोई सेवा नहीं है । हनुमान्‌जीने देखा कि भगवान्‌के जम्हाई (जम्भाई) आनेपर चुटकी बजानेकी सेवा किसीने भी नहीं ली है । अतः उन्होंने यही सेवा अपने हाथमें ले ली । यह सेवा किसीके खयालमें ही नहीं आयी थी ! हनुमान्‌जीमें प्रभुकी सेवा करनेकी लगन थी । जिसमें लगन होती है, उसको कोई-न-कोई सेवा मिल ही जाती है । अब हनुमान्‌जी दिनभर रामजीके सामने ही बैठे रहे और उनके मुखकी तरफ देखते रहे; क्योंकि रामजीको किस समय जम्हाई आ जाय, इसका क्या पता ? जब रात हुई, तब भी हनुमान्‌जी उसी तरह बैठे रहे । भरतादि सभी भाइयोंने हनुमान्‌जीसे कहा कि रातमें आप यहाँ नहीं बैठ सकते, अब आप चले जायँ । हनुमान्‌जी बोले कैसे चला जाऊँ ? रातको न जाने कब रामजीको जम्हाई आ जाय !

   (शेष आगेके ब्लॉगमें)

‒ ‘कल्याण-पथ’ पुस्तकसे

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सोमवार, 26 सितंबर 2016

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🌟 भक्तशिरोमणि श्रीहनुमान्‌जीकी दास्य-रति :

(गत ब्लॉगसे आगेका)

         सभी रतियोंकी दो अवस्थाएँ मानी गयी हैं—संयोग (सम्भोग) और वियोग (विप्रलम्भ) । संयोग-रतिमें पत्नी भोजनादिके द्वारा पतिकी सेवा करती है और वियोग-रतिमें (पतिके दूर होनेसे) वह पतिका स्मरण-चिन्तन करती है । वियोग-रतिमें प्रेमास्पदकी निरन्तर मानसिक सेवा होती है । अतः संयोग-रतिकी अपेक्षा वियोग-रतिको श्रेष्ठ माना गया है । चैतन्य महाप्रभुने भी इस वियोग-रतिका विशेष आदर किया है । इसमें भी ‘परकीया माधुर्य-रति’ की वियोगावस्था सबसे ऊँची है, जिसमें प्रेमी और प्रेमास्पदमें नित्ययोग रहता है । प्रेम-रसकी वृद्धिके लिये इस नित्ययोगमें चार अवस्थाएँ होती हैं‒

           १-नित्ययोगमें योग

           २-नित्ययोगमें वियोग

           ३- वियोगमें नित्ययोग

           ४-वियोगमें वियोग

       प्रेमी और प्रेमास्पदका परस्पर मिलन होना ‘नित्ययोगमें योग’ है । प्रेमास्पदसे मिलन होनेपर भी प्रेमीमें यह भाव आ जाता है कि प्रेमास्पद कहीं चले गये हैं‒यह ‘नित्ययोगमें वियोग’ है । प्रेमास्पद सामने नहीं हैं, पर मनसे उन्हींका गाढ़ चिन्तन हो रहा है और वे मनसे प्रत्यक्ष मिलते हुए दिख रहे हैं‒यह ‘वियोगमें नित्ययोग’ है ।प्रेमास्पद थोड़े समयके लिये सामने नहीं आये, पर मनमें ऐसा भाव है कि उनसे मिले बिना युग बीत गया‒यह ‘वियोगमें वियोग’ है । वास्तवमें इन चारों अवस्थाओंमें प्रेमास्पदके साथ नित्ययोग ज्यों-का-त्यों बना रहता है, वियोग कभी होता ही नहीं, हो सकता ही नहीं और होनेकी सम्भावना भी नहीं । प्रेमका आदान-प्रदान करनेके लिये ही प्रेमी और प्रेमास्पदमें संयोग-वियोगकी लीला हुआ करती है ।

     हनुमान्‌जीमें संयोग-रति और वियोग-रति‒दोनों ही विलक्षणरूपसे विद्यमान हैं ।संयोगकालमें वे भगवान्‌की सेवामें ही रत रहते हैं और वियोगकालमें भगवान्‌के स्मरण-चिन्तनमें डूबे रहते हैं । संयोग-रतिमें प्रेमी खुद भी सुख लेता है; जैसे पतिको सुख देनेके साथ-साथ पत्नी खुद भी सुखका अनुभव करती है । परन्तु हनुमान्‌जीकी संयोग-रतिमें किंचिन्मात्र भी अपना सुख नहीं है । केवल भगवान्‌के सुखमें ही उनका सुख है‒‘तत्सुखे सुखित्वम्’ । वे तो भगवान्‌को सुख पहुँचाने, उनकी सेवा करनेके लिये सदा आतुर रहते हैं, छटपटाते रहते हैं‒

राम काज करिबे को आतुर । (हनुमानचालीसा)

राम काजू कीन्हें बिनु मोही कहाँ बिश्राम ॥ (मानस ५/१)

      एक बार सुबह हनुमान्‌जीको भूख लग गयी तो वे माता सीताजीके पास गये और बोले कि माँ ! मेरेको भूख लगी है, खानेके लिये कुछ दो । सीताजीने कहा कि बेटा ! मैंने अभीतक स्नान नहीं किया है । तुम ठहरो, मैं अभी स्नान करके भोजन देती हूँ । सीताजीने स्नान करके श्रृंगार किया । उनकी माँगमें सिन्दूर देखकर सहज सरल हनुमान्‌जीने पूछा कि माँ ! आपने यह सिन्दूर क्यों लगाया है ? सीताजीने कहा कि बेटा ! इसको लगानेसे तुम्हारे स्वामीकी आयु बढ़ती है । ऐसा सुनकर हनुमान्‌को विचार आया कि अगर सिन्दूरकी एक रेखा खींचनेसे रामजीकी आयु बढ़ती है, तो फिर पूरे शरीरमें सिन्दूर लगानेसे उनकी आयु कितनी बढ़ जायगी ! सीताजी रसोईमें गयीं तो हनुमान्‌जी श्रृंगार कक्षमें चले गये और उन्होंने सिन्दूरकी डिबियाको नीचे पटक दिया । सब सिन्दूर नीचे बिखर गया और हनुमान्‌जी वह सिन्दूर अपने पूरे शरीरपर लगा लिया ! अब मेरे प्रभुकी आयु खूब बढ़ जायगी‒ऐसा सोचकर हनुमान्‌जी बड़े हर्षित हो गये और भूख-प्यासको भूलकर सीधे रामजीके दरबारमें पहुँच गये ! उनको इस वेशमें देखकर सभी हँसने लगे । रामजीने पूछा कि हनुमान्‌ ! आज तुमने अपने शरीरपर सिन्दूरका लेप कैसे कर लिया ? हनुमान्‌जी बोले कि प्रभो ! माँके थोड़ा-सा सिन्दूर लगानेसे आपकी आयु बढ़ती है‒ऐसा जानकर मैंने पूरे शरीरपर ही सिन्दूर लगाना शुरू कर दिया है, जिससे आपकी आयु खूब खूब बढ़ जाय !रामजीने कहा कि बहुत अच्छा ! अब आगेसे जो भक्त तुम्हारेको तेल और सिन्दूर चढ़ायेगा, उसपर मैं बहुत प्रसन्न होऊँगा !

    (शेष आगेके ब्लॉगमें)

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रविवार, 25 सितंबर 2016

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 (गत ब्लॉगसे आगेका)

        माधुर्य-रतिके दो भेद हैं‒स्वकीया और परकीया । ‘स्वकीया माधुर्य-रति’ में पति-पत्नीके सम्बन्धका भाव रहता है । पतिव्रता स्त्री अपने माता, पिता, भाई, कुल आदि सबका त्याग करके अपने-आपको पतिकी सेवामें अर्पित कर देती है । इतना ही नहीं, वह अपने गोत्रका भी त्याग करके पतिके गोत्रकी बन जाती है* । अपना तन, मन, धन, बल, बुद्धि आदि सब कुछ पतिके अर्पण करके सर्वथा पतिके परायण हो जाती है । उसमें दास्य, सख्य, वात्सल्य और माधुर्य‒सभी भाव विद्यमान रहते हैं ।वह दासीकी तरह पतिकी सेवा करती है, मित्रकी तरह पतिको उचित सलाह देती है और माताकी तरह भोजन, वस्त्र आदिसे पतिका पालन करती है तथा उसके सुख-आरामका खयाल रखती है† ।

       ‘परकीया माधुर्य-रति’ में अपनी पत्नीसे भिन्न स्त्री (परनारी) के सम्बन्धका और अपने पतिसे भिन्न पुरुष (परपुरुष या उपपति) के सम्बन्धका भाव रहता है । यद्यपि लौकिक दृष्टिसे यह सम्बन्ध व्यभिचार होनेसे महान्‌ पतन करनेवाला है, तथापि पारमार्थिक दृष्टिसे इस सम्बन्धका भाव बहुत उन्नति करनेवाला है । यद्यपि पत्नी अपने पतिकी सेवा करती है, तथापि वह अधिकारपूर्वक पतिसे यह आशा भी रखती है कि वह रोटी, कपड़ा, मकान आदि जीवन-निर्वाहकी वस्तुओंका प्रबन्ध करे और बाल-बच्चोंके पालन-पोषण, विद्याध्ययन, विवाह आदिकी व्यवस्था करे । परन्तु परकीया-भावमें अपने इष्टको सुख पहुँचानेके सिवाय कोई भी कामना या स्वार्थ नहीं रहता । स्वकीया-भावकी अपेक्षा परकीया-भावमें अपने प्रेमास्पदका चिन्तन भी अधिक होता है और उससे मिलनेकी इच्छा भी तीव्र होती है । स्वकीया-भावमें तो हरदम साथमें रहनेसे प्रेमास्पदके आचरणोंको लेकर उसमें दोषदृष्टि भी हो सकती है; परन्तु परकीया-भावमें प्रेमास्पदमें दोषदृष्टि होती ही नहीं ।यद्यपि लौकिक परकीया-भावमें अपने सुखकी इच्छा भी रहती है, तथापिपारमार्थिक परकीया-भावमें भक्तके भीतर अपने सुखकी किंचिन्मात्र भी इच्छा नहीं रहती । उसमें केवल एक ही लगन रहती है कि प्रेमास्पद (भगवान्‌) को अधिक-से-अधिक सुख कैसे पहुँचे ! उसका अहंभाव भगवान्‌में लीन हो जाता है ।

           हनुमान्‌जीका भाव स्वकीया अथवा परकीया माधुर्य-रतिसे भी श्रेष्ठ है ! उन्होंने वानरका शरीर इसलिये धारण किया है कि उनको अपने प्रेमास्पदसे अथवा दूसरे किसीसे किंचिन्मात्र भी कोई वस्तु लेनेकी जरूरत न पड़े । उनको न रोटीकी जरूरत है, न कपड़ेकी जरूरत है, न मकानकी जरूरत है, न बाल-बच्चोंके देखभालकी जरूरत है, न मान-बड़ाई आदिकी जरूरत है ! वानर तो जंगलमें फल-फुल-पत्ते खाकर और पेड़ोंपर रहकर ही जीवन-निर्वाह कर लेता है । लौकिक परकीया-भावमें प्रेमीका अपने माता-पिता, भाई-बहन आदिके साथ भी सम्बन्ध रहता है; परन्तु हनुमान्‌जीका एक भगवान्‌ श्रीरामके सिवाय और किसीसे सम्बन्ध है ही नहीं ।

     (शेष आगेके ब्लॉगमें)

‒ ‘कल्याण-पथ’ पुस्तकसे

 *भक्तके लिये कहा गया है‒‘साह ही को गोतु होत है गुलाम को ।’
                                 (कवितावली, उत्तर॰ १०७)

    † कार्ये दासी रतौ   रम्भा   भोजने जननीसमा ।
        विपत्सु मन्त्रिणी भर्तुः सा च भार्या पतिव्रता ॥

 (पद्मपुराण, सृष्टि॰ ४७/५६)

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शुक्रवार, 23 सितंबर 2016

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सेव्यने सेवा स्वीकार कर ली‒इसी बातसे भक्त अपनेको कृत्यकृत्य मानता है । इतना ही नहीं, अपने इष्टदेवके भक्तोंकी भी सेवाका अवसर मिल जाय तो वह इसको अपना सौभाग्य समझता है । हनुमान्‌जी सनकादिकोंसे कहते हैं‒

ऐहिकेषु च कार्येषु           महापत्सु च सर्वदा ॥
नैव योज्यो राममन्त्रः       केवलं मोक्षसाधकः ।
ऐहिके समनुप्राप्ते        मां स्मरेद् रामसेवकम् ॥
यो रामं संस्मरेन्नित्यं       भक्त्या मनुपरायणः ।
तस्याहमिष्टसंसिद्ध्यै दीक्षितोऽस्मि मुनिश्वराः ॥
वाञ्छितार्थं प्रदास्यामि    भक्तानां राघवस्य तु ।
सर्वथा जागरूकोऽस्मि         रामकार्यधुरंधरः ॥

(रामरहस्योपनिषद् ४/१०-१३)

‘लौकिक कार्योंके लिये तथा बड़ी-से-बड़ी आपत्तियोंमें भी कभी राममन्त्रका उपयोग नहीं करना चाहिये । वह तो संकट आ पड़े तो केवल मोक्षका साधक है । यदि कोई लौकिक कार्य या संकट आ पड़े तो मुझ राम-सेवकका स्मरण करे । मुनीश्वरो ! जो नित्य भक्तिभावसे मन्त्र-जपमें संलग्न होकर भगवान्‌ रामका सम्यक्‌‌ स्मरण करता है, उसके अभीष्टकी पूर्ण सिद्धिके लिये मैं दीक्षा लिये बैठा हूँ । श्रीरघुनाथजीके भक्तोंको मैं अवश्य मनोवाञ्छित वस्तु प्रदत्त करूँगा । श्रीरामका कार्यभार मैंने अपने सिरपर उठा रखा है और उसके लिये मैं सर्वथा जागरूक हूँ ।’

हनुमान्‌जी भगवान्‌ रामकी सेवा करनेमें इतने दक्ष हैं कि भगवान्‌के मनमें संकल्प उठनेसे पहले ही वे उसकी पूर्ति कर देते हैं ! सीताजीकी खोजके लिये जाते समय हनुमान्‌जीको केवल उनका कुशल समाचार लानेके लिये ही कहा गया था । परन्तु सीताजीकी खोजके साथ-साथ उन्होंने इन बातोंका भी पता लगा लिया कि लंकाके दुर्ग किस विधिसे बने हैं, किस प्रकार लंकापुरीकी रक्षाकी व्यवस्था की गयी है, किस तरह सेनाओंसे सुरक्षित है, वहाँ सैनिकों और वाहनोंकी संख्या कितनी है आदि-आदि । जब अशोकवाटिकामें उन्होंने त्रिजटाका स्वप्न सुना‒

सपनें बानर लंका जारी । जातुधान सेना सब मारी ॥
(मानस ५/११/२)

तब इसको हनुमान्‌जी भगवान्‌की प्रेरणा (आज्ञा) समझी । जब उनकी पूँछमें आग लगानेकी बात चली, तब इस बातकी पूरी तरह पुष्टि हो गयी‒

बचन सुनत कपि मन मुसकाना ।
भई सहाय        सारद मैं जाना ॥
(मानस ५/२५/२)

          अतः हनुमान्‌जी भगवान्‌की लंका-दहनरूप सेवाका कार्य भलीभाँति पूरा कर दिया ! इतना ही नहीं, रामजीको लंकापर विजय करनेमें सुगमता पड़े, इसके लिये उन्होंने जलानेके साथ-साथ लंकाकी आवश्यक युद्ध-सामग्रीको भी नष्ट कर दिया, खाइयोंको पाट दिया, परकोटोंको गिरा दिया और विशाल राक्षस-सेनाका एक चौथाई भाग नष्ट कर दिया (वाल्मीकि॰ युद्ध॰३) । आगे राक्षसोंकी संख्या न बढ़े, इसके लिये उन्होंने भयंकर गर्जना करके राक्षसियोंके गर्भ भी गिरा दिये‒

चलत महाधुनि   गर्जेसि भारी ।
गर्भ स्रवहिं सुनि निसिचर नारी ॥
 (मानस ५/२८/१)

कारण कि भगवान्‌का अवतार राक्षसोंका विनाश करनेके लिये हुआ है‒‘विनाशय च दुष्कृताम्’ (गीता ४/८)और हनुमान्‌जीको भगवान्‌का कार्य ही करना है‒‘राम काज लगि तव अवतारा’ (मानस ४/३०/३) ।

    (शेष आगेके ब्लॉगमें)

‒ ‘कल्याण-पथ’ पुस्तक से

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बुधवार, 21 सितंबर 2016

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🌟 भक्तशिरोमणि श्रीहनुमान्‌जीकी दास्य-रति :

    भगवान्‌की मंगलमयी अपार कृपासे भारतभूमिपर अनन्तकालसे असंख्य ऋषि, सन्त-महात्मा, भक्त होते रहे हैं । उनमें भक्तशिरोमणि श्रीहनुमान्‌जी महाराजका विशेष स्थान है । वानर-जैसी साधारण योनिमें जन्म लेकर भी अपने भावों, गुणों और आचरणोंके द्वारा हनुमान्‌जीने प्राणिमात्रका जो परम हित किया है एवं कर रहे हैं, उससे लोग प्रायः परिचित ही हैं । उनके उपकारसे कोई भी प्राणी कभी उऋण नहीं हो सकता । भगवान्‌ श्रीरामके प्रति उनकी जो दास्य-भक्ति है, उसका पूरा वर्णन करनेकी सामर्थ्य किसीमें भी नहीं है । फिर भी समय सार्थक करनेके लिये उसका किंचित्‌ संकेत करनेकी चेष्टा की जा रही है ।

        अपने-आपको सर्वथा भगवान्‌को समर्पित कर देना, उनके मनोभाव, प्रेरणा अथवा आज्ञाके अनुसार उनकी सेवा करना, उनको निरन्तर सुख पहुँचानेका भाव रखना तथा बदलेमें उनसे कभी कुछ न चाहना‒यही भक्तिका स्वरूप है । ये बातें हनुमान्‌जीमें पूर्णरूपसे पायी जाती हैं । वे अपने शरीर, इन्द्रियाँ, मन, बुद्धि, बल, योग्यता, समय आदिको एकमात्र भगवान्‌का ही समझकर उनकी सेवामें लगाये रखते हैं । उनका पूरा जीवन ही भगवान्‌को सुख पहुँचानेके भावसे ओतप्रोत है ।

       भगवान्‌को श्रद्धा-प्रेमपूर्वक सुख पहुँचानेके भावको ‘रति’ कहते हैं । यह रति मुख्यरूपसे चार प्रकारकी मानी गयी है‒दास्य, सख्य, वात्सल्य और माधुर्य । इनमेंदास्यसे सख्य, सख्यसे वात्सल्य और वात्सल्यसे माधुर्य रति श्रेष्ठ है । कारण किइनमें भक्तको क्रमशः भगवान्‌के ऐश्वर्यकी अधिक विस्मृति होती जाती है और भक्तका संकोच (कि मैं तुच्छ हूँ, भगवान्‌ महान्‌ हैं) मिटता जाता है तथा भगवत्सम्बन्ध (प्रेम) की घनिष्ठता होती जाती है । परन्तु जब इन चारोंमेंसे कोई एक रति भी पूर्णतामें पहुँच जाती है, तब उसमें दूसरी रतियाँ भी आ जाती हैं । जैसे, दास्यरति पूर्णतामें पहुँच जाती है तो उसमें सख्य, वात्सल्य और माधुर्य‒तीनों रतियाँ आ जाती हैं । यही बात अन्य रतियोंके विषयमें भी समझनी चाहिये । कारण यह है कि भगवान्‌ पूर्ण हैं, उनका प्रेम भी पूर्ण है और परमात्माका अंश होनेसे जीव स्वयं भी पूर्ण है । अपूर्णता तो केवल संसारके सम्बन्धसे ही आती है; क्योंकि संसार सर्वथा अपूर्ण है । हनुमान्‌जी में दास्यरतिकी पूर्णता है; अतः उनमें अन्य रतियोंकी कमी नहीं है । उनमें दास्य, सख्य, वात्सल्य और माधुर्य‒चारों रतियाँ पूर्ण रूपसे विद्यमान हैं ।

🌟 दास्य-रति :

       दास्य-रतिमें भक्तका यह भाव रहता है कि भगवान्‌ मेरे स्वामी हैं और मैं उनका दास (सेवक) हूँ । वे चाहे जो करें, चाहे जैसी परिस्थितिमें मेरेको रखें और मेरेसे चाहे जैसा काम लें, मेरेपर उनका पूरा अधिकार है । इस रतिमें भक्तका शरीर, इन्द्रियाँ, मन, बुद्धि आदिमें किंचिन्मात्र भी अपनापन नहीं रहता । उसमें ‘मैं सेवक हूँ’ ऐसा अभिमान भी नहीं रहता । वह तो यही समझता है कि मैं भगवान्‌की प्रेरणा और शक्तिसे उन्हींकी दी हुई सामग्री उनके ही अर्पण कर रहा हूँ । ऐसे अनन्य सेवाभाववाले भक्तोंको यदि भगवान्‌ सालोक्य, सार्ष्टि, सामीप्य, सारूप्य और सायुज्य‒ये पाँच प्रकारकी मुक्तियाँ* भी दे दें तो वे इनको ग्रहण नहीं करते‒

सालोक्यसार्ष्टिसामीप्यसारूप्यैकत्वमप्युत ।
दीयमानं न गृह्णन्ति विना मत्सेवनं जनाः ॥

    (शेष आगेके ब्लॉगमें)

‒ ‘कल्याण-पथ’ पुस्तकसे

*भगवान्‌के नित्यधाममें निवास करना ‘सालोक्य’, भगवान्‌के समान ऐश्वर्य प्राप्त करना ‘सार्ष्टि’, भगवान्‌की नित्य समीपता प्राप्त करना ‘सामीप्य’, भगवान्‌का-सा रूप प्राप्त करना ‘सारूप्य’ तथा भगवान्‌के विग्रहमें समा जाना अर्थात्‌ उनमें ही मिल जाना ‘सायुज्य’ मुक्ति कहलाती है ।

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मंगलवार, 20 सितंबर 2016

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🌟 हनुमान्‌जीका सेवाभाव :

सुमिरि पवनसुत पावन नामू ।
अपने बस   करि   राखे रामू ॥

 (मानस, बाल॰२६/६)

हनुमान्‌ने महान्‌ पवित्र नामका स्मरण करके श्रीरामजीको अपने वशमें कर रखा है । हरदम नाममें तल्लीन रहते हैं । ‘रहिये नाममें गलतान’ रात-दिन नाम जपते ही रहते हैं । हनुमान्‌जी महाराजको खुश करना हो तो राम-नाम सुनाओ, रामजीके चरित्र सुनाओ; क्योंकि ‘प्रभुचरित्र सुनिबेको रसिया’ भगवान्‌के चरित्र सुननेके बड़े रसिया हैं ।

       रामजीने भी कह दिया, ‘धनिक तूँ पत्र लिखाउ’ हनुमान्‌जीको धनी कहा और अपनेको कर्जदार कहा । रामजीने देखा कि मैं तो बन गया कर्जदार, पर सीताजी कर्जदार न बनें तो घरमें ही दो मत हो जायेंगे । इसलिये रामजीका सन्देश लेकर सीताजीके चरणोंमें हनुमान्‌जी महाराज गये । जिससे सीताजी भी ऋणी बन गयीं । ‘बेटा, तूने आकर महाराजकी बात सुनाई । ऐसा सन्देश और कौन सुनायेगा !’ रामजीने देखा कि हम दोनों तो ऋणी बन गये, पर लक्ष्मण बाकी रह गया । जब लक्ष्मणके शक्तिबाण लगा, उस समय संजीवनी लाकर लक्ष्मणजीके प्राण बचाये ।‘लक्ष्मणप्राणदाता च’ इस प्रकार जंगलमें आये हुए तीनों तो ऋणी बन गये, पर घरवाले बाकी रह गये । भरतजीको जाकर सन्देश सुनाया कि रामजी महाराज आ रहे हैं । हनुमान्‌जीने बड़ी चतुराईसे संक्षेपमें सारी बात कह दी ।

रिपु रन जीति सुजस सुर गावत ।
सीता सहित अनुज प्रभु आवत ॥

   (मानस, उत्तर॰२/५)

        पहले हनुमान्‌जी आये थे तो भरतजीका बाण लगा था, उस समय उन्होंने वहाँकी बात कही कि ‘युद्ध हो रहा है, लक्ष्मणजीको मूर्च्छा हो गई है और सीताजीको रावण ले गया है ।’ अब किसकी विजय हुई, क्या हुआ ? इसका पता नहीं है ? यह सब इतिहास जानना चाहते हैं भरतजी महाराज । तो थोड़ेमें सब इतिहास सुना दिया । ऐसे ‘अपने बस करि राखे रामू ॥’ इनकी सेवासे रामजी अपने परिवारसहित वशमें हो गये । ऐसी कई कथाएँ आती हैं । हनुमान्‌जी महाराज सेवा बहुत करते थे । सेवा करनेवालेके वशमें सेवा लेनेवाला हो ही जाता है ।

          सेवा करनेवाला ऐसे तो छोटा कहलाता है और दास होकर ही सेवा करता है; परन्तु सेवा करनेसे सेवक मालिक हो जाता है और सेवा लेनेवाला स्वामी उसका दास हो जाता है । स्वामीको सेवककी सब बात माननी पड़ती है ।संसारमें रहनेकी यह बहुत विलक्षण विद्या है‒सेवा करना ‘सेवाधर्मः परमगहनो योगिनामप्यगम्यः’ सेवाका धर्म बड़ा कठोर है । भरतजी महाराज भी यही कहते हैं । ऐसे सेवा-धर्मको हनुमान्‌जी महाराजने निभाया ।

       वे रघुनाथजी महाराजकी खूब सेवा करते थे । जंगलमें तो सेवा करते ही थे, राजगद्दी होनेपर भी वहाँ हनुमान्‌जी महाराज सेवा करनेके लिये साथमें रह गये । एक बारकी बात है । लक्ष्मणजी और सीताजीके मनमें आया कि हनुमान्‌जीको कोई सेवा नहीं देनी है । देवर-भौजाईने आपसमें बात कर ली कि महाराजकी सब सेवा हम करेंगे । सीताजीने हनुमान्‌जीकेसामने बात रखी कि ‘देखो बेटा ! तुम सेवा करते हो ना ! अब वह सेवा हम करेंगे । इस कारण तुम्हारे लिये कोई सेवा नहीं है ।’ हनुमान्‌जी बोले‒‘माताजी ! आठ पहर जो-जो सेवा आपलोग करोगे, उसमेंसे जो बचेगी, वह सेवा मैं करूँगा । इसलिये एक लिस्ट बना दो ।’ बहुत अच्छी बात । अब कोई सेवा हनुमान्‌के लिये बची नहीं । हनुमान्‌जी महाराजको बहाना मिल गया । भगवान्‌को जब उबासी आवे तो चुटकी बजा देवें ।

        शास्त्रोंमें, स्मृतियोंमें ऐसा वचन आता है कि उबासी आनेपर शिष्यके लिये गुरुको भी चुटकी बजा देनी चाहिये । इसलिये रघुनाथजी महाराजको उबासी आते ही चुटकी बजा देते थे, यह सेवा हो गयी । अब वह उस कागजमें लिखी तो थी ही नहीं । चुटकी बजानेकी कौन-सी सेवा है ! रात्रिके समय हनुमान्‌जीको बाहर भेज दिया । अब तो वे छज्जेपर बैठे-बैठे मुँहसे ‘सीताराम सीताराम’ कीर्तन करते रहते और चुटकी भी बजाते रहते । न जाने कब भगवान्‌को उबासी आ जाय । अब चुटकी बजने लगे तो रामजीको भी जँभाई आनी शुरू हो गयी । सीताजीने देखा कि बात क्या हो गयी ? घबराकर कौशल्याजीसे कहा और सबको बुलाने लगी । वशिष्ठजीको बुलाया कि रामललाको आज क्या हो गया । वशिष्ठजीने पूछा‒‘हनुमान्‌ कहाँ है ?’ ‘उसको तो बाहर भेज दिया ।’ ‘हनुमान्‌को तो बुलाओ ।’ हनुमान्‌जी ने आते ही ज्यों चुटकी बजाना बन्द कर दिया, त्यों ही भगवान्‌की जँभाई भी बन्द हो गयी । तब सीताजीने भी सेवा करनेकी खुली कर दी । इस प्रकार हृदयमें रामजीको वशमें कर लिया ।

       भरतजीने भी हनुमान्‌जीसे कह दिया‘नाहिन तात उरिन मैं तोही ।’ तुमने जो बात सुनायी, उससे उऋण नहीं हो सकता । ‘अब प्रभु चरित सुनावहु मोही ।’ अब भगवान्‌के चरित्र सुनाओ । खबर सुनानेमात्रसे आप पहले ही ऋणी हो गये । चरित्र सुनानेसे और अधिक ऋणी हो जाओगे । भरतजीने विचार किया कि जब कर्जा ले लिया तो कम क्यों लें ? कर्जा तो ज्यादा हो जायगा, पर रामजीकी कथा तो सुन लें । हनुमान्‌जी महाराजको प्रसन्न करनेका उपाय भी यही है और उऋण होनेका उपाय ही यही है कि उनको रामजीकी कथा सुनाओ, चाहे उनसे सुन लो । रामजीकी चर्चासे वे खुश हो जाते हैं ।इस प्रकार हनुमान्‌जीके सब वशमें हो गये ।

नारायण ! नारायण !! नारायण !!!

‒ ‘मानसमें नाम-वन्दना’ पुस्तकसे

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सोमवार, 19 सितंबर 2016

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🌟 गीताका तात्पर्य :

(गत ब्लॉगसे आगेका)

       कई वर्ष पहलेकी बात है । बाँकुड़ा जिलेमें अकाल पड़ गया तो गीताप्रेसके संस्थापक, संचालक तथा संरक्षक सेठजी श्रीजयदयालजी गोयन्दकाने वहाँ कई जगह कीर्तन आरम्भ करवा दिया और लोगोंसे कहा कि वहाँ बैठकर दो घण्टे कीर्तन करो और आधा सेर चावल ले जाओ । पैसे देनेसे वे मांस, मछली आदि खरीदेंगे, पर चावल देनेसे वे चावल खायेंगे ही, इसलिये चावल देना शुरू किया । इस तरह उन्होंने सौ-सवा सौ कैम्प खोल दिये । एक दिन सेठजी वहाँ देखनेके लिये गये । रात्रिमें वे जहाँ ठहरे थे, वहाँ बहुत-से बंगाली लोग इकठ्ठे हुए । उन्होंने सेठजीकी बड़ी प्रशंसा की और कहा कि आपने हमारे जिलेको जिला दिया ! सेठजी बोले कि देखो, तुमलोग झूठी प्रशंसा करतेहो, हमने क्या खर्च किया है ? हम मारवाड़से यहाँ आये थे । यहाँ आकर हमने बंगालसे जितना कमाया, वह सब-का-सब दे दें तो आपकी ही वस्तु आपको दी, हमने अपना क्या दिया ? वह भी सब नहीं दिया है । वह सब दे दें और फिर हम मारवाड़से लाकर दें, तब यह माना जायगा कि हमने दिया । इस तरह हमें हरेकको उसीकी वस्तु समझकर उसको देनी है । देकर हम उऋण हो जायँगे, नहीं तो ऋण रह जायगा । अपनेमें सेवकपनेका अभिमान भी नहीं होना चाहिये । घरमें रसोई बनती है तो बच्चे भी खाते हैं, स्त्रियाँ भी खाती हैं, पुरुष भी खाते हैं; क्योंकि उसमें सबका हिस्सा है । इसी तरह कोई भूखा आ जाय, कुत्ता आ जाय, कौआ आ जाय तो उनका भी उसमें हिस्सा है । उनके हिस्सेकी चीज उनको दे दें । इस प्रकार निःस्वार्थभावसे आचरण करनेपर हमारा कल्याण हो जायगा ।गीतामें आया है‒

स्वकर्मणा तमभ्यर्चं सिद्धिं विन्दति मानवः ॥

  (१८/४६)

      ‘अपने कर्तव्य कर्मके द्वारा उस परमात्माका पूजन करके मनुष्य सिद्धिको प्राप्त हो जाता है ।’

      तात्पर्य है कि ब्राह्मण ब्राह्मणोचित कर्मोंके द्वारा पूजन करे, क्षत्रिय क्षत्रियोचित कर्मोंके द्वारा पूजन करे, वैश्य वैश्योचित कर्मोंके द्वारा पूजन करे और शूद्र शूद्रोचित कर्मोंके द्वारा पूजन करे । इस प्रकार सबका पूजन, सबका हित करनेसे अपना कल्याण हो जाता है‒यह बात गीतामें बहुत विलक्षण रीतिसे बतायी गयी है ।

      यदि हम सुख चाहते हैं तो दूसरोंको भी सुख पहुँचाना हमारा कर्तव्य है । यदि हम अपने पास कुछ भी नहीं रखते हैं तो दूसरोंको देनेका विधान हमारेपर लागू भी नहीं होता । इन्कमपर टैक्स लगता है । हमने कमाया है तो उसपर टैक्स लगेगा । यदि हमने कमाया ही नहीं तो उसपर टैक्स कैसे लगेगा ? अतः यदि हम अपने पास वस्तुएँ रखते हैं तो उनसे दूसरोंकी सेवा करनी है, दूसरोंका हित करना है । गीताका तात्पर्य सबके कल्याणमें है और सबके कल्याणमें ही हमारा कल्याण निहित है ।जो लोगोंको अन्न बाँटता है क्या वह भूखा रहेगा ? क्या उसका हित नहीं होगा ? उसका हित अपने-आप हो जायगा ।

        चाहे धनी हो, चाहे गरीब हो; चाहे बहुत परिवारवाला हो चाहे अकेला हो; चाहे बलवान् हो, चाहे निर्बल हो; चाहे विद्वान् हो, कल्याणमें सबका समान हिस्सा है । जैसे, एक माँके दस बेटे होते हैं तो क्या माँके दस हिस्से होते हैं ? माँ तो सभी बेटोंके लिये पूरी-की-पूरी होती है । दसों बेटे पूरी माँको अपनी मानते हैं । ऐसे ही भगवान्‌ पूरे-के-पूरे हमारे हैं । भगवान्‌के हिस्से नहीं होते । हम सब उनकी गोदमें बैठनेके समान अधिकारी हैं । इसलिये हम सब आपसमें प्रेमसे रहें और एक-दूसरेका हित करें‒यह गीताका सिद्धान्त है‒
‘परस्परं भावयन्तः’, ‘सर्वभूतहिते रताः ।’

        प्रश्न‒दान देनेमें, सेवा करनेमें पात्र-अपात्रका विचार करना चाहिये कि नहीं ?

        उत्तर‒अन्न, जल, वस्त्र और औषध‒इनको देनेमें पात्र-अपात्र आदिका विचार नहीं करना चाहिये । जिसको अन्न, जल आदिकी आवश्यकता है, वही पात्र है ।परन्तु कन्यादान, भूमिदान, गोदान आदि विशेष दान करना हो तो उसमें देश, काल, पात्र आदिका विशेष विचार करना चाहिये ।

        अन्न, जल, वस्त्र और औषध‒इनको देनेमें यदि हम पात्र-कुपात्रका अधिक विचार करेंगे तो खुद कुपात्र बन जायँगे और दान करना कठिन हो जायगा ! अतः हमारी दृष्टिमें अगर कोई भूखा, प्यासा आदि दीखता हो तो उसको अन्न, जल आदि दे देना चाहिये । यदि वह अपात्र भी हुआ तो हमें पाप नहीं लगेगा ।

       प्रश्न‒दूसरोंको देनेसे लेनेवालेकी आदत बिगड़ जायगी, लेनेका लोभ पैदा हो जायगा; अतः देनेसे क्या लाभ ?

      उत्तर‒दूसरेको निर्वाहके लिये दें, संचयके लिये नहीं अर्थात्‌ उतना ही दें, जिससे उसका निर्वाह हो जाय । यदि लेनेवालेकी आदत बिगड़ती है तो यह दोष वास्तवमें देनेवालेका है अर्थात्‌ देनेवाला कामना, ममता, स्वार्थ आदिको लेकर देता है । यदि देनेवाला निःस्वार्थ-भावसे, बदलेकी आशा न रखकर दे तो जिसको देगा, उसका स्वभाव भी देनेका बन जायगा, वह भी सेवक बन जायगा ! रामायणमें आया है‒

सर्बस दान   दीन्ह सब काहू ।
जेहिं पावा राखा नहिं ताहू ॥

(मानस, बाल॰१९४/४)

नारायण ! नारायण !! नारायण !!!

‒ ‘जित देखूँ तित तू’ पुस्तकसे

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रविवार, 18 सितंबर 2016

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🌟 गीताका तात्पर्य :

(गत ब्लॉगसे आगेका)

     सबके हितका भाव हरेक भाई-बहन रख सकते हैं । यह भाव गृहस्थ भी रख सकते हैं, साधु-संन्यासी भी रख सकते हैं, दरिद्र-से-दरिद्र मनुष्य भी रख सकते हैं, धनी-से-धनी मनुष्य भी रख सकते हैं । हमारे पास जो वस्तुएँ हैं, वे किसकी हैं‒इसका पता नहीं है, पर कोई अभावग्रस्त आदमी सामने आ जाय तो वस्तुको उसीकी समझकर उसको दे दें‒‘त्वदीयं वस्तु गोविन्द तुभ्यमेव समर्पये ।’ जैसे हमारे पास कोई सज्जन आता है और कहता है कि ‘भाई, आज मेरेको मेलेमें जाना है । मेरे पास एक हजार रुपये हैं, कोई जेब न कतर ले, इसलिये इन रुपयोंको आपके पास रखता हूँ ।’ वह रुपये रखकर चला जाता है । शामको वह आकर रुपये माँगता है और हम उसको रुपये वापस दे देते हैं तो क्या हमे दान कर दिया ? दान नहीं किया, प्रत्युत उसीकी वस्तु उसको दे दी ।

       शास्त्रमें आया है कि रसोई बननेके बाद यदि ब्रह्मचारी और संन्यासी आ जायँ तो उनको अन्न न देनेसे पाप लगता है, जिसकी शुद्धि चान्द्रायणव्रत करनेसे होती है । यदि उनको थोड़ा-सा अन्न भी दे दें तो इतनेमें हमारे धर्मका पालन हो जायगा और पाप नहीं लगेगा । इसमें कोई शंका कर सकता है कि हमने पैसे कमाये, उससे सब सामग्री लाये और रसोई बनायी, पर कोई संन्यासी आ जाय तो उसको न देनेसे पाप लग जायगा‒यह कैसा न्याय है ? इसका समाधान यह है कि जिसने संन्यास ले लिया, त्याग कर दिया और जो अपने पासमें कुछ नहीं रखता, उसके हकका धन कहाँ गया ? यदि वह चाहता तो दूकान, खेत आदिमें काम करके, पढ़ाने-लिखानेका काम करके अपने जीवन-निर्वाहके योग्य धन कमा सकता था, रुपयोंका संग्रह कर सकता था, पर वह उसने नहीं किया तो वे रुपये हमारे पास ही रहे ! इसलिये समयपर भोजनके लिये आ जाय तो उसको रोटी दे दें‒यह हमारा कर्तव्य है । नहीं देंगे तो उसका हमपर ऋण रहेगा, हमें पाप लगेगा ।

        साधुओंकी भिक्षावृत्तिको शास्त्रोंमें बहुत अधिक पवित्र बताया गया है; क्योंकि कई घरोंसे थोड़ा-थोड़ा लेनेसे देनेवालेपर कोई भार भी नहीं पड़ता और लेनेवालेकी उदरपूर्ति भी हो जाती है । इसलिये इसको‘माधुकरी वृत्ति’ भी कहते हैं । ‘मधुकर’ नाम भौरें अथवा मधुमक्खीका है । मधुमक्खी हरेक पुष्पसे थोड़ा-थोड़ा रस लेती है और किसी पुष्पका नुकसान भी नहीं करती । एक साधु थे । उनसे किसीने पूछा कि ‘आप भोजन कहाँ पाते हो ? पासमें एक पैसा तो है नहीं !’ साधुने कहा कि ‘भिक्षा पा लेते हैं ।’ उसने फिर पूछा कि ‘कभी भिक्षा न मिले तो ?’ साधु बोला‒‘तो भूखको ही पा लेते हैं !’ भूखको पानेका तात्पर्य है कि आज हम भोजन नहीं करेंगे, कल करेंगे ।

        संसारमें एक-दूसरेको दिये बिना, एक-दूसरेकी सेवा किये बिना किसीका भी निर्वाह नहीं हो सकता । राजा-महाराजा कोई क्यों न हो, अपने निर्वाहके लिये कुछ-न-कुछ सहायता लेनी ही पड़ती है ।इसलिये गीतामें आया है‒

देवान्भावयतानेन ते देवा भावयन्तु वः ।
परस्परं भावयन्तः श्रेयः परमवाप्स्यथ ॥
                                                  (३/११)

      ‘अपने कर्तव्य-कर्मके द्वारा तुमलोग देवताओंको उन्नत करो और वे देवतालोग अपने कर्तव्यके द्वारा तुमलोगोंको उन्नत करें । इस प्रकार एक-दूसरेको उन्नत करते हुए तुमलोग परम कल्याणको प्राप्त हो जाओगे ।’

        कितनी विलक्षण बात है कि एक-दूसरेका पूजन (सेवा) करते-करते परम कल्याणकी प्राप्ति हो जाती है !

    (शेष आगेके ब्लॉगमें)

‒ ‘जित देखूँ तित तू’ पुस्तकसे

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🌟 गीताका तात्पर्य :

(गत ब्लॉगसे आगेका)

शरीर, इन्द्रियाँ, मन, बुद्धि आदि कुछ भी मेरा नहीं है । इनको संसारका मान लें तो कर्मयोग हो जायगा, प्रकृतिमात्रका समझ लें तो ज्ञानयोग हो जायगा और भगवान्‌का मान लें तो भक्तियोग हो जायगा । यदि इनको अपना मानेंगे तो जन्म-मरणयोग हो जायगा अर्थात्‌ जन्म-मरण होगा, मिलेगा कुछ नहीं । जो अपना नहीं है, वह मिलेगा कैसे ? अपने पास रहेगा कैसे ?इसलिये गीता कहती है कि इन शरीर, इन्द्रियाँ, मन, बुद्धिसे जो भी काम करो, सबके हितके लिये करो‒

यज्ञायाचरतः कर्म समग्रं प्रविलीयते ॥  (४/२३)

‘यज्ञके लिये अर्थात्‌ निःस्वार्थभावसे केवल दूसरोंके हितके लिये कर्म करनेवाले मनुष्यके सम्पूर्ण कर्म विलीन हो जाते हैं ।

रामायणमें आया है‒

परहित बस जिन्ह के मन माहीं ।
तिन्ह कहुँ जग दुर्लभ कछु नाहीं ॥

 (मानस, अरण्य॰ ३१/५)

पर हित सरिस धर्म नहिं भाई ।
पर पीड़ा सम नहिं अधमाई ॥

 (मानस, उत्तर॰ ४१/१)

दूसरोंका हित करनेसे कर्मयोग, ज्ञानयोग और भक्तियोग‒तीनों सिद्ध हो जाते हैं । सगुण और निर्गुण‒दोनोंकी प्राप्ति दूसरोंका हित करनेसे हो जाती है । गीताने सगुणकी प्राप्तिके लिये कहा है‒

ते प्राप्नुवन्ति मामेव सर्वभूतहिते रताः ॥ (५/२५)

‘जिनका शरीर मन-बुद्धि-इन्द्रियोंसहित वशमें है, जो सम्पूर्ण प्राणियोंके हितमें रत हैं, जिनके सम्पूर्ण संशय मिट गये हैं, जिनके सम्पूर्ण कल्मष (दोष) नष्ट हो गये हैं, वे विवेकी साधक निर्वाण ब्रह्मको (निर्गुणको) प्राप्त होते हैं ।’

हिन्दू, मुसलमान, ईसाई, पारसी, यहूदी आदि कोई भी क्यों न हो, यदि वह अपने सिद्धान्तोंका, नियमोंका पालन करते हुए त्याग करे अर्थात्‌ मिली हुई वस्तुको अपनी न माने तो उसका कल्याण हो जायगा । त्यागमें सब एक हो जाते हैं, कोई मतभेद नहीं रहता । जैसे कोई देवताओंका पूजन करता है, कोई ऋषियोंका पूजन करता है, कोई माँ-बापका पूजन करता है आदि-आदि । परन्तु नियम-पालनमें भिन्नता होनेपर भी दूसरोंके हितके लिये स्वार्थ और अभिमानका त्याग करनेमें सब एक हो जाते हैं । जिनमें अपने स्वार्थ और अभिमानके त्यागकी मुख्यता है, वे मत, सिद्धान्त, सम्प्रदाय, ग्रन्थ, व्यक्ति आदि महान् श्रेष्ठ होते हैं । परन्तु जिनमें अपने स्वार्थ और अभिमानकी मुख्यता है, वे मत, सिद्धान्त, ग्रन्थ व्यक्ति आदि महान्‌ निकृष्ट होते हैं ।

सबका हित करनेसे अपना हित मुफ्तमें, स्वाभाविक ही हो जाता है । इसलिये हमें कोई नया काम नहीं करना है, प्रत्युत अपना भाव बदलना है कि हमारी सम्पत्ति सबके लिये है । हम तो सम्पत्तिकी रक्षा करनेवाले हैं । जैसे आवश्यकता पड़नेपर हम अन्न, जल, वस्त्र आदि अपने काममें लेते हैं, ऐसे ही आवश्यकता पड़नेपर दूसरोंको भी अन्न, जल, वस्त्र, औषध दे दें । जैसे खुद आवश्यकताके अनुसार वस्तु लेते हैं, ऐसे ही दूसरोंको भी आवश्यकताके अनुसार दें ।

     (शेष आगेके ब्लॉगमें)

‒ ‘जित देखूँ तित तू’ पुस्तकसे

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शुक्रवार, 16 सितंबर 2016

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🌹 गीताका तात्पर्य :

(गत ब्लॉगसे आगेका)

इसलिये हरेक काममें परहितका भाव रखें । इसमें खर्चा तो बहुत थोड़ा है, पर लाभ बड़ा भारी है । थोड़ा खर्च यह है कि कोई अभावग्रस्त सामने आ जाय तो उसको थोड़ा-सा अन्न दे दो, थोड़ा-सा जल दे दो, थोड़ा-सा वस्त्र दे दो, थोड़ा-सा आश्रय दे दो, उसकी थोड़ी-सी सहायता कर दो । कभी खुद भूखे रहकर दूसरेको भोजन देनेका मौका भी आ जाय तो कोई बात नहीं । हम एकादशीव्रत करते हैं तो उस दिन भूखे रहते ही हैं । जब देशका विभाजन हुआ था, उस समय पाकिस्तानसे आये कई व्यक्तियोंको दस-दस रुपये देनेपर भी एक गिलास पानी नहीं मिला था । अतः सब समय अन्न-जलका मिलना कोई हाथकी बात नहीं है । कभी भूखा-प्यासा रहना ही पड़ता है । यदि दूसरेके हितके लिये भूखे-प्यासे रह जायँ तो कल्याण हो जाय !

इस प्रकार जो कुछ किया जाय, सबके हितके लिये किया जाय । कोई किसी भी धर्म, सम्प्रदाय, मत-मतान्तर, वर्ण, आश्रम आदिका हो, जो पक्षपात न रखकर सबके हितका भाव रखता है, उसका कल्याण हो जाता है ।

अयं निजः परो वेत्ति गणना लघुचेतसाम् ।

उदारचरितानां तु      वसुधैव कुटुम्बकम् ॥

 (पञ्च॰ अपरीक्षित॰ ३७)

‘यह अपना है और यह पराया है‒इस प्रकारका भाव संकुचित हृदयवाले मनुष्य करते हैं । उदार हृदयवाले मनुष्योंके लिये तो सम्पूर्ण विश्व ही अपना कुटुम्ब है ।’

तात्पर्य है कि उदार भाववाले मनुष्य सम्पूर्ण कार्य विश्वमात्रके हितके लिये ही करते हैं । रामायणमें आया है‒

उमा संत कइ इहई बड़ाई ।

मंद करत जो करइ भलाई ॥

 (मानस. सुन्दर॰ ४१/४)

जो अपना बुरा करता है, उसका भी सन्तलोग भला ही करते हैं । भगवान्‌ राम अंगदको रावणके पास भेजते समय कहते हैं कि शत्रुसे इस तरह बर्ताव करना, जिससे हमारा काम (सीताजीकी प्राप्ति) भी हो जाय और उसका हित भी हो‒

काजू हमार तासु हित होई ।

रिपु सन करेहु बतकही सोई ॥

 (मानस, लंका॰१७/४)

मनुष्यमें ऐसा उदारभाव त्यागसे आता है । इसलिये गीतामें त्यागकी बड़ी महिमा है ।त्यागसे तत्काल शान्ति मिलती है‒
‘त्यागाच्छान्तिरनन्तरम्’ (गीता १२/१२) ।
मनुष्य मल-मूत्र जैसी वस्तुका भी त्याग करता है तो उसको एक शान्ति मिलती है, चित्तमें प्रसन्नता होती है, शरीर हलका हो जाता है, नीरोगता आ जाती है । जब मैली-से-मैली वस्तुके त्यागका भी इतना माहात्म्य है, फिर अन्न-वस्त्र आदिका दूसरोंके हितके लिये त्याग किया जाय तो उसका कितना माहात्म्य होगा ! त्यागके विषयमें एक मार्मिक बात है कि जो वस्तु अपनी नहीं होती, उसीका त्याग होता है ! तात्पर्य यह है कि वस्तु अपनी नहीं है, पर भूलसे अपनी मान ली है, इस भूलका ही त्याग होता है । जैसे, जब हम मनुष्यशरीरमें आये थे, तब अपने साथ कुछ नहीं लाये थे, शरीर भी माँसे मिला था और जब हम जायँगे, तब अपने साथ कुछ नहीं ले जायँगे । परन्तु यहाँकी वस्तुओंको अपनी मानकर हम उसके मालिक बन जाते हैं । अतः उन वस्तुओंका मनसे त्याग करना है कि ये हमारी नहीं हैं, प्रत्युत सबकी हैं, जो कि वास्तविकता है । केवल इतनी-सी बातसे हमारा कल्याण हो जायगा । गीता कहती है‒

निर्ममो निरहंकारः स शान्तिमधिगच्छति ॥

  (२/७१)

अर्थात्‌ शरीरमें ‘मैं’-पन और वस्तुओंमें ‘मेरा’-पनका त्याग करनेसे शान्ति मिल जाती है, कल्याण हो जाता है ।

     (शेष आगेके ब्लॉगमें)

‒ ‘जित देखूँ तित तू’ पुस्तकसे

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गुरुवार, 15 सितंबर 2016

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🌟 गीताका तात्पर्य :

(गत ब्लॉगसे आगेका)

हमारी भारतीय संस्कृति बड़ी विलक्षण है, जो प्राणिमात्रका उद्धार चाहती है । राजस्थानमें मैंने देखा कि जब किसनालोग खेती करते हैं, तब पहले वे भगवान्‌से प्रार्थना करते हैं कि ‘पशुओंके भाग्यका, पक्षियोंके भाग्यका, चिड़ी-कमेड़ीके भाग्यका, अटाऊ-बटाऊके भाग्यका हमें देना महाराज !’ तात्पर्य है खेती केवल हमारे लिये नहीं है, प्रत्युत सबके लिये है, जब खेती पकती है, तब जो फल सबसे पहले आता है, उसको पहले अपने काममें नहीं लेते । पहले उसको मन्दिरमें या ब्राह्मणों अथवा साधुओंके पास भेजते हैं, फिर उसको काममें लेते हैं । ऐसे ही रसोई बनती है तो पहले अतिथि आदिको देकर फिर भोजन करते हैं । रसोई बननेके बाद ‘बलिवैश्वदेव’ करनेका विधान आता है । उसमें विश्वमात्रके लिये अन्न अर्पण किया जाता है । कोई मर जाता है तो उसके लिये श्राद्ध और तर्पण करते हैं । इतना ही नहीं, सम्पूर्ण जीवोंको, देवताओंको और ईश्वरको भी पिण्ड और पानी देते हैं । भगवान्‌में किसी कमीकी सम्भावना ही नहीं है । परन्तु जैसे बालक पिताकी ही चीज पिताको अर्पण करता है तो पिता प्रसन्न हो जाता है, ऐसे ही भगवान्‌की चीज भगवान्‌को अर्पण करनेसे भगवान्‌ प्रसन्न हो जाते हैं ।समुद्रको भी जल देते हैं और सूर्यको भी दीपक दिखाते हैं, आरती करते हैं । क्या समुद्रमें जलकी कमी है ? सूर्यमें प्रकाशकी कमी है ? उनमें कमी नहीं है, पर हमारा उदारभाव, सबकी सेवा करनेका भाव, सबको सुख पहुँचानेका भाव कल्याण करनेवाला है‒

सर्वे भवन्तुः सुखिनः       सर्वे सन्तु निरामयाः ।
सर्वे भद्राणि पशन्तु मा कश्चिद् दुःखभाग्भवेत् ॥

‒इसी बातको गीताने ‘सर्वभूतहिते रताः’ (५/२५, १२/४) पदोंसे कहा है । सबको देनेके बाद जो शेष बचता है, वह‘यज्ञशेष’ कहलाता है । गीता कहती है‒

यज्ञशिष्टाशिनः सन्तो मुच्यन्ते सर्वकिल्बिषैः ।
                                                    (३/१३)

‘यज्ञशेषग्रहण करनेवाले श्रेष्ठ मनुष्य सम्पूर्ण पापोंसे मुक्त हो जाते हैं ।’
यज्ञशिष्टामृतभुजो यान्ति ब्रह्म सनातनम् ॥
                                                   (४/३१)

‘यज्ञशेष अमृतको ग्रहण करनेवाले सनातन परब्रह्म परमात्माको प्राप्त होते हैं ।’

कर्मयोगी सब वस्तुओंको संसारके अर्पण करता है, ज्ञानयोगी प्रकृतिके अर्पण करता है और भक्तियोगी भगवान्‌के अर्पण करता है । किसीके भी अर्पण करो, पर अपने लिये मत मानो‒यह खास बात है । वास्तवमें वस्तु कल्याण करनेवाली नहीं है, प्रत्युत हमारा उदारभाव कल्याण करनेवाला है । यदि वस्तु कल्याण करनेवाली हो तो लखपति, करोड़पति या अरबपति तो अपना कल्याण कर लेंगे, पर साधारण आदमी अपना कल्याण नहीं कर सकेगा । परन्तु वास्तवमें कल्याण त्यागीका होता है, संग्रहीका नहीं । अतः इतना धन खर्च करनेसे कल्याण होगा, इतनी वस्तुओंको देनेसे कल्याण होगा‒यह बात है ही नहीं । कल्याण हमारे इस भावसे होगा कि सबका हित हो जाय, सब सुखी हो जायँ । भगवान्‌ क्रियाग्राही या वस्तुग्राही नहीं हैं, प्रत्युत भावग्राही हैं‒‘भावग्राही जनार्दनः ।’

    (शेष आगेके ब्लॉगमें)

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🌹 गीताका तात्पर्य :

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मान लें कि कोई सज्जन अपने लिये रसोई बनाता है । अचानक एक भिक्षु आता है और आवाज देता है तो वह सज्जन बड़े प्रेमसे उसको भिक्षा देता है । वह अन्न बड़ा शुद्ध होता है । परन्तु जब वह सज्जन रसोई अपनी थालीमें परोस लेता है, तब वह अन्न उतना शुद्ध नहीं रहता क्योंकि ‘मैं भोजन करूँगा’‒यह भाव आ गया । अब यदि भिक्षुक आता है तो उसको वह अन्न देनेमें संकोच होता है और भिक्षुकको लेनेमें संकोच होता है । फिर भी भिक्षुक उसमेंसे थोड़ा अन्न ले सकता है । परन्तु वह सज्जन भोजन करने बैठ गया और उसने ग्रास बना लिया तो वह अन्न पहले-जैसा शुद्ध नहीं रहा । अगर वह उस ग्रासको मुँहमें ले लेता है तो वह अशुद्ध, जूठन हो जाता है । जब वह उस ग्रासको निगल लेता है, तब (अपने लिये भोजन करनेसे) वह महान्‌ अशुद्ध हो जाता है । यदि किसी कारणसे उलटी हो जाय तो वह उलटी किया हुआ अन्न बड़ा अशुद्ध होता है । उलटी न हो तो वह महान्‌ अशुद्ध होकर मैला बन जाता है । परन्तु दूसरे दिन वह जंगलमें उस मैलेका त्याग कर देता है तो हवा, धूप, वर्षा आदिके कारण वह मैला समय लगनेपर स्वतः मिट्टीमें मिलकर मिट्टी ही बन जाता है और इतना शुद्ध हो जाता है कि पता ही नहीं लगता कि मैलापन कहाँ था ! वह मिट्टी दूसरी वस्तुओं (बर्तन आदि) को भी शुद्ध कर देती है । यह त्यागका ही माहात्म्य है ! इस प्रकार अपने लिये बनाने-खानेसे शुद्ध वस्तु भी महान्‌ अशुद्ध हो जाती है और त्याग करनेसे महान्‌ अशुद्ध वस्तु (मल-मूत्र) भी शुद्ध हो जाती है । अतः जिस-जिस वस्तुको हम स्वार्थवश अपनी और अपने लिये मानते हैं, उस-उस वस्तुको हम अशुद्ध कर देते हैं । कारण कि संसारकी वस्तुएँ सबके लिये हैं, उनमें सबका हिस्सा है । गीता कहती है‒

भुञ्जते ते त्वघं पापा ये पचन्त्यात्मकारणात् ॥
                     (३/१३)

‘जो केवल अपने लिये ही पकाते हैं, वे पापीलोग तो केवल पापका ही भक्षण करते हैं ।’

हमारे पास जो चीज है, वह सबके लिये है, केवल हमारे लिये नहीं है‒इस उदारभावसे बड़ी शान्ति मिलती है । रसोई बननेपर कोई भूखा आ जाय, अतिथि आ जाय, भिक्षुक आ जाय, कुत्ता आदि आ जाय तो शक्तिके अनुसार उनको भी दे दें । वे सब-का-सब माँगे तो उनसे कह सकते हैं कि ‘भाई, सब कैसे दे दें, हमें भी तो लेना है, आप अपना हिस्सा ले लो !’ हम दूसरेको भोजन तो करा सकते हैं, पर उसकी इच्छापूर्ति कभी नहीं कर सकते । इतना ही नहीं, संसारके सब लोग मिलकर भी एक आदमीकी इच्छापूर्ति नहीं कर सकते‒

यत् पृथिव्यां व्रीहियवं हिरण्यं पशवः स्त्रियः ।
न दुह्यन्ति मनःप्रीतिं    पुंसः कामहतस्य ते ॥

          (श्रीमद्भा॰ ९/१९/१३)

‘पृथ्वीपर जितने भी धान्य, स्वर्ण, पशु और स्त्रियाँ हैं, वे सब-के-सब मिलकर भी उस पुरुषके मनको सन्तुष्ट नहीं कर सकते, जो कामनाओंके प्रहारसे जर्जर हो रहा है ।’

    (शेष आगेके ब्लॉगमें)

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मंगलवार, 13 सितंबर 2016

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🌟 गीताका तात्पर्य :

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व्यवहार करते हुए तत्त्वज्ञान हो जाय, भगवद्भक्ति हो जाय, योगका अनुष्ठान हो जाय, लययोग, राजयोग, मन्त्रयोग आदि योगोंकी प्राप्ति हो जाय‒ऐसी विलक्षण विद्या गीताने बतायी है ! वह विलक्षण विद्या क्या है‒इसको बतानेकी चेष्टा की जाती है । हम जो-जो व्यवहार करते हैं, उसमें अपने स्वार्थ और अभिमानका आग्रह छोड़कर सबके हितकी दृष्टिसे कार्य करें, हितकी दृष्टिसे कार्य करनेका तात्पर्य है कि वर्तमानमें भी हित हो और भविष्यमें भी हित हो, हमारा भी हित हो और दूसरे सबका भी हित हो‒ऐसी दृष्टि रखकर कार्य करे । ऐसा करनेसे बड़ी सुगमतासे परमात्मतत्त्वकी प्राप्ति हो जायगी । एकान्तमें रहकर वर्षोंतक साधना करनेपर ऋषि-मुनियोंको जिस तत्त्वकी प्राप्ति होती थी, उसी तत्त्वकी प्राप्ति गीताके अनुसार व्यवहार करते हुए हो जायगी । सिद्धि-असिद्धिमें सम रहकर कर्म करना ही गीताके अनुसार व्यवहार करना है । गीता कहती है‒

सुखदुःखे समे कृत्वा लाभालाभौ जयाजयौ ।

ततो युद्धाय युजय्स्व नैवं पापमवाप्स्यसि ॥

            (२/३८)

‘जय-पराजय, लाभ-हानि और सुख-दुःखको समान करके फिर युद्धमें लग जा । इस प्रकार युद्ध करनेसे तू पापको प्राप्त नहीं होगा ।’

योगस्थः  कुरु  कर्माणि      संग  त्यक्ता  धनञ्जय ।

सिद्ध्यसिद्ध्योः समो भूत्वा समत्वं योग उच्यते ॥

             (२/४८)

‘हे धनञ्जय ! तू आसक्तिका त्याग करके सिद्धि-असिद्धिमें सम होकर योगमें स्थित हुआ कर्मोंको कर; क्योंकि समत्व ही योग कहा जाता है ।’

संसारका स्वरूप है‒क्रिया और पदार्थ ।परमात्म-तत्त्वकी प्राप्तिके लिये क्रिया और पदार्थसे सम्बन्ध-विच्छेद करना आवश्यक है ।इसके लिये गीताने कर्मयोग, ज्ञानयोग और भक्तियोग‒तीनों ही योगोंकी दृष्टिसे क्रिया और पदार्थोंसे सम्बन्ध-विच्छेद करनेकी युक्ति बतायी है; जैसे‒कर्मयोगी क्रिया और पदार्थमें आसक्तिका त्याग करके उनको दूसरोंके हितमें लगाता है*; ज्ञानयोगी क्रिया और पदार्थसे असंग होता है† और भक्तियोगी क्रिया और पदार्थ भगवान्‌के अर्पण करता है‡ । सम्पूर्ण क्रियाओं और पदार्थोंको भगवान्‌के अर्पण करनेसे मनुष्य सुगमतापूर्वक संसार-बन्धनसे मुक्त होकर भगवान्‌को प्राप्त हो जाता है । भगवान्‌के अर्पण करनेसे क्रियाएँ और वस्तुएँ नहीं रहेगी‒यह बात नहीं है, प्रत्युत वे महान्‌ पवित्र हो जायँगी । जैसे भक्तलोग भगवान्‌को भोग लगाते हैं तो भोग लगायी हुई वस्तु वैसी-की-वैसी ही मिलती है, कम नहीं होती, पर वह वस्तु महान्‌ पवित्र हो जाती है । इसी तरहसंसारमें भी हम जिस वस्तुको अपनी न मानकर दूसरोंकी सेवाके लिये मानते हैं, वह वस्तु महान्‌ पवित्र हो जाती है और जिस वस्तुको हम केवल अपने लिये ही मानते हैं, वह वस्तु महान्‌ अपवित्र हो जाती है ।

    (शेष आगेके ब्लॉगमें)

‒ ‘जित देखूँ तित तू’ पुस्तकसे
                             
 *यदा हि नेन्द्रियार्थेषु  न कर्मस्वनुषज्जते ।                                                  सर्वसङ्कल्पसंन्यासी योगारूढस्तदोच्यते ॥
          ‘जिस समय न इन्द्रियोंके भोगोंमें तथा न कर्मोंमें ही आसक्त होता है, उस समय वह सम्पूर्ण संकल्पोंका त्यागी मनुष्य योगारूढ़ कहा जाता है ।
                                               
† तत्त्ववित्तु महाबाहो गुणकर्मविभागयोः ।
                                               
गुणा गुणेषु वर्तन्त इति मत्वा न सज्जते ॥

       ‘हे महाबाहो ! गुण-विभाग और कर्म-विभागको तत्त्वसे जाननेवाला महापुरुष ‘सम्पूर्ण गुण ही गुणोंमें बरत रहे हैं’‒ऐसा मानकर उनमें आसक्त नहीं होता ।’
 
‡ पत्रं पुष्पं फलं तोयं यो मे भक्त्या प्रयच्छति
                                                 
तदहं भक्त्युपहृतमश्नामि           प्रयतात्मनः ॥

यत्करोषि यदश्नासि  यज्जुहोषि ददासि यत् ।
                                                  यत्तपस्यसि कौन्तेय         तत्कुरुष्व मदर्पणम् ॥

         ‘जो भक्त पात्र, पुष्प, फल, जल आदि (यथासाध्य प्राप्त वस्तु) को भक्तिपूर्वक मेरे अर्पण करता है, उस मेरेमें तल्लीन हुए अन्तःकरणवाले भक्तके द्वारा भक्तिपूर्वक दिये हुए उपहार (भेंट) को मैं ख लेता हूँ ।’

           ‘हे कुन्तीपुत्र ! तू जो कुछ करता है, जो कुछ खाता है, जो कुछ यज्ञ करता हा और जो कुछ तप करता है, वह सब मेरे अर्पण कर दे ।’

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सोमवार, 12 सितंबर 2016

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🌟 गीताका तात्पर्य :

(गत ब्लॉगसे आगेका)

इसी तरह ईश्वरके विषयमें कई कहते हैं कि यह सगुण है, कई कहते हैं कि यह निर्गुण है, कई कहते हैं कि यह साकार है, कई कहते हैं कि यह निराकार है कई कहते हैं कि यह द्विभुज है, कई कहते हैं कि यह चतुर्भुज है, कई कहते हैं कि यह सहस्रभुज है, कई कहते हैं कि यह विराट्‌रूप है । कई कहते हैं कि यह व्यक्त है, कई कहते हैं कि यह अव्यक्त है, कई कहते हैं कि यह अवतार लेता है, कई कहते हैं कि यह अवतार नहीं लेता; आदि-आदि । इसी तरह जगत्‌के विषयमें कई कहते हैं कि यह अनादि और अनन्त है, कई कहते हैं कि यह अनादि और सान्त है, कई कहते हैं कि यह अनादि और परिवर्तनशील अर्थात्‌ प्रवाहरूपसे रहनेवाला है आदि-आदि । गीताने इन सब वाद-विवादोंमें न पड़कर सीधी बात बतायी है कि तुम्हारे सामने दीखता है, यह ‘जगत्’ है । हरेक मनुष्यको ‘मैं हूँ’‒ऐसा अनुभव होता है, यह‘जीव’ है । जो जड़-चेतन, अपर-परा सबका स्वामी है, वह ‘ईश्वर’ है* । गीताकी इस बातमें सभी दार्शनिक एकमत हैं । इसमें भी एक विलक्षण बात है कि यदि कोई ईश्वरको न माने तो भी गीताके अनुसार चलनेसे उसका कल्याण हो जायगा† !

गीताने व्यवहारमें परमार्थकी विलक्षण कला बतायी है, जिससे प्रत्येक मनुष्य प्रत्येक परिस्थितिमें रहते हुए, निषिद्धरहित सब तरहका व्यवहार करते हुए भी अपना कल्याण कर सके‡ । दूसरे ग्रन्थ तो प्रायः यह कहते हैं कि अगर अपना कल्याण चाहते हो तो सब कुछ त्यागकर साधु हो जाओ; क्योंकि व्यवहार और परमार्थ‒दोनों एक साथ नहीं होंगे । परन्तु गीता कहती है कि आप जहाँ हैं, जिस मतको मानते हैं, जिस सिद्धान्तको मानते हैं, जिस धर्म, सम्प्रदाय आदिको मानते हैं, उसीको मानते हुए गीताके अनुसार चलो तो कल्याण हो जायगा । तात्पर्य है कि कोई भी मनुष्य चाहे हिन्दू हो, चाहे मुसलमान हो, चाहे ईसाई हो, चाहे यहूदी हो, चाहे पारसी हो, वह किसी भी मतका अनुसरण करनेवाला हो, किसी भी सिद्धान्तको माननेवाला हो, यदि उसका उद्देश्य अपना कल्याण करनेका है तो उसको भी गीतामें अपने कल्याणकी पूरी सामग्री मिल जायगी ।

(शेष आगेके ब्लॉगमें)

‒ ‘जित देखूँ तित तू’ पुस्तकसे

        *न त्वेवाहं जातु नासं न त्वं नेमे जनाधिपाः ।

   न चैव न भविष्यामः      सर्वे वयमतः परम् ॥  (२/१२)              
किसी कालमें मैं नहीं था और तू नहीं था तथा ये राजालोग नहीं थे‒यह बात भी नहीं है और इसके बाद ये सभी (मैं, तू और राजालोग) नहीं रहेंगे‒यह बात भी नहीं है ।’

द्वाविमौ पुरुषौ लोके     क्षरश्चाक्षर एव च ।

क्षरः सर्वाणि भूतानि कूटस्थोऽक्षर उच्यते ॥

उत्तमः पुरुषस्त्वन्यः     परमात्मेत्युधाहृतः ।

यो लोकत्रयमाविश्य   बिभर्त्यव्यय ईश्वरः ॥

यस्मात्क्षरमतीतोऽहमक्षरादपि     चोत्तमः ।

अतोऽस्मि लोके वेदे च प्रथितः पुरुषोत्तमः ॥
                    (गीता १५/१६-१८)

इस संसारमें क्षर (नाशवान्‌) और अक्षर (अविनाशी)‒ये दो प्रकारके पुरुष हैं । सम्पूर्ण प्राणियोंके शरीर नाशवान्‌ और कूटस्थ (जीवात्मा) अविनाशी कहा जाता है । उत्तम पुरुष तो अन्य ही है, जो परमात्मा नामसे कहा गया है । वही अविनाशी ईश्वर तीनों लोकोंमें प्रविष्ट होकर सबका भरण-पोषण करता है । मैं क्षरसे अतीत हूँ और अक्षरसे भी उत्तम हूँ, इसलिये लोकमें और वेदमें पुरुषोत्तम नामसे प्रसिद्द हूँ ।’

                       † देवान्भावयतानेन ते देवा भावयन्तु वः ।

परस्परं भावयन्तः   श्रेयः परमवाप्स्यथ ॥
                        (गीता ३/११)

अपने कर्तव्य-कर्मके द्वारा तुमलोग देवताओंको उन्नत करो और वे देवातालोग अपने कर्तव्यके द्वारा तुमलोगोंको उन्नत करें । इस प्रकार एक-दूसरेको उन्नत करते हुए तुमलोग परम कल्याणको प्राप्त हो जाओगे ।’

स्वे स्वे कर्मण्यभिरतः संसिद्धिं लभते नरः ।
                         (गीता १८/४५)

‘अपने-अपने कर्तव्यमें तत्परतापूर्वक लगा हुआ मनुष्य सम्यक् सिद्धि (परमात्मा) को प्राप्त कर लेता है ।’

‡सर्वकर्माण्यपि सदा कुर्वाणो मद्‌व्यपाश्रयः ।

   मत्प्रसादादवाप्नोति      शाश्वतं  पदमव्ययम् ॥
                          (गीता १८/५६)

‘मेरा आश्रय लेनेवाला भक्त सदा सब विहित कर्म करते हुए भी मेरी कृपासे शाश्वत अविनाशी पदको प्राप्त हो जाता है ।’

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रविवार, 11 सितंबर 2016

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( गत ब्लाग से आगे )

🌟 गीताका तात्पर्य :

श्रीमद्भागवद्गीता लौकिक होते हुए भी एक अलौकिक ग्रन्थ है । इसमें बहुत ही विलक्षण भाव भरे हुए हैं ।आजतक गीतापर जितनी टीकाएँ हुई हैं, उतनी किसी भी ग्रन्थपर नहीं हुई है ।बाइबिलके अनुवाद (भाषान्तर) तो बहुत हुए हैं, पर टीका एक भी नहीं हुई है । बाइबिलका प्रचार तो राज्य और धनके प्रभावसे हुआ है, पर गीताका प्रचार गीताके अपने प्रभावसे हुआ है । तात्पर्य है कि गीताका आशय खोजनेके लिये जितना प्रयत्न किया गया है, उतना दूसरे किसी भी ग्रन्थके लिये नहीं किया गया है, फिर भी इस ग्रन्थकी गहराईका अन्त नहीं आया है !

थोड़े शब्दोंमें कहे तो गीताका तात्पर्य है‒मनुष्य-मात्रका कल्याण करना ।शास्त्रोंमें कल्याणके कई मार्ग बताये गये हैं । गीताकी टीकाओंको भी देखें तो उनमें अद्वैतवाद, द्वैतवाद, विशिष्ठाद्वैतवाद, द्वैताद्वैतवाद, शुद्धाद्वैतवाद, अचिन्त्यभेदाभेदवाद आदि अनेक मतोंको लेकर टीकाएँ की गयी हैं । इस प्रकार अनेक वाद, सिद्धान्त, मत-मतान्तर होते हुए भी गीताका किसीके साथ विरोध नहीं है । गीताने किसी भी मतका खण्डन नहीं किया है; परन्तु अपनी एक ऐसी विलक्षण बात कही है, जिसके सामने सब नतमस्तक हो जाते हैं । कारण कि गीता किसी एक वाद, मत आदिको लेकर नहीं कही गयी है, प्रत्युत जीवमात्रके कल्याणको लेकर कही गयी है ।

आचार्यगण अपने-अपने मतको‘सिद्धान्त’ नामसे कहते हैं । मत सर्वोपरि नहीं होता । हरेक व्यक्ति अपना-अपना मत प्रकट करता है । परन्तु सिद्धान्त सर्वोपरि होता है, जो सबको मानना पड़ा है । इसलिये गुरु-शिष्यमें भी मतभेद तो हो सकता है, पर सिद्धान्तभेद नहीं हो सकता । परन्तु गीतामें भगवान्‌ने अपने सिद्धान्तको ‘सिद्धान्त’ नामसे न कहकर‘मत’ नामसे कहा है; जैसे‒

मयि सर्वाणि कर्माणि सन्न्यस्याध्यात्मचेतसा ।

निराशीर्निर्ममो भूत्वा   युध्यस्व विगतज्वरः ॥

ये  मे   मतमिदं  नित्यमनुतिष्ठन्ति   मानवाः ।
श्रद्धावन्तोऽनसूयन्तो मुच्यन्ते तेऽपि कर्मभिः ॥                    (३/३०-३१)

       ‘तू विवेकवती बुद्धिके द्वारा सम्पूर्ण कर्तव्य-कर्मोंको मेरे अर्पण करके कामना, ममता और सन्तापरहित होकर युद्धरूप कर्तव्य-कर्मको कर । जो मनुष्य दोषदृष्टिसे रहित होकर श्रद्धापूर्वक मेरे इस मतका सदा अनुसरण करते हैं, वे भी सम्पूर्ण कर्मोंके बन्धनसे मुक्त हो जाते हैं ।’

      भगवान्‌का मत ही वास्तविक और सर्वोपरि सिद्धान्त है, जिसके अन्तर्गत सभी मत-मतान्तर आ जाते हैं । परन्तु भगवान्‌ अभिमान न करके बड़ी सरलतासे, नम्रतासे अपने सिद्धान्तको ‘मत’ नामसे कहते हैं ।तात्पर्य है कि भगवान्‌ने अपने अथवा दूसरे किसीके भी मतका आग्रह नहीं रखा है, प्रत्युत निष्पक्ष होकर अपनी बात सामने रखी है ।

       ईश्वरको माननेवाले जितने भी दार्शनिक सिद्धान्त हैं, उनमें प्रायः तीन चीजोंका वर्णन आता है‒परमात्मा, जीवात्मा और जगत् । इन तीनोंके विषयमें कई मतभेद हैं । जैसे‒जीवके विषयमें कई कहते हैं कि यह अणु-परमाणु है, कई कहते हैं कि यह मध्यम-परिमाण है और कई कहते हैं कि यह महत्-परिमाण है । जीवको ‘अणु-परमाणु’ माननेवाले कहते हैं कि एक केशको चीरकर उसके दस हजार भाग किये जायँ तो एक भागके बराबर जीवका परिमाण है*। जीवको ‘मध्यम-परिमाण’ माननेवाले कहते हैं कि चीटींमें चीटीं-जितना ही जीव है, मनुष्यमें मनुष्य-जितना ही जीव है, हाथीमें हाथी-जितना ही जीव है । जीवको महत्-परिमाण’ माननेवाले कहते हैं कि जीव एक शरीरमें सीमित नहीं है, प्रत्युत यह बहुत महान्‌ है ।

(शेष आगेके ब्लॉगमें)

‒ ‘जित देखूँ तित तू’ पुस्तकसे
                                      [*] वालाग्रशतभागस्य   शतधा    कल्पितस्य च ।

भागो जीवः स विज्ञेयः स चानन्त्याय कल्पते ॥ (श्वेताश्वतर॰ ५/९)

‘बालकी नोकके सौवें भागके पुनः सौ भागोंमें कल्पना किये जानेपर जो एक भाग होता है, उसीके बराबर जीवका स्वरूप समझना चाहिये और वह असीम भाववाला होनेमें समर्थ हैं ।’

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शनिवार, 10 सितंबर 2016

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🌟 गीताकी अलौकिक शिक्षा :

 (गत ब्लॉगसे आगेका)

संसारमें अपने-अपने क्षेत्रमें जो मनुष्य दूसरोंके द्वारा मुख्य, श्रेष्ठ माने जाते हैं, उन आचार्य, गुरु, अध्यापक, व्याख्यानदाता, महन्त, शासक, मुखिया आदिपर दूसरोंको शिक्षा देनेकी, दूसरोंका हित करनेकी विशेष जिम्मेवारी रहती है । अतः उनके लिये गीता कहती है‒

यद्यदाचरति श्रेष्ठस्तत्तदेवेतरो जनः ।
स यत्प्रमाणं कुरुते लोकस्तदनुवर्तते ॥
(३/२१)

‘श्रेष्ठ मनुष्य जो-जो आचरण करता है, दूसरे मनुष्य वैसा-वैसा ही आचरण करते हैं और वह जो कुछ कहता है, दूसरे मनुष्य उसीके अनुसार करते हैं ।’

उपर्युक्त श्लोकमें श्रेष्ठ मनुष्यके आचरणके विषयमें तो ‘यत्-यत्’, ‘तत्-तत्’और ‘एव’‒ये पाँच पद आये हैं, पर प्रमाण-(वचन-) के विषयमें ‘यत्’ और ‘तत्’‒ये दो ही पद आये हैं । इसका तात्पर्य यह है कि मनुष्यके आचरणोंका असर दूसरोंपर पाँच गुना (अधिक) पड़ता है और वचनोंका असर दो गुना (अपेक्षाकृत कम) पड़ता है ।जो मनुष्य स्वयं कर्तव्यका पालन न करके केवल अपने वचनोंसे दूसरोंको कर्तव्यपालनकी शिक्षा देता है, उसकी शिक्षाका लोगोंपर विशेष असर नहीं पड़ता । शिक्षाका लोगोंपर विशेष असर तभी पड़ता है, जब शिक्षा देनेवाला स्वयं भीनिष्कामभावसे शास्त्र और लोककी मर्यादाके अनुसार चले । इसलिये भगवान्‌ अपना उदाहरण देते हुए कहते हैं कि यद्यपि मेरे लिये त्रिलोकीमें कुछ भी कर्तव्य और प्राप्तव्य नहीं है, तो भी मैं जहाँ जिस रूपसे अवतार लेता हूँ, वहाँ उस अवतारके अनुसार ही अपने कर्तव्यका पालन करता हूँ । यदि मैं निरालस्य होकर, सावधानीपूर्वक कर्तव्यका पालन न करूँ तो मुझमें श्रद्धा-विश्वास रखनेवाले दूसरे लोग भी वैसा ही करने लग जायँगे, अर्थात्‌ वे भी प्रमादमें, असावधानीसे अपने कर्तव्यकी उपेक्षा करने लग जायँगे, जिससे परिणाममें उनका पतन हो जायगा (३/२२-२३) ।

मनुष्यमात्रमें तीन कमियाँ होती हैं‒करनेकी कमी, जाननेकी कमी और पानेकी कमी । इन तीनों कमियोंको दूर करके अपना उद्धार करनेके लिये मनुष्यको तीन शक्तियाँ भी प्राप्त हैं‒करनेकी शक्ति, जाननेकी शक्ति और माननेकी शक्ति । इन तीनों शक्तियोंके रहते हुए भी मनुष्य केवल बेसमझी और सुखासक्तिके कारण अपनेमें कमीका दुःख भोगता है । यदि वह इन तीनों शक्तियोंका सदुपयोग करे तो अपनी कमियोंकी पूर्ति करके पूर्णताको प्राप्त कर सकता है । निष्कामभावसे दूसरोंके हितके लिये कर्म (सेवा) करना ‘करनेकी शक्ति’ का सदुपयोग है, जो ‘कर्मयोग’ है । शरीरसे असंग होकर अपने स्वरूपमें स्थित होना ‘जाननेकी शक्ति’ का सदुपयोग है, जो ‘ज्ञानयोग’ है । भगवान्‌को अपना और अपनेको भगवान्‌का मानना ‘माननेकी शक्ति’ का सदुपयोग है, जो ‘भक्तियोग’ है । गीता इन तीनों ही योगमार्गोंकी शिक्षा देती है; जैसे‒

जो केवल यज्ञके लिये अर्थात्‌ निष्कामभावपूर्वक दूसरोंके हितके लिये कर्म करता है, वह कर्मयोगी कर्म-बन्धनसे छूट जाता है-
‘यज्ञायाचरतः कर्म समग्रं प्रविलीयते’
(४/२३) ।
 करण कि शरीरादि पदार्थोंको अपना और अपने लिये न मानकर दूसरोंकी सेवामें लगानेसे इन पदार्थोंसे स्वतः सम्बन्ध-विच्छेद हो जाता है ।

जो सम्पूर्ण क्रियाओंको प्रकृतिके द्वारा होनेवाली देखता है और अपने-आपको किसी भी क्रियाका कर्ता नहींदेखता, उस ज्ञानयोगीको अपने स्वरूपका बोध हो जाता है ।

जो संसारसे विमुख होकर केवल भगवान्‌की शरण हो जाता है और भगवान्‌के सिवाय कुछ भी नहीं चाहता, उसके उद्धारकी सम्पूर्ण जिम्मेवारी भगवान्‌पर ही आ जाती है । इसलिये भगवान्‌ स्वयं उस शरणागत भक्तके योगक्षेमका वहन करते हैं, उसके सम्पूर्ण पापोंका नाश कर देते हैं, उसका मृत्युरूप संसार-समुद्रसे शीघ्र ही उद्धार कर देते हैं और उसे तत्वज्ञान भी करा देते हैं ।भक्तियोगमें यह विशेषता है कि भक्त भगवत्कृपासे भगवान्‌को तत्त्वसे जान भी जाता है, भगवान्‌के दर्शन भी कर लेता है और भगवान्‌को प्राप्त भी कर लेता है ।

इस प्रकार गीतामें ऐसी अनेक अलौकिक शिक्षाएँ दी गयी हैं, जिनके अनुसार आचरण करके मनुष्य सुगमतासे अपने परम लक्ष्य परमात्मतत्त्वकी प्राप्ति कर सकता है ।

नारायण ! नारायण !! नारायण !!!

‒ ‘कल्याण-पथ’ पुस्तकसे

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🌟 गीताकी अलौकिक शिक्षा :

 (गत ब्लॉगसे आगेका)

मैं सुख ले लूँ, मेरा आदर हो जाय, मेरी बात रह जाय, मुझे आराम मिले, दूसरा मेरी सेवा करे‒यह भाव महान्‌ पतन करनेवाला है । अर्जुनने भगवान्‌से पूछा कि मनुष्य न चाहता हुआ भी पाप क्यों करता है ? तो भगवान्‌ने कहा कि ‘मुझे मिले’ यह कामना ही पाप कराती है (३/३६-३७) ।जहाँ व्यक्तिगत सुखकी कामना हुई कि सब पाप, सन्ताप, दुःख, अनर्थ आदि आ जाते हैं । इसलिये अपनी सामर्थ्यके अनुसार सबको सुख पहुँचाना है, सबकी सेवा करनी है, पर बदलेमें कुछ नहीं चाहना है ।हमारे पास अपने कहलानेवाले जो बल, बुद्धि, योग्यता आदि है, उसे निष्कामभावसे दूसरोंकी सेवामें लगाना है ।

हमारे पास वस्तुके रहते हुए दूसरेको उस वस्तुके अभावका दुःख क्यों भोगना पड़े ? हमारे पास अन्न, जल और वस्त्रके रहते हुए दूसरा भूखा, प्यासा और नंगा क्यों रहे ?‒ऐसा भाव रहेगा तो सभी सुखी हो जायँगे । एक-दूसरेके अभावकी पूर्ति करनेकी रीति भारतवर्षमें स्वाभाविक ही रही है । खेती करनेवाला अनाज पैदा करता था तो वह अनाज देकर जीवन-निर्वाहकी सब वस्तुएँ ले आता था । उसे सब्जी, तेल, घी, बर्तन, कपड़ा आदि जो कुछ भी चाहिये, वह सब उसे अनाजके बदलेमें मिल जाता था । सब्जी पैदा करनेवाला सब्जी देकर सब वस्तुएँ ले आता था । इस प्रकार मनुष्य कोई एक वस्तु पैदा करता था और उसके द्वारा वह सभी आवश्यक वस्तुओंकी पूर्ति कर लेता था । पैसोंकी आवश्यकता ही नहीं थी । परन्तु अब पैसोंको लेकर अपनी आदत बिगाड़ ली । पैसोंके लोभसे अपना महान्‌ पतन कर लिया । पैसोंका संग्रह करनेकी ऐसी धुन लगी कि जीवन-निर्वाहकी आवश्यक वस्तुएँ मिलनी कठिन हो गयीं ! कारण कि वस्तुओंको बेच-बेचकर रुपये पैदा कर लिये और उनका संग्रह कर लिया । इस बातका ध्यान ही नहीं रहा कि रुपये पड़े-पड़े स्वयं क्या काम आयेंगे ! रुपये स्वयं किसी काममें नहीं आयेंगे, प्रत्युत उनका खर्च ही अपने या दूसरोंके काममें आयेगा । परन्तु अन्तःकरणमें पैसोंका महत्त्व बैठा होनेसे ये बातें सुगमतासे समझमें नहीं आतीं । पैसोंकी यह भूख भारतवर्षकी स्वाभाविक नहीं है, प्रत्युत कुसंगतिसे आयी है ।

एक मार्मिक बात है कि जो दूसरेका अधिकार होता है वही हमारा कर्तव्य होता है । जैसे दूसरेका हित करना हमारा कर्तव्य है और दूसरोंका अधिकार है । माता-पिताकी सेवा करना, उन्हें सुख पहुँचाना पुत्रका कर्तव्य है और माता-पिताका अधिकार है । ऐसे ही पुत्रका पालन-पोषण करना और उसे श्रेष्ठ, सुयोग्य बनाना माता-पिताका कर्तव्य है और पुत्रका अधिकार है । गुरुकी सेवा करना, उनकी आज्ञाका पालन करना शिष्यका कर्तव्य है और गुरुका अधिकार है । ऐसे ही शिष्यका अज्ञानान्धकार मिटाना, उसे परमात्मतत्त्वका अनुभव कराना गुरुका कर्तव्य है और शिष्यका अधिकार है । अतः मनुष्यको अपने कर्तव्यपालनके द्वारा दूसरोंके अधिकारकी रक्षा करनी है । दूसरोंका कर्तव्य और अपना अधिकार देखनेवाला मनुष्य अपने कर्तव्यसे च्युत हो जाता है । इसलिये मनुष्यको अपने अधिकारका त्याग करना है और दूसरेके न्याययुक्त अधिकारकी रक्षाके लिये यथाशक्ति अपने कर्तव्यका पालन करना है । दूसरोंका कर्तव्य देखना और अपना अधिकार जमाना इहलोक और परलोकमें पतन करनेवाला है ।वर्तमानमें जो अशान्ति, कलह, संघर्ष देखनेमें आ रहा है, उसका मुख्य कारण यह है कि लोग अपने अधिकारकी माँग तो करते है, पर अपने कर्तव्यका पालन नहीं करते । इसलिये गीता कहती है‒

कर्मण्येवाधिकारस्ते मा फलेषु कदाचन।            (२/४७)

‘अपने कर्तव्यका पालन करनेमें ही तुम्हारा अधिकार है, उसके फलोंमें नहीं ।’

    (शेष आगेके ब्लॉगमें)

‒ ‘कल्याण-पथ’ पुस्तकसे

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गुरुवार, 8 सितंबर 2016

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❄ गीताकी अलौकिक शिक्षा :

प्राणिमात्रके परम सुहृद् भगवान्‌के मुखसे निःसृत ‘श्रीमद्भगवद्गीता’ मनुष्यमात्रके कल्याणके लिये व्यवहारमें परमार्थकी अलौकिक शिक्षा देती है । कोई भी व्यक्ति (स्त्री, पुरुष) हो और वह किसी भी वर्णमें हो, किसी भी आश्रममें हो, किसी भी सम्प्रदायमें हो, किसी भी देशमें, किसी भी वेशमें हो, किसी भी परिस्थितिमें हो, वहीं रहते हुए ही वह परमात्मतत्त्वको प्राप्त कर सकता है । यदि वह निषिद्ध कर्मोंका सर्वथा त्याग कर दे और निष्कामभावसे विहित कर्मोंको करता रहे तो इसीसे उसे परमात्मतत्वकी प्राप्ति हो जायगी‒

सुखदुःखे समे कृत्वा लाभालाभौ जयाजयौ ।
ततो युद्धाय युज्यस्व नैवं पापमवाप्स्यसि ॥
                                                   (२/३८)

‘जय-पराजय, लाभ-हानि और सुख-दुःखको समान समझकर फिर युद्धमें लग जा । इस प्रकार युद्ध करनेसे तू पाप-(बन्धन-) को प्राप्त नहीं होगा ।’

युद्धसे बढ़कर घोर परिस्थिति और क्या होगी ? जब युद्ध-जैसी घोर परिस्थितिमें भी मनुष्य अपना कल्याण कर सकता है, तो फिर ऐसी कौन-सी परिस्थिति होगी, जिसमें रहते हुए मनुष्य अपना कल्याण न कर सके ?

सुख-दुःख, हानि-लाभ आदि सब आते हैं और चले जाते हैं, पर हम ज्यों-के-त्यों ही रहते हैं । अतः समतामें हमारी स्थिति स्वतः-स्वाभाविक है । उसी समताकी ओर गीता लक्ष्य करा रही है कि ये जो तरह-तरहकी परिस्थितियाँ आ रही हैं, उनके साथ मिलो मत, उनमें प्रसन्न-अप्रसन्न मत होओ, प्रत्युत उनका सदुपयोग करो । अनुकूल परिस्थिति आ जाय तो दूसरोंको सुख पहुँचाओ, दूसरोंकी सेवा करो और प्रतिकूल परिस्थिति आ जाय तो सुखकी इच्छाका त्याग करो । गीता कितनी अलौकिक शिक्षा देती है‒

परस्परं भावयन्तः श्रेयः परमवाप्स्यथ ।

                                               (३/११)

‘एक-दूसरेको उन्नत करते हुए तुमलोग परम कल्याणको प्राप्त हो जाओगे ।’

सभी एक-दूसरेके अभावकी पूर्ति करें, एक-दूसरेको सुख पहुँचायें, एक-दूसरेका हित करें तो अनायास ही सबका कल्याण हो जाय‒
‘ते प्राप्नुवन्ति मामेव सर्वभूतहिते रताः’ (१२/४) ।
इसलिये दूसरोंका हित करना है, दूसरेको सुख देना है, दूसरेको आदर देना है, दूसरेकी बात रखना है, दूसरेको आराम देना है, दूसरेकी सेवा करनी है । दूसरा हमारी सेवा करे या न करे, इसकी परवाह नहीं करनी है अर्थात्‌हमें दूसरेका कर्तव्य नहीं देखना है, प्रत्युत निष्कामभावसे अपने कर्तव्यका पालन करना है; क्योंकि दूसरेका कर्तव्य देखना हमारा कर्तव्य नहीं है । यहाँ एक खास बात समझनेकी है कि हमें मिलनेवाली वस्तु, परिस्थिति आदि दूसरे व्यक्तिके अधीन नहीं है, प्रत्युत प्रारब्धके अधीन है ।प्रारब्धके अनुसार जो वस्तु, परिस्थिति आदि हमें मिलनेवाली है, वह न चाहनेपर भी मिलेगी । जैसे न चाहनेपर भी प्रतिकूल परिस्थिति अपने-आप आती है, ऐसे ही अनुकूल परिस्थिति भी अपने-आप आयेगी । दूसरे व्यक्तिको भी वही मिलेगा, जो उसके प्रारब्धमें है, पर हमें उसकी ओर न देखकर अपने कर्तव्यकी ओर देखना है अर्थात्‌ अपने कर्तव्यका पालन (सेवा) करना है । दूसरी बात, हमारी सेवाके बदलेमें दूसरा हमारी भी सेवा करेगा तो हमारी सेवाका मूल्य कम हो जायगा; जैसे‒हमने दूसरेको दस रुपये दिये और उसने हमें पाँच रुपये लौटा दिया तो हमारा देना आधा ही रह गया ! अतः यदि दूसरा बदलेमें हमारी सेवा न करे तो हमारा बहुत जल्दी कल्याण होगा । यदि दूसरा हमारी सेवा करे अथवा हमें दूसरेसे सेवा लेनी पड़ी तो उसका बड़ा उपकार मानें, पर उसमें प्रसन्न न हो । प्रसन्न (राजी) होना भोग है और भोग दुःखका कारण है‒‘ये हि संस्पर्शजा भोगा दुःखयोनय एव ते’ (५/२२) ।

    (शेष आगेके ब्लॉगमें)

‒ ‘कल्याण-पथ’ पुस्तकसे

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🌟 कर्म, सेवा और पूजा :

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बाह्य-पदार्थोंका सुख तो पराधीनताका है । और पराधीनता तो पराधीनता ही है‒‘पराधीन सपनेहुँ सुख नाहीं’ । और भीतरमें सन्तोष आवे जब‒

गोधन गजधन बाजिधन और रतन धन खान ।
जब आवे संतोष धन  सब  धन धूरी सामान ॥

भीतरसे सन्तोष आवे ।
‘सन्तोषामृततृप्तानां यत्सुखं शान्त चेतसाम्’
बहुत आनन्द हो रहा है । कुछ चाहिये नहीं । हमारे कुछ नहीं चाहिये । जीयेंगे कैसे ? जीना भी क्यों चाहिये ?भगवान्‌को जिलानेकी लाख गरज हो तो दे दो, तो जी जावेंगे । नहीं दे तो चलने दो, हमें जीनेसे मतलब नहीं, शरीरसे मतलब नहीं, प्राणोंसे मतलब नहीं, जीनेसे मतलब नहीं । भगवान्‌, सन्त, महात्मा, संसार‒सब उसकी गरज करें, उसको किसीकी गरज नहीं । भगवान्‌की भी नहीं । भगवान्‌को गरज होती है ऐसे पुरुषोंकी । ‘मैं हूँ भगतन को दास भगत मेरे मुकुटमणि’ भक्त-भक्तिमान् है भगवान्‌, भगतके भगत हैं भगवान्‌ । भगवान्‌को आनन्द बहुत आता है इसमें । जैसे कि माँको आनन्द आता है न बच्चे का पालन करनेमें, नहीं तो आप हम इतने बड़े हो जावें क्या ? वह प्रसन्नतासे पालती है । आनन्द आता है माँ को लालन-पालन में , बच्चे टट्टी-पेशाब भी फिर देते है माँ पर तब भी।

एक सज्जन कह रहे थे । काशीके मदन मोहनजी महाराज थे । ब्याहमें गये थे कहीं । तो ब्याहमें बढ़िया-बढ़िया साड़ियाँ पहनकर बहनें आयीं । एक बहनके गोदमें बालक था, दूसरी बहन पासमें बैठी थी । तो गोदीमें जो बालक था, वहीं टट्टी फिरने लगा । टट्टीकी आवाज आयी तो पासवाली बहनने कहा, ‘देख यह टट्टी जाता है ।’ तो वह कहती है ‘हल्ला मत कर, इसके हाथ लगा देंगे, इसको पता लग जायगा तो टट्टी रुक जायगी इसकी, चुप रह ।’

इसमें कोई सेवा-पूजा हो रही है क्या इसकी ? उसने कहा‒‘चुप रह’ । रेशमी साड़ीमें टट्टी फिर रहा है और वो कहती है कि ‘बोल मत, टट्टी रुक जायगी बालककी’ । बोलो ! इसमें कोई सेवा-पूजा हो रही है क्या ? वो रोगी न हो जाय, बस यह चिन्ता है ।

माँ यशोदा धमकाती है कन्हैयाको । ‘क्यों लाला तूने माटी खायी, बता ?’ यशोदा समझा रही है हाथमें लाठी लेकर । क्यों माटी खायी ? ‘दूध-दहीने कबहूँ न नाटी’, दूध-दहीकी तेरेको ना कही क्या कभी मैंने ? तो माटी क्यों खाता है ? धमकाती है । मतलब क्या है ? मिट्टी खा लेगा तो पेट खराब हो जायगा । भीतरसे रोग लग जायगा । ये दुःख पायेगा । माँके चिन्ता हो रही है । कन्हैया तो परवाह नहीं करता ।
‘नाहं भक्षितवानम्ब सर्वे मिथ्याभिशंसिनः’ ।
 ये झूठ बोलते हैं सब । सच्चा तो मैं ही हूँ एक । कन्हैयाने कहा‒मैया ! व्रजमें मेरे समान भला आदमी कोई नहीं है ।’ माँ हँसती है कि मैं जानती हूँ, तू है बड़ा ! ठाकुरजी सच्ची कहते है, व्रजमें उनके समान भला कौन है ! माँको विश्वास ही नहीं होवे । माँ कहती है कि मैं जानती हूँ तेरेको ! माँका स्नेह बहुत है, अत्यधिक ज्यादा और लालाको इतनी मस्ती आती है महाराज ! पूतनाने मारनेके लिये जहर पिलाया और उसको मुक्ति दे दी । दूध पिलानेवाली माताको क्या देंगे ? जहर पिलानेवालीको मुक्ति दे दी । दूध पिलानेवाली माँको अपने-आपको दे देते हैं और क्या देवें ? वो चाहे रस्सीसे बाँध देवे, तो बंध जाते हैं । वहाँ दामोदर नाम हो जाता है । अब बाँध दे, छोड़ दे; मर्जी आवे वैसे करे मैया । माँ है, अपनी खुशी है जैसे वह करे । ऐसी बात है, वो भी भीतरमें भाव होता है न ! भावसे भगवान्‌ वशमें हो जाते हैं । ‘भावाग्रही जनार्दनः’ तो जहाँ वो पूज्यभाव होता है, वहाँ भारी लगता है क्या ? बोलो ! बस अपने में भावकी कमी है ।

नारायण ! नारायण !! नारायण !!!

‒ ‘भगवत्प्राप्ति सहज है’ पुस्तकसे

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बुधवार, 7 सितंबर 2016

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🌟 कर्म, सेवा और पूजा :

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प्रश्न‒ क्या प्राणी सेवा ही प्रभु-सेवा है, सेवा और पूजामें अन्तर क्या है ?

उत्तर‒हाँ जी । काम कर देना सेवा है । पूजन होता है चन्दनसे, अगरबत्तीसे, दीपक दिखानेसे, आरती करनेसे, फूल चढ़ानेसे । यह पूजा होती है । इसको भी सेवा कह देते हैं, पर पूजा है यह । तो पूजा करनेमें जिसका हम पूजन करते हैं, उसको ऐसा कोई लाभ नहीं होता । पुष्प चढ़ा दिया तो क्या हुआ, चन्दन चढ़ा दिया तो क्या हुआ ? धूप-दीप कर दिया तो क्या मिल गया उसको ? उसको सुख ज्यादा होता है सेवा करनेसे । पग-चम्पी कर दी, स्नान करा दिया, कपड़े धो दिये । ऐसे यदि वह उनकी सेवा करे तो सुख ज्यादा होता है, नि:सहाय पर सेवा बुद्धिसे भी विशेष अगर पूजा बुद्धिसे करता है तो स्वयं गद्‌गद हो जाता है । क्योकि भगवान तो जीवमात्र में है। मस्त हो जाता है वह कहीं सेवाका काम मिले तो ! सेवामें पूजा-बुद्धि हो जाती है तो निहाल हो जाता है । चरण-चम्पी करता है एक तो और एक चरण छूता है । चरण छूनेमें, जिसके चरण छूता है, उसको कुछ नहीं मिलता । स्वयं अभिमान भले ही कर ले । और चरण-चम्पी करता है तो थकावट दूर होती है ।

भाव चरण छूनेका है और पूजा-बुद्धि है तो चरण छूनेमात्रसे जैसे बिजलीका करंट आता है, ऐसे ही उसके आनन्दका एक करंट आता है । ऐसे चरण-चम्पी करना सेवा है और चरण छूना पूजा है । यह पूजाका और सेवाका भेद है । जितना अपने अभिमानका त्याग होता है, उसको सुख कैसे पहुँचे ? उसको आराम कैसे पहुँचे ? यह सेवाभाव होता है । वह पूजनीय, आदरणीय है; वह हमारा भोजन भी स्वीकार कर ले, चन्दन भी स्वीकार कर ले, हमारा नमस्कार भी स्वीकार कर ले तो मैं निहाल हो जाऊँ ! यह पूजाका भाव है ।

जहाँ पूज्यभाव होता है, वहाँ भारी कैसे लगे ? वो तो त्याग करता रहता है, हरदम ही विचार करता रहता है, किस तरहसे मेरेको सेवा मिल जाय । सेवा मिल जाय तो अपना अहोभाग्य समझता है कि बस निहाल हो गया आज तो ! और ऐसा मालूम पड़ता है कि इनकी कृपासे ही यह हो रहा है । मेरेमें यह भाव है न, यह इनकी कृपा है । काम भी इनकी कृपासे होता है । वह तो जीवन्मुक्त हो गया महाराज ! इतना मस्त हो गया । उसकी तो सेवा-पूजा देखकर दूसरे आदमियोंका कल्याण हो जाय । अगर उसका भाव यह है तो ऐसी बात है और भारी लगता है तो आलस्य है, प्रमाद है, अभिमान आदि दोष है ।

यह बात है भैया ! जितना ही दुःख होता है, आनन्द नहीं आता है, उसमें अपने दोष है भीतर । अपने दोष न रहनेसे बहुत ही मौज होती है । जितना निर्दोष जीवन है, उतना उसके आनन्द रहता है । इस बातको समझते नहीं, इस वास्ते लोग चोरी करते हैं, चालाकी कर लेते हैं, ठग लेते हैं, उससे खुदको दुःख होगा, शान्ति नहीं रह सकती, उससे प्रसन्नता नहीं रह सकती ।परन्तु पदार्थोंमें ज्यादा आसक्ति है, पदार्थोंको मूल्यवान समझता है; इस वास्ते झूठ-कपट कर, धोखा दे राजी होता है ।यह महान्‌ पतनका रास्ता है । बहुत नुकसान कर लिया अपना ! और जितना निर्दोष जीवन होता है, अपना शुद्ध जीवन होता है; आलस्य, प्रमाद, झूठ, धोखेबाजी, लोभ, क्रोध, कामना कुछ नहीं होती, उतना अन्तःकरण निर्मल होता है, हल्का होता है, मस्ती रहती है, आनन्द हरदम रहता है‒

कंचन खान खुली घट माहीं ।
रामदास के     टोटो  नाहीं ॥

भीतरसे आनन्द उमड़ता है । जैसे शीत-ज्वर चढ़े तो भीतरसे ही ठण्ड लगती है । ऐसे भीतरसे आनन्द उठता है उसके, बाह्य-पदार्थोंसे सुख लेनेकी इच्छा नहीं होती ।

    (शेष आगेके ब्लॉगमें)

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